अगर आपको किसी विश्वविद्यालय से मानद उपाधि चाहिए तो सत्ता-शक्ति का केंद्र होना आपके लिए मददग़ार हो सकता है. सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत हासिल जानकारी के हवाले से प्रकाशित एक ख़बर से यह बात ज़ाहिर हुई है.

द इंडियन एक्सप्रेस ने देश के 470 सरकारी विश्वविद्यालयों में आरटीआई लगाकर 1997 से 2017 के बीच जिन-जिन लोगों को मानद डॉक्ट्रेट या इसी तरह की अन्य उपाधियां दी गईं, उनके बारे में जानकारी मांगी थी. इससे पता चला कि इनमें 160 संस्थानों ने क़रीब 1,400 लोगों को इस अवधि में 2,000 के आसपास मानद उपाधियां दी हैं. वहीं 126 संस्थानों ने कोई उपाधि नहीं दी. 184 ने आरटीआई का ज़वाब ही नहीं दिया.

इस जानकारी के विश्लेषण से पता चला कि सैकड़ों राजनेताओं-अफ़सरों को मानद उपाधियां दी गई हैं. वह भी तब जबकि वे ख़ुद इन संस्थानों की निगरानी का जिम्मा संभाल रहे थे. इनमें दो तत्कालीन राष्ट्रपति- प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी शामिल हैं. यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) और विभिन्न मापदंडों पर यूनिवर्सिटियों का आकलन कर उन्हें ग्रेड देने वाली संस्था- नैक (नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल) के कई अध्यक्ष/सदस्य भी इस सूची में हैं.

उदाहरण के लिए गोवर्धन मेहता. ये भारतीय विज्ञान संस्थान के निदेशक रहे हैं और नैक की कार्यकारी समिति के अध्यक्ष भी. जानकारी के अनुसार 2006 से 2012 के बीच जब मेहता नैक में कार्यरत थे तब उन्हें कर्नाटक से कश्मीर तक कई विश्वविद्यालयों ने 18 मानद उपाधियां दीं. हालांकि उन्होंने ख़ुद भी पुणे यूनिवर्सिटी से पीएचडी की हुई है. ऐसा ही मामला जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी) से पीएचडी करने वाले अर्थशस्त्री सुखदेव थोराट का है.

थोराट 2006 से 2011 के बीच यूजीसी के अध्यक्ष रहे हैं. इस दौरान उन्हें सात बार मानद डॉक्ट्रेट मिलीं. उनके अलावा एक से अधिक बार मानद डॉक्ट्रेट पाने वाले यूजीसी के अन्य अध्यक्षों में हरि गौतम (1999 से 2002 के बीच चार बार), वेद प्रकाश (2013 से 2017 के बीच तीन बार) और अरुण निगवेकर (2002 से 2005 के बीच दो बार) प्रमुख हैं. एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया) के अध्यक्ष रहे डॉक्टर केतन देसाई को भी 2009 में तमिलनाडु की एमजीआर मेडिकल यूनिवर्सिटी से मानद डॉक्ट्रेट मिली. जबकि एक साल बाद ही भ्रष्टाचार के आरोप में वे ग़िरफ़्तार कर लिए गए.

शायद इसीलिए शिक्षा क्षेत्र के कई दिग्गज इस चलन को गलत मानते हैं. मसलन- एक सरकारी विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘विश्वविद्यालयों को यह अधिकार है कि वे मानद उपाधि किसको दें और किसे नहीं. लेकिन उन्हें इसके ज़रिए सत्ता-शक्ति की राजनीति नहीं करनी चाहिए.’ ऐसे ही उत्तर प्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर दुर्ग सिंह चौहान कहते हैं, ‘ऊंचे पदों पर बैठे और उच्च शिक्षण संस्थानों को नियंत्रित करने वालों को ख़ुद ही मानद उपाधियों की पेशकश ठुकरा देनी चाहिए. इससे निष्पक्षता क़ायम रहने की संभावना बढ़ जाएगी.’