बुधवार को मौजूदा वित्त वर्ष की आखिरी बैठक में भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने ब्याज दरों में कोई बदलाव न करने का ऐलान किया है. इसके अलावा उसने 2017-18 की दूसरी छमाही में महंगाई का अपना अनुमान बढ़ा दिया है. दूसरी ओर, उसने इस साल और अगले साल के लिए विकास दर के आकलन को थोड़ा घटा दिया है. केंद्रीय बैंक के इन फैसलों को जानकार अनुमानों के मुताबिक बता रहे हैं. उनका यह भी कहना है कि अब आर्थिक मोर्चे पर बिना कोई बड़ा बदलाव हुए 2018 में ब्याज दरों के घटने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है.

एमपीसी की हर दो महीने पर होने वाली बैठक के बाद आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने बताया है कि सरकार ने केंद्रीय बजट में कई ऐसे फैसले लिए हैं जिनसे महंगाई बढ़ने का खतरा है. उनका इशारा खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी करने और राजकोषीय घाटा कम करने के लक्ष्य में छूट देने वाले केंद्र के फैसलों के बारे में था. उन्होंने कहा कि एमएसपी बढ़ाने के फैसले का विस्तृत ब्योरा मिलने में अभी तीन से चार महीने लगेंगे. वहीं राजकोषीय घाटे पर केंद्र के फैसले का मतलब यह हुआ कि सरकार 2017-18 और 2018-19 में पहले से ज्यादा पैसे खर्च करेगी.

उर्जित पटेल ने कहा कि आरबीआई इन सभी कारकों का विस्तृत अध्यन करने के बाद महंगाई के अनुमान को संशोधित करेगा और उसके अनुसार ही ब्याज दरों में बदलाव का कोई फैसला लिया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि एक-दो तिमाहियों के बजाय लंबे समय में महंगाई के हाल पर उनकी नजर है. उनका यह भी कहना था कि आरबीआई का मुख्य लक्ष्य महंगाई को चार फीसदी के आसपास बनाए रखना है. मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक अब चार अप्रैल से शुरू होगी जबकि पांच अप्रैल को नीतिगत दरों का ऐलान किया जाएगा.

आरबीआई के पांच प्रमुख फैसले और उनके मायने

1. आरबीआई ने पहले की तरह रेपो दर को छह और रिवर्स रेपो दर को 5.75 फीसदी पर बरकरार रखा है. उसने नगद जमा अनुपात (सीआरआर) और वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) की दरों में भी कोई परिवर्तन नहीं किया है. ये अब भी पहले के स्तर यानी क्रमश: चार और 19.5 फीसदी पर बने रहेंगे.

आरबीआई द्वारा इन तरीकों को बाजार में नकदी का प्रवाह संतुलित करने के लिए लागू किया जाता है. रेपो दर बैंकों द्वारा आरबीआई से लिए गए कर्ज (अधिकतम दो हफ्ते के लिए) पर वसूली जाने वाली ब्याज दर को कहा जाता है. वहीं बैंकों द्वारा अधिकतम दो हफ्ते के लिए आरबीआई के पास जमा की जाने वाली राशि पर मिलने वाली ब्याज दर को रिवर्स रेपो रेट कहते हैं. सीआरआर और एसएलआर बैंकों द्वारा ग्राहकों को कर्ज देने के लिए उपलब्ध राशि का निश्चित हिस्सा होते हैं जिसे बाजार में नकदी का प्रवाह नियंत्रित करने के लिए अपनाया जाता है. हालांकि सीआरआर को आरबीआई के पास जमा किया जाता है लेकिन एसएलआर नगद, सोने आदि रूपों में उसी बैंक के पास रिजर्व रखा जाता है.

2. केंद्रीय बैंक ने इसके अलावा मौजूदा वित्त वर्ष में महंगाई का अपना अनुमान बढ़ा दिया है. उसने कहा है कि इस साल चौथी तिमाही में औसत खुदरा महंगाई दर 5.1 फीसदी रह सकती है जबकि तीसरी तिमाही में यह 4.6 रही है. हालांकि दिसंबर में उसने कहा था कि यह दूसरी छमाही में 4.3 से 4.7 फीसदी के बीच रह सकती है.

