संसद के बजट सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने अभिभाषण में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने को लेकर राजनीतिक सहमति बनाने की ओर बढ़ने की बात कही. ठीक उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के बाहर इस बारे में एक बयान देकर विपक्षी पार्टियों से यह अपील की कि इस अहम चुनावी सुधार के दिशा में हम सभी को मिलकर बढ़ना चाहिए.

दरअसल, लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की बात प्रधानमंत्री काफी दिनों से कर रहे हैं. चुनाव आयोग ने भी कहा है कि वह अगले कुछ महीनों में साथ चुनाव कराने के लिए जरूरी सभी तैयारियां कर लेगा. उसने यह भी कहा है कि इसके लिए संविधान में कुछ संशोधन भी करने होंगे.

इस सबके बीच अब सरकार और भाजपा के अंदर से जो जानकारियां मिल रही हैं उनके मुताबिक शीर्ष स्तर पर इसके लिए राजनीतिक सहमति बनाने पर काम चल रहा है. सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक पार्टी के बड़े नेताओं ने इस बारे में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद से भी बातचीत की है. भाजपा ने उनसे आग्रह किया है कि वे कांग्रेस के अंदर साथ चुनाव कराने के लिए सहमति बनाएं.

सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि गुलाम नबी आजाद से इस बारे में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बातचीत की है. बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने आजाद से कहा है कि कांग्रेस की सहमति के बगैर यह संभव नहीं है और इसके लिए वे दूसरे कांग्रेसी नेताओं से बातचीत करें. राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए भी गुलाम नबी आजाद ने इस बात के संकेत दिए कि मोदी सरकार एक साथ चुनाव कराने को लेकर कितनी बेकरार है.

पिछले दिनों लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की अध्यक्षता वाली समिति ने 2013 से लेकर 2017 तक पांच सालों के लिए सर्वश्रेष्ठ सांसदों का चुनाव किया. 2015 के लिए यह सम्मान गुलाम नबी आजाद को दिया गया है. वहीं 2016 के लिए यह सम्मान तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिनेश त्रिवेदी को दिया गया है. कुछ राजनीतिक जानकार इन सम्मानों की घोषणा को साथ चुनाव कराने के मसले पर विपक्षी नेताओं का समर्थन हासिल करने की रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं.

संघ विचारधारा से प्रभावित रामभाऊ म्हालिगी प्रबोधिनी संस्था ने पिछले दिनों इस विषय पर दो दिनों का राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया. इस संस्था के कर्ताधर्ता भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे हैं. इस सेमिनार में न सिर्फ भाजपा के प्रमुख नेता शामिल हुए बल्कि दूसरे दलों के नेताओं ने भी इसमें शिरकत की. इनमें जनता दल यूनाइटेड के केसी त्यागी और बीजू जनता दल के पूर्व नेता वैजयंत पांडा प्रमुख हैं. इनके अलावा नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार समेत चुनाव आयोग के कुछ पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस सेमिनार में हिस्सा लिया. साथ ही, अकादमिक क्षेत्र के कई लोग इस सेमिनार में शामिल हुए. यहां इस बात पर सहमति बनाने की कोशिश हुई कि एक साथ चुनाव कराना लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती देने के लिए कितना जरूरी है.

इसके अलावा भाजपा ने साथ चुनाव कराने को लेकर सहमति बनाने के लिए दूसरे क्षेत्रीय दलों से भी संपर्क साधा है. पार्टी नेताओं का कहना है कि लोकसभा में बहुमत होने और अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकार होने के बावजूद इस काम को करने में राज्यसभा की अड़चन है. भाजपा लाख चाहकर भी बगैर विपक्षी दलों के समर्थन के यह काम नहीं कर सकती क्योंकि इसके लिए संविधान संशोधन करना होगा और यह काम राज्यसभा के बगैर नहीं हो सकता.

चर्चा तो यह भी है कि भाजपा ने अगर इस मोर्चे पर सियासी सहमति बनाने में कामयाबी हासिल कर ली तो मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल थोड़ा घटाया या बढ़ाया जा सकता है. भाजपा नेताओं की मानें तो सरकार और पार्टी में शीर्ष स्तर पर यह बात चल रही है कि अगर साथ चुनाव कराने की योजना बनती है तो मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ा दिया जाए. कहा तो यह भी जा रहा है कि अगर विपक्ष की ओर से इस बात पर सहमति बनती है कि लोकसभा चुनाव इस साल ​अक्टूबर-नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों के साथ कराए जाएं तो भी केंद्र सरकार इसके लिए तैयार हो सकती है. कुल मिलाजुला कर इन बातों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मोदी सरकार और भाजपा किसी भी कीमत पर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराना चाहते हैं.

हालांकि, इस कोशिश को असंभव बताने का काम भाजपा के सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के सर्वेसर्वा और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया है. नीतीश ने पहले इस कोशिश का समर्थन किया था, लेकिन अब वे इसे एक अच्छा विचार मानते हुए असंभव बता रहे हैं. इसी तरह की बात कुछ विपक्षी दलों ने भी की है. ऐसे में मोदी सरकार इस विषय पर राजनीतिक सहमति बनाने में कितना कामयाब होगी, इसका अंदाजा आने वाले कुछ महीनों में लगेगा.