भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल की अध्यक्षता में छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति की दो दिवसीय बैठक मंगलवार को मुंबई में शुरू हो गई है. आरबीआई बुधवार को नई मौद्रिक नीति का ऐलान करेगा. विभिन्न मीडिया संस्थानों ने अर्थशास्त्रियों के बीच कराए गए अपने सर्वेक्षणों में दावा किया है कि कई वजहों से इस बार फिर ब्याज दर यथावत रहने का अनुमान है. यहां तक कि कुछ जानकार उल्टा इममें चौथाई फीसदी की वृद्धि किए जाने का दावा कर रहे हैं. आरबीआई ने आखिरी बार पिछले साल अगस्त में इसमें चौथाई फीसदी की कटौती की थी. इसके बाद से छह फीसदी की रेपो दर में पिछले छह महीनों से कोई बदलाव नहीं किया गया है.

आइए जानते हैं उन कारणों के बारे में जिनके चलते इस बार भी ब्याज दर कम होने की संभावना न के बराबर है:

1. महंगाई बढ़ने की आशंका

जनवरी में घोषित खुदरा महंगाई के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर में यह दर बढ़कर 5.21 फीसदी हो गई है. यह आरबीआई के अनुमानित दायरे से ज्यादा है. आरबीआई ने अपनी पिछली बैठक में मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में इसके 4.3 से 4.7 फीसदी के बीच रहने का अनुमान लगाया था. ‘बेस इफेक्ट’ आदि कई कारणों के चलते अगले तीन-चार माह तक इसके इस रेंज से ज्यादा रहने का ही अनुमान है. 29 जनवरी को आर्थिक समीक्षा पेश करते वक्त वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने भी कहा था कि मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में विकास दर और महंगाई दोनों के बढ़ने का अंदाजा है. जबकि मौजूदा मौद्रिक नीति के तहत आरबीआई ने खुदरा महंगाई का मध्यकालिक लक्ष्य औसतन चार फीसदी तय किया है. इसलिए माना जा रहा है कि इस नीति को कार्यान्वित करने के लिए आरबीआई बुधवार को भी ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं लाएगा. अगर वह ब्याज दर कम करता है तो बाजार में धन की मात्रा बढ़ जाएगी जिससे महंगाई की दर और भी बढ़ सकती है.

2. कच्चे तेल के और महंगे होने का अनुमान

अमेरिका के एनर्जी इनफॉरमेशन एडमिनिस्ट्रेशन ने हाल में जारी अपने अनुमान में कहा है कि 2018 में कच्चे तेल की मुख्य किस्म ब्रेंट क्रूड आॅयल की औसत कीमत करीब 60 डॉलर प्रति बैरल रहेगी. पिछले साल इसकी औसत कीमत 54 डॉलर रही थी. अभी यह 70 डॉलर के आसपास बना हुआ है.

भारत तेल की जरूरत के लिए बहुत हद तक आयात पर निर्भर है. इसके चलते तेल के महंगा होने से व्यापार घाटा और चालू खाते का घाटा (आयात पर ज्यादा धन खर्च होने और निर्यात पर कम धन मिलने की स्थिति) भी बढ़ जाते हैं. इससे डॉलर की तुलना में रुपया कमजोर होने लगता है और दूसरी चीजों का आयात भी महंगा हो जाता है. इस वजह से देश में आयात की जाने वाली सभी चीजें महंगी हो जाती है. इस बार के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि केवल कच्चे तेल के 10 डॉलर महंगा हो जाने से महंगाई 0.3 फीसदी तक बढ़ जाती है. इसका मतलब यह हुआ कि इस साल केवल कच्चे तेल के चलते खुदरा महंगाई पर कम से कम 0.2 फीसदी का दबाव बने रहने की आशंका है.

रघुराम राजन के समय 2014 में नई मौद्रिक नीति का ऐलान करते हुए आरबीआई ने ब्याज दरों को तय करने का एकमात्र मानदंड मंहगाई को ही बनाया था. इस वजह से जानकार मानते हैं कि महंगाई के कम हुए बिना ब्याज दरों में कटौती होना मुश्किल है.

3. फसलों की एमएसपी में बढ़ोतरी का ऐलान

केंद्रीय वित्त मंत्री ने 2018-19 का बजट पेश करते हुए ऐलान किया है कि सरकार अगले खरीफ सीजन में फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य उसकी लागत से 50 फीसदी ज्यादा तय करेगी. अभी यह लागत का 110 फीसदी होता है. यानी सरकार ने यदि अपनी घोषणा पर अमल किया तो इस साल के अंत तक बाजार में आने वाली खरीफ की फसल पहले से करीब एक तिहाई महंगी हो जाएगी. जानकारों का मानना है कि इस ऐलान का असर अभी से ही दिख सकता है. ऐसे में माना जा रहा है कि आरबीआई सरकार के इस फैसले की पूरी जांच-परख के बाद ही ब्याज दरों में किसी कटौती का ऐलान करेगा.

4. विकास दर के गति पकड़ने का अनुमान

सरकार और उसके बाहर बैठे कई लोग आरबीआई की सख्त मौद्रिक नीति के लिए उसकी आलोचना यह कहकर करते रहे हैं कि इससे विकास दर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. लेकिन जैसा कि इस बार के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है इस वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में विकास की गति तेज हो सकती है. वहीं अगले साल इसके 7.5 फीसदी तक बढ़ने का आकलन किया गया है. इस वजह से आरबीआई पर विकास दर के कम होने की वजह से ब्याज दर घटाने का दबाव न के बराबर हो गया है.