इस गर्मी के मौसम में कांग्रेस पार्टी के सामने एक बड़ी चुनौती होगी. कर्नाटक में अपना आख़िरी बड़ा सियासी गढ़ बचाए रखने की. चुनाव नज़दीक आते-आते मौसम कैसा रहेगा, यह तो धीरे-धीरे ही पता चलेगा. लेकिन फ़िलहाल मौसम के लिहाज़ से कांग्रेस के नेताओं को राहत मिली हुई दिखती है. बीते तीन साल के सूखे के बाद इस बार यानी 2017 के मानसून ने राज्य को खूब तर किया है. इसीलिए एक कांग्रेस के एक नेता कहते भी हैं, ‘हम इस बार खुशकिस्मत हैं. क्योंकि किसान खुश और व्यस्त हैं. मुख्यमंत्री ने एक महीने तक राज्य का दौरा किया. वे क़रीब 120 विधानसभा क्षेत्रों में गए. उन्हें कहीं विरोध प्रदर्शन, हड़ताल वग़ैरह का सामना नहीं करना पड़ा.’ कांग्रेस नेताओं की खुशी कुछ हद तक ठीक भी लगती है. क्योंकि इससे पहले 2004 में जब पार्टी सत्ता में रहते हुए चुनाव में उतरी थी तो सूखे की मार ने उसे बड़ी चोट पहुंचाई थी.

लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि किसानों में कोई गुस्सा नहीं है? तो इस सवाल का ज़वाब भी नहीं में ही है. यानी असंतोष है. और इस असंतोष की वज़ह उत्तर कर्नाटक के किसान चंद्रशेखर बासवराज हेब्बल बताते हैं. राज्य की राजधानी बेंगलुरू से 450 किलोमीटर दूर धारवाड़ जिले के किरासुर गांव में चंद्रशेखर की तीन एकड़ की खेती है. वे बताते हैं, ‘इस बार बारिश होने से फसल अच्छी हुई है. लेकिन कीमतें गिर गई हैं क्याेंकि उपज खूब हुई है. हमने ही खेत में जब काबुली चना बोया था तो उसकी कीमतें 6,000 रुपए प्रति क्विंटल चल रही थीं. मगर जब फसल काटने का वक़्त आया तो कीमतें 3,000 रुपए प्रति क्विंटल रह गईं.’ वे आगे कहते हैं, ‘यह कोई पहला मौका नहीं है. पहले भी ऐसा होता रहा है. लेकिन जब येद्दियुरप्पा मुख्यमंत्री थे तो हमें बेहतर कीमतें मिल जाती थीं. सिद्धारमैया के समय में ऐसा नहीं हो रहा है.’

येद्दियुरप्पा 2009 से 2011 तक राज्य की पहली भारतीय जनता पार्टी सरकार के मुख्यमंत्री थे. लेकिन 2011 में लोकायुक्त ने उन्हें खनन घोटाले में दोषी ठहराया. इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. इसके एक साल बाद उन्होंने भाजपा छोड़ दी और अपनी पार्टी बनाई. लेकिन 2013 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी केजेपी (कर्नाटक जनता पक्ष) बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकी और 2014 में येद्दियुरप्पा भाजपा में वापस लौट आए. उनकी पार्टी का भी भाजपा में विलय हो गया. अब फिर वे भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी हैं. येद्दियुरप्पा लिंगायत समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं, जो कर्नाटक के दो असरदार समुदायों में से एक है. यह समुदाय भाजपा का परंपरागत मतदाता माना जाता है. राज्य का दूसरा बड़ा और असरदार समुदाय वोक्कालिगा है.

बहरहाल बात चल रही थी सिद्धारमैया सरकार को किसानों के समर्थन की. तो यहां मामला मिला-जुला नज़र आता है. यानी कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि किसान सिद्धारमैया सरकार के साथ ही रहेंगे. इसका एक उदाहरण किरासुर के किसान चंद्रशेखर का पहले ही दिया जा चुका है. ऐसे ही दूसरे किसान हैं- हेब्बल. लिंगायत हैं लेकिन भाजपा या कांग्रेस में से किसकी तरफ़ जाएंगे शायद अभी तय नहीं कर पाए हैं. वे कहते हैं, ‘मैं सरकार को नियमित तौर पर फसल बीमा (यह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की योजना है) का प्रीमियम अदा करता हूं. लेकिन फसल का नुक़सान होने पर बीमा की राशि आज तक नहीं मिली. सिद्धारमैया सरकार ने 50,000 रुपए तक के ऐसे कर्ज़ माफ़ किए हैं जो राज्य सहकारी समितियों से लिए गए थे. जबकि मैंने एक निजी बैंक से 1,00,000 रुपए का कर्ज़ लिया है. यानी राज्य सरकार की ऋण माफ़ी से मेरे जैसे किसानों को कोई मदद नहीं मिलने वाली.’

