मालदीव में पैदा हुए संवैधानिक संकट का फिलहाल कोई हल निकलता नहीं दिखता. सूत्र बताते हैं कि मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन ने इस बाबत बातचीत के लिए एक ‘विशेष दूत’ अपने ‘मित्र देशों’ में भेजने की पेशक्रश की है. इन देशों में भारत भी शामिल था. लेकिन भारत ने मालदीव के विशेष दूत से मिलने से इंकार कर दिया है.

द हिंदू के मुताबिक़ मालदीव के राष्ट्रपति यमीन ने जिस तरह देश में आपातकाल लगाया और उसके बााद जो क़दम उठाए उससे भारत खुश नहीं है. सूत्रों ने अख़बार को बताया, ‘भारत ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी मालदीव के घटनाक्रमों से चिंतित है. उन चिंताओं के निदान के लिए अब तक मालदीव की मौज़ूदा सरकार ने ठोस कार्रवाई नहीं की है. लोकतांत्रिक संस्थाएं और न्यायपालिका की अब भी अनदेखी की जा रही है. उनकी चिंताओं पर भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है. भारत का मानना है कि सबसे पहले इन्हीं चिंताओं का निदान किया जाना चाहिए.’

सूत्र बताते हैं कि भारत ने मालदीव के ‘विशेष दूत’ से मिलने से इसलिए भी इंकार किया क्योंकि उनकी ओर से पर्याप्त समय रहते इसकी सूचना नहीं दी गई. और इस वक़्त जब माले (मालदीव की राजधानी) ने दूत भेजने की पेशकश की तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज दोनों ही विदेश यात्रा पर हैं. इसलिए भी उनके दूत से मुलाक़ात अभी संभव नहीं है. भारत में मालदीव के उच्चायुक्त अहमद मोहम्मद ने इस बाबत कहा है, ‘विशेष दूत की नई दिल्ली यात्रा के लिए हमने जो तारीख़ें प्रस्तावित की थीं उन्हें विदेश मंत्रालय (भारतीय) ने ख़ारिज़ किया है.’

उन्होंने बताया, ‘हमारे विशेष दूत को मित्र देशों की यात्रा के तहत सबसे पहले भारत आना था. लेकिन उनकी यात्रा की तारीख़ें भारतीय नेतृत्व केे अनुकूल नहीं थीं. इसलिए अब वे पाकिस्तान, चीन और सऊदी अरब होकर आएंगे.’ ग़ौरतलब है कि अभी नौ फरवरी को मालदीव के राष्ट्रपति यमीन के आदेश पर देश की शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश और कई बड़े राजनेताओं को ग़िरफ़्तार कर लिया गया था. साथ ही सभी अहम जगहों पर सेना तैनात कर दी गई थी.