इस बारे में आरबीआई ने कहा कि यह तेजी नवंबर में खाद्य पदार्थों की असमान्य महंगाई के चलते आई है. हालांकि दिसंबर में इसमें कमी हुई है, लेकिन यह उम्मीद से कम है. कच्चे तेल के और महंगा होने, सातवें वेतनमान आयोग का एचआरए मिलने से मांग में हुई तेजी और बेस इफेक्ट के चलते महंगाई के अभी और बढ़ने का आकलन भी लगाया गया है. जीएसटी की दरों में कटौती होने को भी महंगाई बढ़ने का कारण बताया गया है.

आरबीआई ने इसके अलावा अगले वित्त वर्ष के लिए महंगाई का आकलन भी जारी कर दिया है. उसके अनुसार 2018-19 में इसका औसत पांच फीसदी के आसपास रह सकता है. पहली छमाही में इसके 5.1 से 5.6 फीसदी के बीच रहने का अनुमान है तो दूसरी छमाही में यह 4.5-4.6 फीसदी के दायरे में रह सकती है. हालांकि उर्जित पटेल ने इस साल के उत्तरार्द्ध में कच्चे तेल के सस्ता होने का अनुमान लगाया है. उस समय बेस इफेक्ट के चलते भी इसमें थोड़ी कमी आ सकती है.

3. आरबीआई ने अपने ऐलान में मौजूदा वित्त वर्ष के लिए विकास दर का अनुमान 6.7 फीसदी से घटाकर 6.6 फीसदी कर दिया है. इसके अलावा 2018-19 के बारे में उसने कहा है कि इस दौरान यह दर 7.2 फीसदी के आसपास रह सकती है. केंद्रीय बैंक का यह बयान राहत की बात है कि अब अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ने के शुरुआती लक्षण दिख रहे हैं जिसके भविष्य में और तेज होने की संभावना है. इसके अलावा उसने माना है कि जीएसटी के चलते आई अनिश्चितता अब थम रही है. उसने दूसरे देशों में मांग के सुधरने के चलते निर्यात बढ़ने की बात भी कही है.

4. आरबीआई ने लंबी अवधि के कर्ज पर वसूली जाने वाली ब्याज दर गणना की मौजूदा पद्धति में बड़े बदलाव का ऐलान कर दिया है. इसके तहत अब आरबीआई एक अप्रैल, 2018 से बैंक दर को एमसीएलआर (मार्जिनल कॉस्ट आॅफ फंड बेस्ड लेंडिग रेट) से स्वत: जोड़ देगा. इसके बाद ब्याज दर हर महीने एमसीएलआर में होने वाले बदलाव के अनुसार घटने-बढ़ने लगेंगी. एमसीएलआर प्रणाली के तहत कर्ज की लागत बैंक दर से कम आती है, इसलिए आरबीआई के इस फैसले को आम ग्राहकों के लिए फायदेमंद माना जा रहा है. इससे पहले रघुराम राजन ने एक अप्रैल, 2016 के बाद के सभी कर्जों के लिए एमसीएलआर प्रणाली के तहत ब्याज वसूलने की शुरुआत की थी. आरबीआई ने दो साल पहले सोचा था कि सभी बैंक धीरे-धीरे नई प्रणाली में शिफ्ट हो जाएंगे पर ऐसा हुआ नहीं.

5. मौद्रिक नीति समिति ने बैंकों के फंसे हुए कर्ज की समस्या को दूर करने के लिए उठाए जा रहे कदमों को सही दिशा में जाता हुआ बताया है. उसने इसके लिए इन्सॉल्वेन्सी और बैंकरप्सी कोड के तहत की जा रही कार्रवाई को और तेज करने की बात कही है. इसके अलावा बैंकों में और पैसा डालने के सरकार के फैसले को अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाला कदम बताया गया है. समिति ने उम्मीद जाहिर की है कि सरकार के इस फैसले से आने वाले समय में बैंकों की कर्ज देने की क्षमता बढ़ेगी जिससे बाजार में मांग को बढ़ावा दिया जा सकेगा.