भारत के पड़ोसी समुद्री देश मालदीव में राजनीतिक संकट इस हफ्ते और गहरा गया. बीते सोमवार को राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन ने देश में 15 दिनों के लिए आपातकाल लगाने का ऐलान कर दिया. इसके बाद मालदीव के मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और पूर्व राष्ट्रपति मामून अब्दुल गयूम को गिरफ्तार कर लिया गया. इससे पहले साल 2004 और 2015 में मालदीव के लोगों को आपातकाल का सामना करना पड़ा था.

बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने आतंकवाद के आरोपों का सामना कर रहे पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद के खिलाफ चल रहे मामले को गैर-कानूनी करार दिया था. साथ ही, उसने विपक्ष के नौ सांसदों को कैद से रिहा करने का आदेश दिया था. हालांकि, अब्दुल्ला यमीन ने अदालत के इस आदेश को मानने से इनकार करने के साथ संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया. बताया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद विपक्ष द्वारा संसद में बहुमत हासिल करने की संभावना बढ़ गई है.

दूसरी ओर, पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने आपातकाल की घोषणा को असंवैधानिक और गैर-कानूनी बताते हुए भारत से तत्काल सैन्य और कूटनीतिक मदद की मांग की है. इसके अलावा मालदीव के सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष ने भी सहायता के लिए भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखा है. इससे पहले साल 1988 में भारत ने सेना भेजकर मालदीव में सत्तापलट की कोशिश नाकाम की थी. भारत सरकार ने ताजा राजनीतिक संकट पर चिंता जताते हुए मालदीव में रह रहे 22,000 प्रवासी भारतीयों से सतर्क रहने को कहा है. इसके अलावा आपात परिस्थिति पैदा होने पर भारतीय प्रवासियों और पर्यटकों को वहां से निकालने के लिए सेना को तैयार रहने के लिए कहा गया है.

उधर, चीन ने इसे मालदीव का आंतरिक मामला करार देते हुए भारत को इससे दूर रहने के लिए कहा है. चीन की भारत को इस हिदायत पर मोहम्मद नशीद का कहना था, ‘आतंरिक तौर पर मामले को सुलझाने की बात कहना विद्रोह को और बढ़ावा देना है. इससे वहां उपद्रव बढ़ सकता है. मालदीव ने भारत की सकारात्मक भूमिका पहले भी देखी है. भारत कब्जा जमाने वाला नहीं बल्कि, संकट से मुक्ति दिलाने वाला देश है. यही वजह है कि मालदीव एक बार फिर भारत की ओर देख रहा है.’

मालदीव को 1965 में ब्रिटेन से आजादी मिली थी. इसके बाद मामून अब्दुल गयूम की कई दशक लंबी तानाशाही के बाद 2008 में वहां पहली बार स्वतंत्र चुनाव हुए. इस चुनाव में मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) के नेता मोहम्मद नशीद ने अब्दुल गयूम को मात दी. वे देश के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति चुने गए. इसके बाद साल 2012 में देश में राजनीतिक संकट उस वक्त गहरा गया जब सरकार ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को गिरफ्तार कर लिया. इससे पहले उन्होंने सरकार का विरोध करने वाले एक व्यक्ति को जेल से रिहा करने का आदेश दिया था. इसके बाद राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को अपना पद छोड़ना पड़ा. साथ ही, उन पर मुख्य न्यायाधीश को गैर-कानूनी रूप से जेल भेजन को लेकर मामला दर्ज किया गया. इसके बाद मोहम्मद वहीद हसन मालदीव के राष्ट्रपति बने. 2008 के पांच साल बाद 2013 में हुए चुनाव में प्रोगेसिव पार्टी ऑफ मालदीव के अब्दुल्ला यमीन को राष्ट्रपति चुना गया.

मालदीव के ताजा राजनीतिक संकट पर देश के प्रमुख अखबारों ने अपने संपादकीय के जरिए विचार रखने की कोशिश की है. अधिकांश अखबारों ने इस संकट के लिए राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन को दोषी ठहराया है. साथ ही, इस संकट को लेकर चीन द्वारा फायदा उठाने की संभावना जाहिर की गई है. दूसरी ओर, अखबारों ने मालदीव के विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारत से मदद की मांग पर भी अपनी-अपनी राय पाठकों के सामने रखी है.

मालदीव के इस बड़े राजनीतिक संकट पर अमर उजाला का कहना है कि चौतरफा घिर चुके राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन किसी तरह सत्ता में बने रहना चाहते हैं. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस साल अक्टूबर में होने वाले चुनाव में अब्दुल नशीद के उतरने का रास्ता साफ हो गया. अखबार का आगे कहना है कि मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति के भारत सहित पश्चिम के देशों के साथ अच्छे संबंध हैं. इस वजह से अब्दुल्ला यमीन पर अतंरराष्ट्रीय दबाव लगातार बना हुआ है. दूसरी ओर, अब्दुल नशीद के सत्ता से हटने के बाद मालदीव में चीन का निवेश लगातार बढ़ा है. अखबार के मुताबिक इससे भारत और मालदीव के बीच दूरी भी बढ़ी है. संपादकीय के आखिर में कहा गया है कि इसके बावजूद भारत को स्थिति बिगड़ने से पहले मालदीव में जरूरी दखल देने से नहीं हिचकना चाहिए.

उधर, हिन्दुस्तान का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश मालदीव में अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक और सरकारी दमन पर विराम लगाने वाला है, जो राष्ट्रपति के गले के नीचे नहीं उतर रहा है. अखबार के मुताबिक अब्दुल्ला यमीन गयूम जानते हैं कि अदालती आदेश को लागू किए जाने के बाद विपक्ष मजबूत होकर उभरेगा. मालदीव के इस संकट में भारत के दखल पर हिंदी के इस प्रमुख दैनिक का कहना है कि भारत की नीति दूसरे के मामले में दखल न देने की रही है लेकिन, खतरे के संकेत नजर आने पर कुछ सोचना ही पड़ता है.

जनसत्ता के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन की नींद उड़ा दी क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि इसे लागू किए जाने पर उनकी सत्ता चली जाएगी. अखबार आगे लिखता है कि मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक आरोपितों पर दर्ज मामलों को केवल खारिज किया है, इसलिए इसे कार्यपालिका के काम में दखल देना नहीं कहा जा सकता है. जनसत्ता के मुताबिक भले ही अभी आपातकाल 15 दिनों के लिए लगाया गया हो लेकिन, इसकी संभावना बहुत ही कम है कि इसके बाद यह हटा लिया जाएगा. अखबार को लगता है कि चीन इस संकट का फायदा उठाकर मालदीव में अपनी पैठ बढ़ा सकता है.

उधर, देश के प्रमुख अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स का कहना है कि अब्दुल्ला यमीन ने मालदीव में लगातार बहुदलीय लोकतंत्र को कमजोर करने का काम किया है. अपने संपादकीय में अखबार लिखता है कि बीते साल यमीन ने विपक्ष द्वारा संसद के अध्यक्ष का विरोध रोकने के लिए सैनिकों का इस्तेमाल किया था. इसके अलावा उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ विरोध प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने का भी काम किया है. अखबार ने मालदीव में चीन की बढ़ती भूमिका और स्थानीय नागरिकों के आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) में शामिल होने का भी जिक्र किया है. आखिर में मालदीव की विपक्षी पार्टियों द्वारा भारत के दखल देने की मांग पर हिंदुस्तान टाइम्स का मानना है कि इस बारे में सोच-समझ कर चलना होगा ताकि दुनिया में यह संदेश न जाए कि भारत किसी एक का पक्ष ले रहा है.