आम आदमी की छवि के पीछे मस्त-मलंग शख्सियत रखने वाले अभिनेता संजय मिश्रा एक मध्यवर्गीय बिहारी परिवार से आते हैं. इसके बावजूद उन्होंने ‘ऑफिस-ऑफिस’ जाकर काम करने के बजाय फिल्मी दुनिया में आकर ‘दम लगाकर हइशा’ कहते हुए जोर लगाना तय किया. एक बार ‘गोलमाल’ का मौका मिलते ही उन्होंने ‘दिल से’ काम किया और ‘धमाल’ करके दिखा दिया. इस फिल्मी सफर में कई बार ऐसे मौके भी आए होंगे जब उन्हें लगा होगा ‘रामा रामा क्या है ड्रामा’ फिर भी वे ‘थोड़ा लुत्फ थोड़ा इश्क’ करते हुए ‘गांधीगिरी’ भी करते रहे. हाल ही में सत्याग्रह के साथ एक बातचीत के दौरान उन्होंने न सिर्फ सिनेमा और घर-परिवार की ‘आंखो देखी’ कुछ बातें साझा कीं, बल्कि समाज और राजनीति में फैलती ‘कड़वी हवा’ के असर का जिक्र भी खुलकर किया. इस बातचीत के अंश:

इस बातचीत की शुरुआत, आपकी सहूलियत से आपकी किसी मन की बात से करते हैं. आप हमसे और हमारे पाठकों से क्या कहना चाहते हैं?

मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि एक बार मिलती है जिंदगी, जरा चैन से गुजार लो. मतलब अपनी जिंदगी आराम से गुजारो और जब जाओ तो कोशिश करो कुछ जिंदगियां तुम्हारे जाने के बाद भी, तुम्हारी वजह से भी किसी तरह का चैन हासिल कर सकें.

बीते दिनों देश में जो माहौल रहा है या पद्मावती विवाद की ही अगर हम बात करें तो इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

मेरा मानना है कि हम उस बात को क्यों तूल दें जो तूल देने लायक ही नहीं है. हम यानी जो देश की जनता है, हमने अगर आजादी के बाद से तूल देने लायक बातों को तूल दिया होता तो इस तरह की बातों की चर्चा हम-आप नहीं कर रहे होते. यह तो एक समय विशेष है जब लोग अपने छिटपुट फायदों के लिए फालतू में शोर मचा रहे हैं और ऐसा होना गलत है... गलत है... गलत है! हमें समझना चाहिए कि सिर्फ राजनीति, कुर्सी, भीड़ और ताकत के सहारे जिंदगी नहीं चलती. हमने हर मायने में हिंदुस्तान को खत्म कर दिया है.

कैसे?

देखिए न, आप हैदराबाद के एयरपोर्ट पर उतरिए तो लगेगा आप बनारस उतरे हैं. मुंबई उतरिए तो लगेगा कि दिल्ली उतरे हैं. हर शहर की एक परंपरा है, पहचान है. उस चीज को हमने नष्ट कर दिया है. आपको कोई फर्क ही पता नहीं चलता और न कोई फर्क पड़ता है.

मतलब हर तरफ बाजार बन गया है!

हां, पहले मॉल आए थे और अब तो आपका मोबाइल है. ये तो मॉल का भी मॉल बन गया है. फोन पर ही आपके सामान की खरीददारी है, हर तरह के बाकी काम हो रहे हैं. लेकिन इसमें कहीं हिंदुस्तान नहीं हैं. हिंदुस्तान में यूं होता था कि औरतें शॉपिंग करने जाती थीं तो साड़ी की दुकान पर बात करती थीं. कई पुरुष एक साथ चाय की दुकान पर खड़े दिखाई देते थे. कह सकते हैं कि एक दूसरे से मिलने-जुलने का मौका होता था. साथ रहने या साथ देने का कल्चर अब खत्म हो गया है. जो लोग कल्चर बचाने की बात कर रहे हैं, समझ नहीं आता अब किस कल्चर को बचाएंगे. हमने अपनी बेसिक चीजें खो दी हैं, अपना आधार खो दिया. अब न जाने किस चीज से लोगों को ठेस पहुंच रही है!

आप जिस तरह बिना नाम लिए इशारों में बात कर रहे हैं, क्या यही संवेदनशीलता फिल्मों में आपके काम आती है या वो सिर्फ गहराई से स्क्रिप्ट पढ़ने का कमाल होता है?

