भारत और पाकिस्तान के बीच 2003 में हुआ संघर्ष विराम समझौता अब कागजों पर ही बचा है. इस समय नियंत्रण रेखा पर हर दिन गोलीबारी की घटनाएं हो रही हैं जिनमें जानमाल का नुकसान भी जारी है. परमाणु हथियारों से लैस इन दो देशों के बीच संघर्ष विराम समझौते को बचाने का अब एक ही रास्ता नजर आ रहा है और वह है उच्च स्तरीय राजनीतिक हस्तक्षेप.

भारत को पहुंचे नुकसान की सबसे ताजा घटना बीते इतवार की है. इस दिन कश्मीर के भिंबर गली सेक्टर में पाकिस्तान की तरफ से हुई गोलीबारी में सेना के एक कैप्टन सहित चार जवान शहीद हुए हैं. दोनों देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर बीते कुछ महीनों से जो स्थितियां बनी हैं, ये घटनाएं उसी का नतीजा हैं. यही वजह है कि संघर्ष विराम समझौते के 15 साल के दौरान 2017 ऐसा साल साबित हुआ है जब इसका सबसे ज्यादा बार उल्लंघन हुआ.

डेढ़ दशक पहले संघर्ष विराम होने के साथ ही दोनों देशों में सैन्य जानमाल का नुकसान नाटकीय रूप से कम हो गया था. सालों से शिविरों में रह रहे सीमा क्षेत्र के बाशिंदे भी अपने-अपने घरों में लौट गए थे. आज 2003 के उस समझौते को फिर याद करने की जरूरत है, और वे विपरीत परिस्थितियां जानने की भी, जिनके बावजूद संघर्ष विराम पर सहमति बन पाई थी.

यह समझौता कारगिल युद्ध के ठीक चार साल बाद अस्तित्व में आ गया था. वहीं इससे पहले 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद पर आतंकी हमले के बाद दोनों देश युद्ध की कगार पर पहुंच चुके थे. यानी इस लिहाज से भी यह समझौता ऐतिहासिक था और साथ ही यह एक कूटनीतिक जीत का प्रतीक था. तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मीर जफारुल्लाह खान जमाली ने ईद के दिन नियंत्रण रेखा पर एक-तरफा संघर्ष विराम की घोषणा की थी. भारत ने इसे सियाचिन तक बढ़ाने का सुझाव दिया था और इसके बाद अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भी संघर्ष विराम लागू हो गया था. यह प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल की बात है और उनके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसे कायम रखने पर जोर देते रहे.

इस समय सीमा पर तकरीबन हर दिन गोलीबारी की घटनाएं हो रही हैं और अब खतरा यह भी हो गया है कि इसको लेकर राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू न हो जाए. संघर्ष विराम समझौते के लिए 2017 सबसे बुरा साल साबित हुआ है. बीते साल संघर्ष विराम उल्लंघन की 860 घटनाएं हुई हैं. जबकि 2016 में ऐसी 228 और एक साल पहले 152 घटनाएं हुई थीं. अनुमान के मुताबिक 2003 के बाद इस साल का पहला महीना ऐसा बीता है जब सबसे ज्यादा बार संघर्ष विराम उल्लंघन हुआ.

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पेश हुए आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान की तरफ से हुई गोलीबारी में 18 से 22 जनवरी के बीच सात नागरिकों सहित 14 लोगों को जान गंवानी पड़ी है, वहीं 70 लोग घायल हुए हैं. इसके साथ ही बीते दिनों में सीमा-क्षेत्र के हजारों लोगों अपने घर छोड़ने पड़े हैं. यह तय बात है कि सैन्य नेतृत्व के सहारे यहां शांति स्थापित नहीं की जा सकती. अब ऐसा तभी मुमकिन है जब दोनों पक्षों की तरफ से चतुराई और पूरी गंभीरता के साथ राजनीतिक-कूटनीतिक प्रयास शुरू हों. (स्रोत)