दुनिया के अलग-अलग धर्मग्रंथ संसार के प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री की कल्पना करते हैं. उनके आपस में आकर्षित होने, प्रेम करने और अपनी संतानों को जन्म देने की कहानी कहते हैं. देखा जाए तो परिवार और विवाह जैसी संस्थाओं से पहले से ही प्रेम-संबंधों का अस्तित्व रहा है. इसी के बाद फिर दुनिया में कोई जाति, प्रजाति, धर्मपंथ, राष्ट्रीयता और भाषा आई.

जातियों और धर्मपंथों ने किसी समय लोगों को सामाजिक रूप से एकजुट करने और अनुशासित करने का कार्य किया होगा. लेकिन कालांतर में यह एकजुटता परस्परद्वेषी और संकीर्ण सांप्रदायिकता में बदल गई. अब तो समय के साथ-साथ वे सामाजिक और सामुदायिक बंधन बुरी तरह से राजनीतिक हो चले हैं जिसका परिणाम हम सबके सामने है. विवाह के माध्यम से धर्मांतरण, कथित ‘लव जिहाद’, और ‘बेटी बचाओ, बहु लाओ’ इत्यादि के रूप में यह एक घृणित राजनीतिक परिघटना का रूप ले चुकी है. इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि जो प्रेम-संबंध वास्तविक और निष्कपट भी होते हैं, उन्हें भी संबंधित परिवार, समुदाय और राजनीतिक समूह इसी नजरिए से देखने लगते हैं और एकदम नृशंस तरीके से ऐसे निरीह प्रेमियों की जान ले बैठते हैं.

भारत में हिंदू और मुसलमान दोनों ही संप्रदायों में कट्टर और धर्मांध लोगों और समूहों की मौजूदगी एक कटु सच्चाई रही है, जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. कौन ज्यादा कट्टर है और कौन कम, इस विवाद में पड़ना इस कट्टरता को बढ़ाने में सहायक ही होता है. लेकिन अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों के संदर्भ में नए सिरे से एक सकारात्मक विमर्श को शुरू करने की जरूरत है, ताकि नई पीढ़ियों और उनके माता-पिता का भी पर्याप्त प्रबोधन हो सके. लोकवृत्त या पब्लिक स्फीयर की मौजूदा स्थिति यह है कि इस पर घटना-आधारित सामुदायिक दोषारोपण वाली चर्चाएं तो होती रहती हैं, लेकिन मूल प्रश्न से भिड़ने की कोशिश कम ही दिखाई देती है.

महात्मा गांधी ने समय-समय इन मूल प्रश्नों से भिड़ने की कोशिश की थी. वह भी उस दौर में जबकि कुछ धर्मांध हिंदुओं और ऐसे ही मुसलमानों के बीच वैमनस्यता अपने चरम पर थी. गांधी ने अपने प्रयोगों में जब जिस परिघटना को समझना चाहा, पहले उस पर पूरी तरह विश्वास किया और फिर उसे अपने सत्य की कसौटी पर कसकर ही नकारा या स्वीकार किया. अंतर्धार्मिक विवाहों के बारे में भी उनकी धारणाएं समय-समय पर बदलती रहीं और अंत में जाकर उसी मानवीय व्यापकता पर समाप्त हुई, जिसकी ओर वे धीरे-धीरे आजीवन बढ़ते रहे थे. यह सर्वविदित है कि सार्वजनिक जीवन के अपने शुरुआती दिनों में गांधी अंतर्जातीय और अंतर्धामिक विवाहों के पूरी तरह विरोधी थे. लेकिन समय के साथ-साथ इस बारे में उनकी धारणा पूरी तरह बदलती गई.