मैं गहराई से स्क्रिप्ट नहीं पढ़ता बल्कि गहराई से दुनिया देखता हूं. गहराई से जब तक मैं पिता का दर्द नहीं समझूंगा तो आपके दिल में वो बात पैदा नहीं कर सकता. आपके सामने वो गर्मी दिखाने के लिए मुझे पहले उस गर्मी को महसूस करना जरूरी है. ये नजरिया है एक जिंदगी को देखने का. मैं अक्सर कहता हूं – ‘इन्हीं पागल दिमागों में खुशियों के लच्छे हैं, हमें पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे हैं.’

आपकी बातचीत में बार-बार कविताएं आती हैं, ऐसा लगता है जैसे आपको पढ़ने का काफी शौक है. आजकल क्या पढ़ रहे हैं?

मुझे जब भी वक्त मिलता है, कुछ न कुछ पढ़ लेता हूं. आजकल मैं उदय प्रकाश को पढ़ रहा हूं. अभी तक तो मुझे उन्हें पढ़ने में बहुत मजा आ रहा है. इसके साथ ही कुछ खुशवंत सिंह का लिखा भी पढ़ रहा हूं. उसमें भी मजा आ रहा है. हालांकि अब मुझे पढ़ने-लिखने का कम ही वक्त मिलता है, लेकिन मैं अपने कान हमेशा खुले रखता हूं. किसी ने क्या लिखा, क्या पढ़ा, कौन क्या सुना रहा है, मुझे इसका पता चलता रहता है. इसके अलावा मैं ट्रेन वगैरह में बहुत ट्रैवल करता हूं तो तब पढ़ लेता हूं. बाकी ज्यादातर वक्त मैं बातें सुनने से ही चीजें निकाल रहा होता हूं.

शायद यही चीजें एक अच्छा अभिनेता गढ़ती हैं?

देखिए, कोई एक्टर मुंह, हाथ, कान, गाल से नहीं होता. ये सिर्फ कहने की बात नहीं है कि एक्टर दिल से हुआ जाता है. अभिनय समाधि है. यह अपने आप में एक अलग किस्म की तपस्या है. इसमें आपको समाज में रहते हुए समाज से अलग होना पड़ता है और तभी तो आप समाज को उसका चेहरा दिखा पाएंगे - भाई देखो! एक पिता ऐसा होता है और दूसरा पिता ऐसा होता है. जैसे - मेरी एक फिल्म है आंखों देखी. उसका लीड किरदार कहता है कि जो मैंने देखा नहीं, मैं उस पर यकीन नहीं करता. दूसरी फिल्म कड़वी हवा है जिसका किरदार अंधा है. यह किरदार कहता है कि मैं देख तो नहीं सकता, लेकिन जो बता रहा हूं उस पर यकीन करो. इस बताए हुए को तुम अपनी आंखों से देखने की कोशिश करो.

मैं अपने बचपन में आपका एक शो देखती थी – हंगामा अनलिमिटेड. आपको ये शो या वो वक्त कितना याद है?

हंगामा अनलिमिटेड बहुत शुरुआती काम था और सिखाई के दौरान का काम था. हम काम करते-करते ही सीखते हैं. उस समय की सबसे खात बात यह थी कि मैं अपने आप को एक्सप्लोर कर रहा था. हंगामा अनलिमिटेड हो गया या एप्पल सिंह हो गया. एक ‘धरती पकड़’ आता था. इन सबमें मैं लोगों से पूछता रहता था. सोचिए, मुझ जैसा आदमी बड़े-बड़े पॉलिटिशियन्स से भी सवाल करता था. मुझे उन दिनों किसी काम को लेकर लगता था कि चलो ये भी करके देखते हैं. एप्पल सिंह उस समय मुझे पैसे दे रहा था, मैं लगा रहता तो आज भी स्टार स्पोर्ट्स पर एप्पल सिंह ही कर रहा होता. लेकिन फिर मैंने सोचा चलो एक्टिंग करके देखते हैं.

एप्पल सिंह की बात चली है तो टीवी की थोड़ी बात कर लेते हैं. अभी जो फिलहाल टीवी पर चलने वाली कॉमेडी है, उसको आप कैसे देखते हैं?

