ईरान में बीते दिसंबर में हुए प्रदर्शन जनवरी की शुरुआत में खत्म हो चुके हैं. इसके बावजूद आए दिन किसी न किसी मुद्दे को लेकर प्रदर्शनकारी सड़कों पर आ जाते हैं. बीती 15 जनवरी को अलग-अलग जेलों में हुई दो प्रदर्शनकारियों की मौत के बाद वहां कई जगह जमकर प्रदर्शन हुआ. इस प्रदर्शन के शांत होने के बाद पिछले हफ्ते हिजाब की अनिवार्यता के कानून के विरोध में महिलाओं ने कई शहरों में प्रदर्शन किया. ईरान की पुलिस ने इस मामले में 29 महिलाओं को गिरफ्तार भी किया.

ईरान में पिछले करीब डेढ़ महीने से किसी न किसी मुद्दे को लेकर हो रहे इन प्रदर्शनों के पीछे कई जानकार हैरान करने वाली वजह बताते हैं. इनके मुताबिक ईरान में जिस तरह के हालात बन गए हैं उसे देखते हुए लगभग हर महीने ऐसे प्रदर्शन देखने को मिलते रहेंगे. इन लोगों की मानें तो वहां की जनता में सरकार के खिलाफ भारी असंतोष है जिसका कारण उनकी मुश्किलों का अंत न होना है.

साल 2013 में हुए चुनावों में 51 फीसदी वोट पाकर सत्ता में आए हसन रूहानी ने लोगों से कई वादे किए थे. इनमें ईरान पर लगे प्रतिबंध हटवाना, रोजगार, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, बोलने की आजादी और महिलाओं के लिए समानता जैसे मुद्दे प्रमुख थे.

रूहानी ने सत्ता में आते ही परमाणु समझौते को लेकर जर्मनी से बातचीत शुरू की. कोशिश रंग लायी और जुलाई 2015 में वे पश्चिमी देशों से परमाणु समझौता करने और प्रतिबंध हटवाने में कामयाब रहे. बीते साल हुए चुनाव में ईरान की जनता ने रूहानी को फिर चुना जिसका कारण परमाणु समझौता और रूहानी की उदारवादी छवि को माना जाता है. जनता को विश्वास था कि प्रतिबंध हटवाने वाले रूहानी ही उसके सारे संकटों का हल निकालेंगे.

लेकिन, रूहानी लोगों की उम्मीदें पूरी करने में विफल रहे. न तो वे ईरान की अर्थव्यवस्था को ही पटरी पर ला पाए और न ही रोजगार और नागरिक समानता के मामले में कुछ कर पाए. विश्लेषकों के मुताबिक आठ करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश की आधी आबादी 30 से कम उम्र वालों की है. इनमें से 40 फीसदी युवा बेरोजगार हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार ईरान को हर साल 12 लाख रोजगार के नये अवसर पैदा करने की जरूरत है ताकि हर साल पढ़ाई खत्म करने वाले युवाओं को नौकरी मिल सके. लेकिन, हकीकत में हर साल सिर्फ छह लाख नौकरियां पैदा हो रही हैं.

ईरान बेरोजगारी का बड़ा कारण सूखे की मार के चलते ग्रामीण इलाकों के लाखों लोगों का शहरों की ओर रुख करना भी माना जाता है. दूर दराज के इलाकों में पानी की कमी के कारण खेती बरबाद हो चुकी है. कोहगिलूयेह और बोयरअहमद कभी ईरान के सबसे अमीर प्रांतों में गिने जाते थे. लेकिन, सूखे के कारण लोग इन इलाकों को छोड़कर शहरों की ओर रुख कर रहे हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के शहरों में करीब 40 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करती है. यही आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्रों में 60 से 70 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. ईरान के कुछ जानकारों के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में ऐसे हालात में लोगों की परेशानी तब और बढ़ गई जब महंगाई आसमान छूने लगी.

ईरान के अधिकांश नागरिक खराब आर्थिक स्थिति के लिए सरकार की विदेश नीति को भी जिम्मेदार मानते हैं. इनका कहना है कि ईरान सरकार को सीरिया, यमन और इराक में शिया लड़ाकों को पैसा भेजना बंद कर पहले अपने घर के हालात सुधारने चाहिए.

कुल मिलाकर देखें तो ईरान में हर तबका सरकार से बेहद नाराज है और यही कारण है कि जब बीते दिसंबर में मशाद शहर में प्रदर्शन शुरू हुआ तो इसके देशव्यापी बनने में देर न लगी. कई लोगों का यह भी कहना है कि 2015 में परमाणु समझौता होने के बाद दो साल तक जनता ने हालात सुधरने का इंतजार किया लेकिन, उसकी स्थिति में कोई बदलाव न होने के कारण अब उसके सब्र का बांध टूट गया.

हसन रूहानी से ज्यादा अयातुल्लाह अली खामेनेई जिम्मेदार

ईरान के मामलों के विशेषज्ञ और अमेरिका के इंडियाना विश्विद्यालय में प्रोफेसर हैदर खेजरी ईरान में इस कदर बिगड़े हालात के लिए हसन रूहानी से ज्यादा ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को जिम्मेदार मानते हैं, जो राष्ट्रपति से कहीं ज्यादा ताकतवर हैं.

