बीते गुरुवार को दिल्ली के ख्याला इलाक़े में अंकित सक्सेना नाम के युवक की हत्या का मामला सामने आया. इस मामले के सभी आरोपित पुलिस की गिरफ़्त में हैं. घटना के सामने आने के बाद से ही मीडिया और सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं. कई लोग इस घटना को ऑनर किलिंग से जोड़ कर देख रहे हैं. कई मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अंकित सक्सेना के क़रीबी और पड़ोस के लोग भी उसकी हत्या को ऑनर किलिंग मानते हैं.

लेकिन सोशल मीडिया पर ‘निठल्ले चिंतन’ में व्यस्त एक तबका इसे सांप्रदायिक रंग देने में जुट गया है. इन लोगों का कहना है कि अंकित सक्सेना की हत्या इसलिए कर दी गई कि वह एक हिंदू था और उसकी प्रेमिका मुस्लिम. ऊपर से देखें तो ऐसा कहना ग़लत तो नहीं है. लेकिन बात कुछ इस तरह कही जा रही है जिससे हिंदुओं की राय यह बने कि इस्लाम और मुसलमान देश, समाज, प्रेम और भाईचारे सबके विरोधी हैं, ख़ास तौर पर हिंदुओं के. यह साबित करने के लिए पुराने मामले उठाए जा रहे हैं जिनका अंकित सक्सेना की हत्या से कोई लेना-देना नहीं है.

लेकिन यहां भी दो तरह की बातें देखने को मिल रही हैं. एक में आरोपितों के मुसलमान होने की वजह से पूरे मुस्लिम समाज और इस्लाम धर्म को निशाने पर लिया जा रहा है, और दूसरे निठल्ले चिंतन में ख़ुद अंकित सक्सेना को निशाना बनाया जा रहा है. इसके मुताबिक़ अंकित सक्सेना ‘मोदी-विरोधी’ और ‘इस्लाम-समर्थक’ था. ये लोग अंकित पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ होने का तंज़ कस रहे हैं. इस संवेदनशील मामले पर हो रहे निठल्ले चिंतन के कुछ उदाहरण नीचे देखे जा सकते हैं.

अंकित को मोदी-विरोधी बताने वाले इन लोगों का यह भी कहना है कि आज जब ‘इस्लाम-समर्थक’ होने के बावजूद उसे काट दिया गया तो उसका कोई मुसलमान दोस्त उसके साथ खड़ा दिखाई नहीं दिया. न ही कोई पार्टी उसके परिवार को पूछने गई. अगर कोई उसके (परिवार के) साथ खड़ा है तो यही मोदी-भक्त खड़े हैं.

तस्वीरों के ज़रिए भी इस मामले को सांप्रदायिक बनाया जा रहा है. हिंदुओं को यह बताया जा रहा है कि मरने वालों में अगला नंबर उनका है. अंकित की हत्या की तुलना उन हत्याओं से की जा रही है जिन्हें सांप्रदायिक राजनीति से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि अंकित के मामले में ऐसा नहीं है और ख़ुद उनके पिता ने अपील की है कि उनके बेटे की हत्या को सांप्रदायिकता से न जोड़ा जाए. वहीं, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इस निठल्ले चिंतन की ज़द में हैं. उन्हें ‘मुसलमानों का मसीहा’ बताकर अंकित की हत्या से जोड़ा जा रहा है.

सांप्रदायिक मामलों में धर्मनिरपेक्ष व बुद्धिजीवी समाज के लोग, पत्रकार और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय हमेशा कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते हैं. किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना की पृष्ठभूमि क्या है, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता. अंकित सक्सेना के मामले में भी कुछ ऐसा ही है.

इन तमाम निठल्ले चिंतनों पर हैरानी और ग़ुस्से दोनों ही आते हैं. लेकिन अभी एक वीडियो बाक़ी है. ‘आई सपोर्ट नरेंद्र मोदी’ नाम के फ़ेसबुक पेज पर डाले गए इस वीडियो में अंकित सक्सेना का केवल एक लाइन में ज़िक्र किया गया है. उसके बाद बात कहां से कहां पहुंचा दी गई यह आप इस वीडियो में ख़ुद देख सकते हैं.

मीडिया और सोशल मीडिया पर अंकित सक्सेना हत्याकांड को जिस तरह पेश किया जा रहा है उसे लेकर अंकित का परिवार काफ़ी आहत है. बीते रविवार को जब भाजपा नेता और पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी पीड़ित परिवार से मिलने गए तो अंकित के पिता ने उनसे साफ़ कह दिया कि वे अपने बेटे की हत्या को हिंदू-मुस्लिम मामले से जोड़ कर नहीं देखते. पिता यशपाल सक्सेना और क़रीबी लोगों ने कहा कि उन्हें बस अंकित के लिए इंसाफ़ चाहिए.

पिता यशपाल ने भाजपा नेताओं से कहा कि उन्हें किसी धर्म से नफ़रत नहीं है. उनकी बात को मीडिया और सोशल मीडिया पर किए जा रहे निठल्ले चिंतन के जवाब के रूप में देखा जा रहा है. यशपाल ने कहा, ‘यहां कुछ लोग (मीडिया) हमसे बात करते हैं, लेकिन इसे धर्म से जोड़कर दिखा रहे हैं. टीवी पर पूरे मामले को तोड़-मरोड़कर दिखाया जा रहा है. हर जगह उल्टी-सीधी न्यूज़ दिखाई जा रही है. आप हमसे दिल से जुड़ें, फ़ोटो न खिंचवाएं.’

रिपोर्टों के मुताबिक़ अंकित सक्सेना एक पेशेवर फ़ोटोग्राफ़र था. उसकी फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल देखकर नहीं लगता कि वह ‘मोदी का सख़्त विरोधी’ या ‘इस्लाम समर्थक’ था. फ़ेसबुक पर उसकी पुरानी तस्वीरों को उठाकर यह अफ़वाह फैलाई गई. प्रोफ़ाइल चेक करने पर पता चलता है कि अंकित ने 16 मई, 2016 को दो तस्वीरें डाली थीं. इन दो तस्वीरों में उसके साथ कुछ और युवक भी दिख रहे हैं. एक तस्वीर में वह नमाज़ पढ़ने की मुद्रा में फ़ोटो खिंचवाते दिख रहा है. उसने कुछ युवकों को टैग भी किया था. टैग किए इन युवकों में केवल एक मुस्लिम नाम है.

अंकित को भारतीय सेनाओं से काफ़ी लगाव था यह भी उसकी प्रोफ़ाइल से पता चलता है. ‘सच्चे देश भक्त’ नाम के फ़ेसबुक पेज के कई वीडियो उसने शेयर किए हुए थे. हालांकि सेना के नाम पर इन वीडियो में कुछ भी कहा जा रहा है, लेकिन कट्टर मोदी-समर्थक की सोच से देखें तो इसके बाद अंकित सक्सेना राष्ट्रवादी होना चाहिए.