गांधी आश्रम में घुसते ही सबसे पहले हमारी नजर एक दीवार पर लिखे इसके स्थापना वर्ष पर पड़ती है - 1917. इसे देखते ही बापू की जमीन पर पहुंचने के रोमांच के साथ ही आपको सौ साल पुराने इतिहास का हिस्सा बनने का अहसास भी होता है. साथ ही, इस बात पर सुखद आश्चर्य भी होता है कि आश्रम में प्रवेश करने के लिए न तो कोई एंट्री पास लेना पड़ता है और न ही किसी सिक्योरिटी चेक से होकर गुजरना पड़ता है.

आश्रम के प्रवेश द्वार के पास मौजूद दीवार पर स्थापना वर्ष और कई भाषाओं में लिखे आश्रम के नाम के साथ-साथ बापू की एक तस्वीर भी उकेरी गई है. ज्यादातर लोग यहां रुककर बापू के साथ तस्वीरें खिंचवाना पसंद करते है. कोई मजाक में बापू की लाठी को थामने या छीनने की कोशिश करते हुए तो कोई पूरी गंभीरता और श्रद्धा से उनके सामने शीश नवाते हुए. ऐसा बापू के साथ रोज और शायद इसलिए भी होता होगा कि अब उनके देशवासियों को उनके मूल्यों से ज्यादा अपने सोशल मीडिया अपलोड्स की चिंता रहती है. खैर, अपनी इस चिंता से फारिग होकर देसी-विदेशी मेहमानों के छोटे-बड़े दल लहराते हुए उस रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं जिस पर किसी जमाने में बापू, बा, बिनोवा और उस दौर की अन्य तमाम हस्तियां चले होंगे.

आगे बढ़ते हुए आपको सामने प्रार्थना स्थल नजर आता है और उसके दाईं ओर दिखती है, वह जगह जिसे हृदय कुंज कहा जाता है. हृदय कुंज आश्रम का वह हिस्सा है जिसे अक्सर हमने इसकी तस्वीरों में देखा है. यहीं बापू का कमरा है जो जाहिर है कि आश्रम में आने वाले हर व्यक्ति के आकर्षण का केंद्र है, खासकर विदेशों से आने वाले सैलानियों का. इस कमरे में झांकते ही आपको जो नजर आता है उसे पहली बार देखकर भी ऐसा लगता है कि जैसे उसे हम सालों से जानते हैं. यह अपनापा शायद इसलिए महसूस होता है कि इस जगह और यहां की चीजों का जिस इंसान से ताल्लुक था, उसे हम बापू कहते हैं.

बापू का चरखा, उनकी टेबल, उनकी लाठी की एक नकल, लकड़ी का एक पेन होल्डर और उसके पीछे सफेद चादर-तकिये वाला छोटा सा आसन लकड़ी की रेलिंग से घिरा हुआ रखा है. इसे देखकर आप इस ख्याल से सबसे ज्यादा रोमांचित होते हैं कि इस जगह पर बैठकर कभी वह व्यक्ति चरखा घुमाता होगा जिसने दुनिया को अहिंसा का सबसे मजबूत संदेश दिया है. इस कमरे के माहौल से आपको 1917 के वक्त में होने का एहसास होता है. हालांकि आप यहां ज्यादा देर तक अकेले नहीं हो सकते. वहां कुछ और लोगों के पहुंचते ही आप 2018 में लौट आते हैं.

बापू का कमरा
बापू का कमरा

गांधी जी के कमरे के कोने में, जमीन पर ही एक छोटी सी बैठने की जगह और है. यहां पर हमारी मुलाकात लता बेन से होती है. वे आश्रम में बतौर कम्युनिकेटर काम करती हैं. उनके पास एक चरखा है जो ज्यादातर वक्त चलता रहता है और आते-जाते लोग उन्हें सूत कातते देखते रहते हैं. वे इसे बीच-बीच में तब रोक देती हैं जब उन्हें लगता है कि उनके आस-पास ज्यादा भीड़ इकट्ठी हो गई है. कुछ आगंतुक चरखे पर भी हाथ आजमाने की सफल-असफल कोशिशें करते हैं, लता बेन इसमें उनकी मदद करती हैं.