1979 में हुई ईरान की इस्लामिक क्रांति के दौरान 2500 साल पुराने राजतंत्र को जनता ने उखाड़ फेंका था. इसके बाद हुए एक जनमत संग्रह में जनता ने इस क्रांति के जनक अयातुल्लाह खुमैनी को हमेशा के लिए देश का प्रमुख और सर्वोच्च धार्मिक नेता चुना. इस समय बनाए गए ईरान के संविधान में खुमैनी को सारी ताकत दे दी गई. साथ ही ईरान को इस्लामिक गणराज्य घोषित करते हुए इस्लामी कानून पूरे देश में लागू किया गया. 1989 में अयातुल्लाह खुमैनी की मौत के बाद अयातुल्लाह अली खामेनेई को देश का प्रमुख और सर्वोच्च धार्मिक नेता चुना गया.

ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई (बायें) और दायीं ओर राष्ट्रपति हसन रूहानी | फोटो: एएफपी
ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई (बायें) और दायीं ओर राष्ट्रपति हसन रूहानी | फोटो: एएफपी

दुनिया के अधिकांश देशों में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि के हाथ में ज्यादा ताकत दी जाती है लेकिन, ईरान में ठीक इसका उल्टा है. यहां जनता द्वारा चुने गए राष्ट्रपति से कहीं ज्यादा ताकत सर्वोच्च धार्मिक नेता के पास है. ईरान में सेना, न्यायपालिका, राजकोष, मीडिया, विदेश नीति, राष्ट्रपति की कैबिनेट और विधायिका की प्रक्रिया पर भी उसका ही नियंत्रण है.

ईरान में हर साल बजट का एक बड़ा हिस्सा खामेनेई के कार्यालय को भेजा जाता है. इसे लेकर भी लोगों में खासी नाराजगी रहती है. दरअसल, इस पैसे का खामेनेई कहां और कैसे उपयोग करते हैं, उनसे यह कोई नहीं पूछ सकता. राष्ट्रपति इस पैसे का हिसाब भी नहीं ले सकता. बताते हैं कि यह पैसा खामेनेई के अधीन कई धार्मिक संस्थानों को भेजा जाता है. साथ ही वह इसका इस्तेमाल अन्य देशों के शिया समुदाय के बीच अपने प्रभुत्व को बढ़ाने के लिए करते हैं.

विदेश नीति और रक्षा से जुड़े मामलों की बात करें तो 2011 में सीरिया और इसके बाद ईराक में ईरानी फ़ौज भेजने का फैसला अयातुल्लाह अली खामेनेई का ही था. पिछले सालों में ईरान को सबसे बड़ा दुख देने वाला विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम भी खामेनेई की महत्वाकांक्षा का ही परिणाम माना जाता है जिसके चलते ईरान को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और दुनिया भर की आलोचना भी झेलनी पड़ी.

ईरानी मामलों के विशेषज्ञ बताते हैं कि रक्षा और विदेश नीति के अलावा छोटे मामलों में भी राष्ट्रपति के हाथ में कुछ नहीं है. इनके मुताबिक रूहानी ने पिछले दोनों चुनावों में महिला अधिकार को लेकर बड़े वादे किए थे. लेकिन, इस पर भी वे खुद कोई फैसला नहीं ले सकते क्योंकि महिलाओं के पहनावे पर नजर रखने वाले सरकारी संगठन उनके नियंत्रण में नहीं हैं. इसी तरह उन्होंने नागरिक अधिकार चार्टर बनाने का वादा किया था जिसका मकसद ईरान के नागरिकों को ज्यादा आजादी और अधिकार देना था. लेकिन, रूहानी के चार्टर को उनकी ही सरकार में खामेनेई द्वारा नियुक्त किए गए कानून मंत्री ने ठुकरा दिया.

प्रोफेसर हैदर खेजरी सहित कई जानकारों का मानना है कि जनता द्वारा चुने गए राष्ट्रपति के हाथ में न के बराबर शक्तियाँ होना ही ईरान की समस्याओं की मुख्य वजह है. इनके मुताबिक ईरान का राष्ट्रपति लोगों से तमाम वादे करके सत्ता में आता है लेकिन खामेनेई जैसे रुढ़िवादी धार्मिक नेता की वजह से वह इन वादों को पूरा करने की स्थिति में ही नहीं होता.

विश्लेषकों की मानें उदारवादी नेता और स्कॉटिश विश्विद्यालय से लॉ में डॉक्टरेट कर चुके राष्ट्रपति हसन रूहानी भी अच्छे से जानते हैं कि दशकों से बनी ईरान की व्यवस्था के जरिये अब देश नहीं चलाया जा सकता. वे यह भी समझते हैं कि जनता इस व्यवस्था को पूरी तरह बदलना चाहती है लेकिन रूहानी लाख चाहने के बाद भी इस व्यवस्था को नहीं बदल सकते. एक तो वह खुद एक धार्मिक नेता यानी मौलवी हैं जो इस्लामिक गणराज्य के प्रति वफादार है. दूसरा कारण यह है कि इससे पहले जिसने भी ईरान की धार्मिक सत्ता का विरोध किया उसे न सिर्फ सत्ता बल्कि राजनीति से भी कोसों दूर कर दिया गया. 2009 के चुनाव में धांधली की शिकायत करने वाले विपक्षी नेता मेहदी कारूही, मीर हुसैन मुसावी और उनकी पत्नी जाहरा रानार्द अभी भी नजरबंद हैं.

ईरान की स्थिति को देखते हुए ज्यादातर विशेषज्ञ इस बात पर एक राय हैं कि जब तक ईरान में धार्मिक सत्ता यानी अयातुल्लाह खामेनेई का शासन कायम है तब तक वहां चल रही उथल-पुथल की स्थिति एक स्थायी अवस्था जैसी बनी रहेगी.

और पढ़ें - डोनाल्ड ट्रंप लाख चाहने पर भी ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को क्यों नहीं तोड़ पा रहे हैं?