चार जून, 1931 को ‘यंग इंडिया’ में गांधी लिखते हैं- ‘अपने धर्म से बाहर ब्याह करने का सवाल जुदा है. इसमें जब तक स्त्री-पुरुष में से हरेक को अपने-अपने धर्म का पालन करने की छूट होती है, तब तक नैतिक दृष्टि से मैं ऐसे विवाह में कोई आपत्ति नहीं समझता. परंतु मैं नहीं मानता कि ऐसे विवाह संबंधों के फलस्वरूप शांति कायम होगी. शांति स्थापित होने के बाद ऐसे संबंध अवश्य कायम किए जा सकते हैं. जब तक हिंदू-मुसलमानों के दिल फटे हुए हैं, तब तक हिंदू-मुसलमान विवाह संबंधों की हिमायत करने का फल मेरी दृष्टि में सिवा परेशानी के कुछ न होगा. अपवादस्वरूप किसी परिस्थिति में ऐसे संबंध सुखदायी साबित हों, तो भी वे संबंध उन्हें सर्वव्यापक बनाने की हिमायत करने के कारण नहीं माने जा सकते. मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि रोटी-बेटी व्यवहार का कौमी इत्तेफाक से कोई संबंध नहीं है. झगड़े के कारण तो आर्थिक और राजनैतिक हैं और उन्हें ही दूर करना है. यूरोप में रोटी-बेटी का व्यवहार है, फिर भी जिस तरह यूरोपवाले आपस में कटे-मरे हैं, इतिहास में वैसे तो हम हिंदू-मुसलमान कभी नहीं लड़े. हमारी अधिकांश जनता तो तटस्थ ही रही है.’

1933 में गांधी के अपने ही दो निकट के परिचितों के अंतर्धार्मिक विवाह का प्रश्न सामने आ गया. पुरुष भारतीय हिंदू था और महिला जर्मनी की एक रोमन कैथोलिक थीं. उस दौरान हिंदू और ईसाई संस्कृतियों के बीच भी एक प्रकार का श्रेष्ठता-हीनता का संघर्ष चल रहा था. पूरी संभावना थीं कि पत्नी अपने बच्चों की परवरिश रोमन-कैथोलिक संस्कृति के आधार पर करना चाहती. जब इस बारे में गांधीजी की राय पूछी गई तो उन्होंने 16 नवंबर, 1933 को एक पत्र में लिखा- ‘मेरा विश्वास है कि जब पति और पत्नी भिन्न धर्म के माननेवाले हों, तो उनकी संतान को पिता के धार्मिक संस्कारों के अनुसार पाला जाना चाहिए. इस बात के पक्ष में मेरी राय में ठोस धार्मिक और दार्शनिक कारण हैं.’

लेकिन 10 साल बाद उन्हीं गांधी के सामने यही प्रश्न एक दूसरे रूप में आकर खड़ा हो गया. वह घटना थी इंदिरा नेहरू की सगाई एक पारसी से होने की. हजारों की संख्या में गांधीजी को कटु भाषा में चिट्ठियां लिखी गईं और उनसे जवाब मांगा गया. इन सबके जवाब में महात्मा गांधी ने दो मार्च, 1942 को सेवाग्राम में जो लिखा था, वह आठ मार्च, 1942 के ‘हरिजन’ में छपा था. गांधी के उस जवाब को आज के भारत में फिर से पढ़ना-पढ़ाना जरूरी लगता है. गांधी लिखते हैं -

‘फीरोज गांधी के इंदिरा नेहरू के साथ सगाई के सवाल को लेकर इधर मेरे पास ढ़ेरों पत्र आए हैं. कई पत्र क्रोध और गालियों से भरे हैं और कुछ में दलीलें देने की कोशिश की गई है. एक भी पत्र ऐसा नहीं है जिसमें श्री फीरोज गांधी की निजी योग्यता के बारे में कोई शिकायत हो. पत्र-लेखकों की दृष्टि में उनका एकमात्र अपराध यही है कि वे पारसी हैं. मैं हमेशा से इस बात का घोर विरोधी रहा हूं और अब भी हूं कि स्त्री-पुरुष सिर्फ विवाह के लिए अपना धर्म बदलें. धर्म कोई चादर या दुपट्टा नहीं कि जब चाहा ओढ़ लिया, जब चाहा उतार दिया. इस मामले में धर्म बदलने की कोई बात ही नहीं है.’