चरखा कातने के दौरान वे लोगों को गांधीजी से जुड़े किस्से भी सुनाती रहती हैं. उनके पास बैठकर बहुत से ऐसे लोगों के नाम और दिलचस्प किस्से भी सुनने को मिलते हैं जिनका जिक्र शायद इतिहास की किसी किताब में नहीं है. इनमें से ज्यादातर वे लोग हैं जो या तो गांधी जी के समय में आश्रम और सत्याग्रह का जरूरी हिस्सा रहे या फिर बाद में उन्हें आगे बढ़ाने के काम में लगे रहे. हमें वे ‘मिस्टर टॉयलेट’ के नाम से मशहूर ईश्वर भाई पटेल से जुड़े कुछ किस्से सुनाती हैं. कैसे उन्होंने लोगों की जरूरत और रुचि के हिसाब से टॉयलेट डिजाइन किए और लोगों को उन्हें इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया.

हृदय कुंज में लता बेन से बातचीत करते हुए हमारा ध्यान आने-जाने वाले लोगों पर भी रहता है. एक सज्जन बापू की लाठी न छूने की लता बेन की चेतावनी को कई बार अनसुना करते हुए उसे थामकर अपनी फोटो खिंचवाने में लगे हुए हैं. वे जिस तरह से ऐसा करते हैं वह थोड़ी चिढ़न पैदा करने वाला है. कम से कम मंदिर जैसी इस जगह पर तो लोगों को ढंग से पेश आना चाहिए. अचानक दिमाग में आता है कि उन्हें इस कीमती लाठी का सहारा मिल भी जाए तो भी वे शायद ही गांधी के रास्ते पर चलने की सोच भी पाएं. तभी बापू की कही एक बात याद आ जाती है. अगले ही पल हमें अपनी तीन उंगलियां अपनी ही तरफ मुड़ी हुई दिखने लगती हैं.

हृदय कुंज
हृदय कुंज

इसके करीब दस मिनट बाद एक और दिलचस्प वाकया घटता है. एक परिवार तीन साल के बच्चे के साथ भीतर घुसता है. मां उसे बताती है ‘देखो बेटा, ये बापू के बैठने की जगह है. हाथ जोड़ो.’ बच्चा हाथ जोड़कर सवाल करता है ‘मम्मा बापू कहां हैं, बुलाओ.’ फिर भागकर हमारी तरफ आता है और हमसे भी आकर कहता है - ‘बुलाओ बापू को, बुलाओ बापू को.’ उसकी मां समझ चुकी है कि अब यह नन्हीं मनुहार जिद में बदलने वाली है. इसलिए बच्चे को फुसलाने वाले स्वर में जवाब मिलता है - ‘बापू तो अब नहीं हैं!’ बच्चे को कुछ समझ नहीं आता फिर भी वह अगला सवाल करता है - ‘तो अब उनकी जगह पर कौन है?’ मां कोई नहीं कहकर फुर्सत पा लेती है और हम उस नन्हे से बच्चे का सवाल थामे सोचते रह जाते हैं.

इसके बाद हम हृदय कुंज के दूसरे हिस्सों में जाते हैं जहां एक तरफ तरफ कस्तूरबा गांधी और मेहमानों का कमरा है और दूसरी तरफ रसोईघर और स्टोररूम. रसोईघर में उस समय गांधी जी द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ सामानों की प्रतिकृतियां और उनका अस्थिकलश रखा हुआ है. देखने वाले आते हैं, सामानों की आलमारी के सामने रुक कर उन पर लिखा हुआ पढ़ते हैं और बाकी कमरों को झांकने की रस्म अदायगी करने के बाद बाहर निकल जाते हैं. जो एक और चीज हमारा ध्यान यहां खींचती है वह है यहां के कमरों की खिड़कियां. यहां की किसी भी खिड़की से अंदर झांककर देखने पर एक बार फिर वक्त में पीछे लौट जाने की इच्छा जोर लगाकर ऊपर उछलती है. अगर आपने गांधी को थोड़ा-बहुत पढ़ा है तो हो सकता है उनकी कही हुई ये लाइनें आपको याद आ जाएं - ‘मैं नहीं चाहता कि मेरे घर के सभी दरवाजे और खिड़कियां बंद हों. मैं एक ऐसा घर चाहता हूं जिसकी सभी खिड़कियां और दरवाजे खुले हों, जिसमें हर भूमि और राष्‍ट्र की सांस्‍कृतिक पवन होकर गुजरे.’