मैं खुलकर आपको बता देता हूं कि मैंने टीवी देखना छोड़ दिया है. मुझे मालूम ही नहीं कि कौन-कौन से टीवी प्रोग्राम आ रहे हैं या क्या चल रहा है. मैं तो न्यूज चैनल भी नहीं देखता. मुझे जिन समाचारों की जरूरत है वह मुझे मिल ही जाते हैं. न्यूज चैनल सेंसेशन का जरिया है और इसीलिए यहां लोग फालतू की बातें ज्यादा करने लगे हैं. चाहे टीवी हो या दुनिया, लोगों ने इन चीजों को इतना बिगाड़ा है कि अब ये खत्म होने की ओर बढ़ रही हैं.

इंटरनेट ने भी लोगों को एक नया प्लेटफॉर्म दिया है, उसके बारे में आपकी क्या राय है?

ये मुझे टीवी का एक नया पक्ष लगता है. कुछ दिनों में टीवी बंद हो जाएगा. अब देखिए मैं सड़क पर अपनी फिल्म का पोस्टर क्यों लगाऊं जब लोग इधर-उधर देखते ही नहीं! सब अपने फोन पर ही लगे रहते हैं तो फिर मैं पोस्टर उसी फोन पर ना लगा दूं. मैंने आज तक कड़वी हवा का पोस्टर कहीं नहीं लगा देखा. फिर भी लोग मुझे बोलते हैं कि आपकी फिल्म का पोस्टर बड़ा बढ़िया था. मैं पूछता हूं कि भई तुमने कहां देख लिया तो वे बताते हैं कि सोशल साइट पर. इसको आप तकनीकी आधुनिकता भी कह सकते हैं और यह फायदेमंद तो है. ये कमाल का है, बस इसको थोड़ा सा संभाल के इस्तेमाल करने की जरूरत है.

आपके कल में झांकते हैं, बचपन के बारे में बात करते हैं. उस दौर का कोई इंटरेस्टिंग किस्सा जो अक्सर याद आता हो आपको?

देखिए, इंटरेस्टिंग तो बचपन होता है, किस्से नहीं. उस समय जब आप देख रहे होते हैं... ओहो, इस दुनिया में ग्रो करना है मुझे. लगता है, अरे भाई साहब... यहां! इस जगह पे! मेरा बचपन, मस्त बचपन था. ह्यूमरस परिवार. पापा थोड़े गंभीर और शांत थे, लेकिन दादा, मम्मी, चाचा-चाची, कजिन्स.. ये सब ह्यूमरस! कुल मिलाकर ह्यूमरस और पढ़ा-लिखा परिवार. उसमें एक मैं नागवार संजय मिश्रा. उस समय कोई बुलाता – इधर आ बोल तो महमूद कैसे बोलता है, दिखा जरा चाचा को. हमने महमूद की तरह बोल दिया. फिर जरा देर में इधर जाकर खाना खा लिया, फिर उधर जाकर घूम लिया, फिर कोई आ रहा है तो स्टेशन जाकर उसे ले आए. सब जगह मजा ले रहा था बस. इसके अलावा कभी चाची से भी थोड़ा पैसे मार लिए.. चाचा से भी वसूल लिए. कुल मिलाकर जिसे जिंदगी कहते हैं, वही मेरा बचपन था. इसी तरह पटना, बनारस फिर दिल्ली में मेरा बचपन बीत गया. वैसे बचपना अभी खत्म नहीं हुआ. इंटरेस्टिंग किस्से तो अब शुरू हुए हैं मेरे बचपन के.

फिर भी कोई एक खास किस्सा जो आप बताना चाहें, जिसने आपको संजय मिश्रा बनाया.

संजय मिश्रा बनाया या नहीं, ये तो पता नहीं, लेकिन मैं इतना काबिल लड़का था अपने घर का कि क्या बताऊं. मुझे कभी दूध लेकर आने के लिए भी सुबह नहीं उठाया जाता था. हम तब दिल्ली में रहते थे और मैं 12-13 साल का रहा होउंगा. अगर कोई कहता था कि संजय सबसे बड़ा है, उसे दूध लाने का काम देना चाहिए तो मेरी मां कहती थीं कि अरे जानते हैं न ये कैसे दूध लेकर आएगा! असल में एक बार मैं दूध लाने गया. चार बोतलें खरीदीं, रास्ते में तीन फूट गईं और एक ही घर तक आ पाई. वजह बस ये थी कि गाना गाते, लहराते हुए हम आ रहे थे, सो रास्ते में कहीं-कहीं टकराकर बोतलें फूट गईं. कुल मिलाकर तब ये हिसाब था कि हम पहुंचेंगे या दूध पहुंचेगा.

और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) का टाइम, उसको कैसे याद करते हैं?