उन्होंने आगे लिखा- ‘फीरोज गांधी का नेहरू परिवार के साथ बरसों पुराना घरापा है. कमला नेहरू की बीमारी में श्री फीरोज गांधी ने उनकी तीमारदारी की थी. वे उनके लिए पुत्रवत् थे. यूरोप में इंदिरा की बीमारी के वक्त भी उनकी बड़ी मदद रही थी. यहीं से दोनों में स्वाभाविक मित्रता पैदा हुई. यह मित्रता संयमवाली रही. इसमें से आपसी चाह पैदा हुई. मगर दोनों में से किसी ने यह नहीं चाहा कि वे जवाहरलाल नेहरू की सम्मति और आशीर्वाद के बिना विवाह कर लें. जब जवाहरलाल को विश्वास हो गया कि इस आकर्षण की तह में स्थिरता है, तभी उन्होंने अपनी स्वीकृति दी. लोग जानते हैं कि नेहरू-परिवार के साथ मेरा कितना घनिष्ठ संबंध है. मैंने दोनों पक्षों से बातचीत भी की. अगर इस सगाई पर सहमति न व्यक्त की जाती, तो यह क्रूरता होती.’

आगे गांधीजी ने और भी महत्वपूर्ण बात लिखी- ‘जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा, इस तरह के विवाह बढ़ेंगे, और उनसे समाज को फायदा ही होगा. फिलहाल तो हममें आपसी सहिष्णुता का माद्दा भी पैदा नहीं हुआ है. लेकिन जब सहिष्णुता बढ़कर सर्वधर्म-समभाव में बदल जाएगी, तो ऐसे विवाहों का स्वागत किया जाएगा. आने वाली समाज की नवरचना में जो धर्म संकुचित रहेगा और बुद्धि की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा, वह टिक न सकेगा; क्योंकि उस समाज में मूल्य बदल जाएंगे. मनुष्य की कीमत उसके चरित्र के कारण होगी. धन पदवी या कुल के कारण नहीं. मेरी कल्पना का हिंदू धर्म कोई संकुचित संप्रदाय नहीं है. वह तो काल के समान ही पुरानी महान और सतत विकास की प्रक्रिया है. उसमें जरथुस्त्र, मूसा, ईसा, मुहम्मद, नानक और ऐसे ही दूसरे धर्म-संस्थापकों का समावेश हो जाता है. उसकी व्याख्या इस प्रकार है-

विद्वद्भिः सेवितः सद्भिनित्यमद्वेषरागिभिः.
हृदयेनाम्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत..’

अर्थात् जिस धर्म को राग-द्वेषहीन ज्ञानी संतों ने अपनाया है और जिसे हमारा हृदय और बुद्धि ही स्वीकार करती है, वही सद्धर्म है.

जो धर्म ऐसा न रहा उसका नाश हो जाएगा. मैं अपने पत्रलेखकों को अलग-अलग जवाब न दे सका हूं. इसके लिए वे मुझे क्षमा करें. मैं उनसे निवेदन करता हूं कि वे गुस्सा छोड़ें और इस भावी विवाह को अपना आशीर्वाद दें. मुझे मिले हुए पत्रों से अज्ञान, असहिष्णुता और पूर्वग्रह के भाव टपकते हैं— उनमें एक प्रकार की ऐसी अस्पृश्यता है जो इस कारण अधिक भयंकर है उसे आसानी से अस्पृश्यता की परिभाषा में बांधा भी नहीं जा सकता.’