विनोबा-मीरा कुटीर, प्रार्थना स्थल, बुक शॉप और म्यूजियम में सैलानियों की तरह घूमने-भटकने के बाद लता बेन के जरिए हमारी मुलाकात सौरभ से होती है. सौरभ दिल्ली के रहने वाले हैं और पेशे से शिक्षक हैं. वे बीते दो सालों से अहमदाबाद में रह रहे हैं और बतौर वालंटियर आश्रम की गतिविधियों में हिस्सा लेते रहते हैं. सौरभ को किसी मीटिंग के लिए आश्रम के पिछले हिस्से की तरफ जाना है, यह हिस्सा मानव साधना कहलाता है. यह असल में गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल की बेटी अनार पटेल द्वारा चलाया जा रहा ट्रस्ट है. सौरभ हमें वहां पहुंचाकर अपनी मीटिंग के लिए चले जाते हैं.

प्रार्थना भूमि
प्रार्थना भूमि

मानव साधना के आंगन में कुछ बच्चे पढ़ते-लिखते और बरामदे में बहुत से बच्चे कागज से अलग-अलग तरह की चीजें बनाते दिखते हैं. कागज के रंगीन बुकमार्क बनाने में लगी स्वाति हमसे बैठने और अपने काम में शामिल होने के लिए कहती हैं. कुछ सवालों के जवाब में स्वाति बताती हैं कि वे नौवीं कक्षा में पढ़ती हैं, सुबह स्कूल जाती हैं और शाम को यहां आती हैं. स्वाति के चलते हमारी मुलाकात एक और वालंटियर मधु से होती है जिन्होंने बीते दो दिनों से ही यहां आना शुरू किया है. मधु भी सौरभ की तरह यहां पर पढ़ाई में बच्चों की मदद करती हैं. स्वाति से हुई कुछ और बातों में हमें पता चलता है कि प्रार्थना का समय हो गया है, लेकिन मधु दीदी उनकी क्लास लेने वाली हैं इसलिए वे आज प्रार्थना में शामिल नहीं होंगी. हमसे कुछ दूरी पर सौरभ भी नंगे फर्श पर बैठकर एक बच्ची को पढ़ा रहे हैं, शायद उनकी मीटिंग डिले हो गई है. सौरभ और मधु को तल्लीनता से अपने काम में लगे देखकर अचानक दिमाग में आता है कि शायद उनके जैसे कुछ लोग ही ‘गांधीवाद’ शब्द के बने रहने की वजह हैं.

प्रार्थना, गांधी आश्रम का सबसे रोचक अनुभव होता है लेकिन इसके बारे में साफ-साफ कुछ बता पाना मुश्किल है. करीब सवा छह बजे अमृत भाई (जो आश्रम के ट्रस्टीज में से एक हैं), लता बेन, सौरभ, आश्रम स्टाफ के कुछ मेंबर्स और आसपास के घरों की लड़कियां इकट्ठे होते हैं. बाहर से आने वाले लोगों में हमारे अलावा पिता-पुत्री की एक जोड़ी भी शामिल है जो सिर्फ प्रार्थना में शामिल होने के लिए करीब 50-55 किमी की यात्रा करके आए हैं. सत्तर वर्षीय इस पिता को उम्मीद है कि बापू की कृपा उनकी बेटी को अपनी मानसिक अक्षमता से लड़ने में मदद करेगी. यह बात वे वहां पर सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस कर्मियों से करते हैं. आश्रम स्टाफ के ही एक सदस्य हमें बाद में इसके बारे में बताते हुए कहते हैं - साबरमती आश्रम में ऐसे कई लोग आते हैं जो बापू को भगवान का आखिरी अवतार मानते हैं. वे अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किसी तीर्थ की तरह यहां की यात्रा करते हैं.

हमें थोड़ा आश्चर्य होता है जब कुल मिलाकर 15-20 लोग ही शाम की इस प्रार्थना में हिस्सा लेते हैं, बाद में हमें पता चलता है कि आश्रम में अब यह एक रस्म जैसी ही रह गई है. सुबह की प्रार्थना तो अब लगभग बंद ही कर दी गई है. प्रार्थना में रोज यहां सर्वधर्म प्रार्थना यानी अलग-अलग धर्मों की प्रार्थनाओं का गुजराती अनुवाद यहां पर गाया जाता है. इसके अंत में एक किताब का वाचन भी किया जाता है. इसके गुजराती में होने के कारण हमें यह ज्यादा समझ नहीं आता.

हमें तो बस साबरमती के किनारे रेत पर बैठकर... अलग-अलग संस्कृतियों को एक करने के लिए बापू की बनाई इस रस्म का हिस्सा बनकर... इस जगह की धूप-मिट्टी-हवा को छूकर... खुद का धन्य होना समझ आता है. आज की सुबह-दोपहर-शाम हम यहां पर जो पाते हैं, वह गूंगे का गुड़ है.