एनएसडी के अनुभव बहुत बढ़िया हैं. एनएसडी संस्थान का नहीं, लेकिन उसके जरिए जो लोग मुझे मिले वो बेहद दिलचस्प थे. एक तरफ मेरे एक सीनियर बिपिन शर्मा थे, वो घुमंतु जीव थे. एक बार बोले - यार तू रुक, मैं समोसा लेकर आता हूं. उसके दो महीने बाद लौटकर आए. हमने पूछा यार उस दिन तू कहां चला गया था, बोले मैं कनाडा चला गया था. दूसरी तरफ इरफान भाई लोग थे, वो अलग किस्म के सीनियर थे. उनका काम देखकर हम सोचते थे कि ये आदमी एक्टिंग कब करेगा यार. पंकज कपूर को भी हम देखते थे. तिग्मांशु धूलिया मेरे रूम पार्टनर थे. तीन साल तक मैं उनके साथ रहा, उनकी सोच-समझ बेहद असरदार थी. (हंसते हुए) उस पर मेरा अक्खड़ और यायावरी बैकग्राउंड. घूमते रहो बेटा! जो डाल दो उसी कलर में रंग जाने वाला मैं.

एनएसडी से निकलने के बाद क्या सोचा?

आखिरी दिन जब हमें बताया गया कि कल से आप लोग एनएसडी ग्रेजुएट हो गए हैं. उस दिन हमारे एक टीचर रामगोपाल बजाज हमारे साथ बैठे थे. हमने उनसे कहा - गुरूजी हमसे एक्टिंग-वेक्टिंग नहीं होगा. उन्होंने कहा - पागल मत बनो, एक्टिंग में ही तैयारी करो. बस उनके इन आशीर्वचनों के साथ हमने एक्टिंग की तैयारी करनी शुरू कर दी. हालांकि इसके बावजूद ऐसा लगता नहीं था कि मैं ऐसे एक्टर-वेक्टर बनूंगा. कई बार लगा - छोड़ न यार घूमते हैं, मजा लेते हैं, फोटोग्राफी करते हैं. ये सब करते हुए जब कुछ दिन बीत गए तो पापाजी ने एक दिन कहा - कब तक नहीं जाओगे बंबई? मेरे पिताजी को लगता था कि मैं कुछ अच्छा करूंगा, लेकिन हमें ऐसा कुछ लगता नहीं था. फिर लगा कि नहीं मुझे यही करना चाहिए.

चलते-चलते, आपके शौक पर बात हो जाए. आपने एक बार कहा था कि आपके पास बैंक बैलेंस नहीं, लेकिन म्यूजिक बैलेंस है. हम बैंक बैलेंस के बारे में तो नहीं लेकिन म्यूजिक बैलेंस के बारे में जरूर जानना चाहेंगे.

मुझे हमेशा मेरे हिस्से का अकेलापन चाहिए होता है. हर दिन मुझे थोड़ा वक्त अपने लिए चाहिए, इसमें मैं अपने शौक पूरे करता हूं. जैसे मैं विभिन्न प्रकार की अगरबत्ती जलाउंगा. मुझे अगरबत्तियों का बड़ा शौक है. मैं जब भी किसी शहर में जाता हूं, वहां पर अगरबत्तियों की दुकानें खोज लेता हूं. उसके बाद कुछ अच्छा सुनना मेरा अगला शौक है. जब शायद दसवीं में भी नहीं पहुंचा था तब से बिस्मिल्ला खां को सुनता था. ये आदत थी कि जो सुनना है वो रखना है. फिर उसके बाद ड्रामा स्कूल वगैरह आए तो थोड़ा वेस्टर्न का भी टेस्ट लगा सो उसका भी एक बड़ा कलेक्शन तैयार हो गया. फिर कुछ रीजनल का हो गया, ऐसे करते-करते म्यूजिक बैलेंस तैयार हो गया. हालांकि अब तो ये सब करने का टाइम कम ही मिल पाता है. आप बैंक बैलेंस की बात करना चाहती हैं तो वो भी ठीक है, उसके बारे में भी पूछने पर बता सकता हूं. इसके अलावा मैं खाना बहुत बढ़िया बनाता हूं. जब भी मेरी छुट्टी होती है तो मैं घर वालों को पार्टी दे देता हूं. मेरी बेटियों को मेरा पकाया खाना बहुत पसंद है, वो खुश हो जाती हैं कि आज खाना ‘डैडा’ बनाएगा!