यह लिखा था महात्मा गांधी ने इंदिरा और फीरोज की अंतर्धार्मिक विवाह के संबंध में. उसी दौरान गुलाम रसूल कुरैशी ने महात्मा गांधी से पूछा - ‘हिंदू-मुसलमानों के अंतर्धार्मिक विवाहों के संबंध में आपके क्या विचार हैं?’ पांच मार्च, 1942 को इस प्रश्न के संक्षिप्त उत्तर में गांधीजी ने कहा - ‘यदि ऐसे विवाह विशुद्ध प्रेम के आधार पर हों और एक-दूसरे के धर्म की रक्षा होती हो, तभी ठीक होगा.’ ऐसे विवाहों से उत्पन्न संतान के धर्म क्या हों, इस सवाल के जवाब में 23 मार्च, 1942 को गांधी लिखते हैं - ‘ऐसे विवाहों में यह मान लिया जाता है कि पति-पत्नी एक-दूसरे के धर्म को आदर की दृष्टि से देखें. यदि वे लोग धार्मिक वृत्ति के होंगे, तो उनके बच्चे अनजाने ही उनके धर्माचरण में से जो सुंदर लगेगा, उसे अपनाते जाएंगे और माता-पिता की ओर से किसी प्रकार की रुकावट के बिना अपनी रुचि के धर्म को अंगीकार कर लेंगे, और जिसमें सहूलियत देखेंगे, उसी को अपना धर्म बना लेंगे. इस प्रकार के विवाहों का परिणाम मैंने ऐसा ही होते देखा है. दिक्कत तो तभी होती है जब पति-पत्नी के बीच बच्चों की परवरिश को लेकर तीव्र मतभेद होता है.’

फिर एक दौर ऐसा भी आया जब गांधीजी ने कानूनी विवाह या सिविल विवाह पर भी अपनी सहमति दे दी. जबकि उस दौरान लोग इसे धर्म के खिलाफ मानते थे. लोगों ने गांधीजी से पूछा कि क्या वह एक भी ऐसा उदाहरण बता सकते हैं जिसमें अंतर्धार्मिक विवाह के बाद पति-पत्नी ने अपना-अपना धर्म आजीवन कायम रखा हो? 23 फरवरी, 1947 को इस सवाल का जवाब देते हुए गांधी ने कहा था - ‘मुझे ऐसे उदाहरण याद नहीं है जिसमें पति-पत्नी मृत्युपर्यंत अपने-अपने धर्म पर कायम रहे हों. क्योंकि ऐसे जिन मित्रों को मैं जानता हूं, वे अब तक मरे नहीं हैं. फिर भी मेरी नजर में कुछ ऐसे स्त्री-पुरुष हैं जो पूरी तरह अपने-अपने धर्मों का पालन कर रहे हैं. लेकिन मैं तो यहां तक कहूंगा कि इसके लिए आपको अतीत के दृष्टांतों को खोजने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए, बल्कि नए दृष्टांत पेश करने चाहिए ताकि डरपोक लोग अपना डर त्याग सकें.’

यह तो गांधी और उनके दौर की बात हुई. हमें तो इतने वर्षों में इससे कहीं आगे बढ़ जाना चाहिए था. प्रेमियों के प्रेम में भी ज्यादा व्यापकता आ जानी चाहिए थी. सच्चे प्रेमी आज भी होते हैं. प्रेम करने से पहले और विवाहोपरांत भी धर्म-जाति इत्यादि उनके लिए एक अप्रासंगिक चीज होती है. लेकिन जो कथित प्रेमी अपने धर्मपंथ को अपने प्रेम से ऊपर रखता हो, वह कभी सच्चा प्रेमी नहीं हो सकता. एक व्यापक संदर्भ मेंऐसे ही लोगों के लिए कबीर साहेब कहते हैं- ‘चाखा चाहै प्रेम रस, राखा चाहै मान। एक मियान में दो खड़ग देखा सुना न कान।।’