लेकिन खेतिहर म़ज़दूर नागप्पा पावडी सिद्धारमैया सरकार से खुश हैं. वे कहते हैं, ‘हमें हाथ (कांग्रेस का चुनाव चिह्न) पसंद है क्योंकि उन्होंने ग़रीबों के लिए काम किया है.’ यहीं नागप्पा के साथ ही ट्रैक्टर ट्रॉली पर बैठे पकीरप्पा ऊंची आवाज़ में बताते हैं, ‘सिद्धारमैया ने हमें मुफ़्त चावल दिए हैं.’

और यह मुफ़्त चावल का मसला राज्य सरकार की अन्न भाग्य योजना से जुड़ा है. इसे देश की सबसे उदार खाद्य सुरक्षा योजना कहा जा सकता है. इसके तहत ग़रीबों को हर महीने पांच किलाे चावल और दो किलो गेहूं प्रति व्यक्ति के हिसाब से मुफ़्त दिया जाता है. इसके अलावा एक किलो तुअर दाल बाज़ार कीमत से आधे दाम पर उपलब्ध कराई जाती है.

हालांकि वोट देने-लेने का मसला आने पर स्वाभाविक असर जातियों का भी नज़र आता है. मसलन- ऊपर जिन खेतिहर मज़दूरों ने कांग्रेस के प्रति अपना समर्थन जताया वे कुरुबा समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं. यानी वह जाति जिससे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ख़ुद आते हैं. परंपरागत तौर पर यह चरवाहा समुदाय है और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में सबसे ज़्यादा तादाद राज्य में इसी वर्ग की है. और इस जाति का स्वाभाविक समर्थन सिद्धारमैया को है तो बड़े अचरज की बात नहीं है.

पर ख़ास बात है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति समर्थन जो युवाओं में ख़ास तौर पर नज़र आता है. उदाहरण के लिए कुरुबा समुदाय के ही एक युवा बासप्पा नगनूर. वे कहते हैं, ‘मुझे मोदी से बहुत उम्मीदें हैं. वे भी ग़रीब थे. अपने दम पर इतनी ऊंचाई तक पहुंचे. हालांकि तीन साल में उन्होंने लोगों के लिए ज़्यादा कुछ नहीं किया है सिवाय गैस सिलिंडर देने के. फिर भी मुझे उनसे अब भी आशा है कि वे बेहतर करेंगे.’

कांग्रेस अहिंद वोटों की भी गिनती कर रही है

जहां तक कांग्रेस का ताल्लुक़ है तो कर्नाटक में उसकी प्रतिष्ठा कहीं ज़्यादा दांव पर लगी है. ज़ाहिर तौर पर उसके दो कारण हैं. एक- पार्टी अभी वहां सरकार चला रही है. इसलिए चुनाव में वोटिंग भी सीधे तौर पर उसके कामकाज़ पर होगी. दूसरी बात- पंजाब को छोड़कर कर्नाटक इक़लौता ऐसा बड़ा राज्य है जहां कांग्रेस सत्ता में है. यहां से उसकी हार का मतलब उसकी प्रतिष्ठा को बड़ा झटका होगा. इस दोहरे दबाव के बावज़ूद कांग्रेस को लगता है कि उसकी स्थिति कर्नाटक में भाजपा से बेहतर है.

इसके क्या कारण हो सकते हैं? पार्टी के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष दिनेश गुंडू राव कहते हैं,, ‘मज़बूत नेतृत्व, स्थिर सरकार और कोई घोटाला नहीं. इससे भी बड़ी बात. हमने जो वादा किया उसे पूरा किया. पिछले चुनाव के वक़्त हमने घोषणा पत्र में 165 वादे किए थे. इनमें से 156 अब तक पूरे हो चुके हैं.’ समाज विज्ञानी एआर वसावी भी बताती हैं, ‘सरकार ने ऐसे विभागों के काम करने के तौर-तरीकों में ख़ास सुधार किया है जो सीधे लोगों से जुड़ते हैं. जो समाज कल्याण की योजनाओं और उनके कार्यान्वयन से संबंधित हैं जैसे- समाज कल्याण, खाद्य, पंचायत, महिला एवं बाल विकास आदि. मौज़ूदा सरकार की यह उपलब्धि उसे दूसरी सरकारों से अलग करती है.’ वसावी चामराजनगर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करती हैं.

शायद यह एक बड़ा कारण है जिसकी वजह से पार्टी ने अपने परंपरागत सामाजिक वोट बैंक (अहिंद यानी अल्पसंख्यक, हिंदू पिछड़ा वर्ग और दलित) पर पकड़ मज़बूत की है. अहिंद की यह अवधारणा राज्य के पहले ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) नेता देवराज उर्स की परिकल्पना थी. इसे मौज़ूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने नए सिरे से मज़बूती दी है. वह भी राज्य के पूरे सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए. इस बारे में बात करने पर राज्य कांग्रेस के एक नेता बताते हैं, ‘प्रदेश में दलित-आदिवासी 39 फ़ीसदी हैं. इनमें अनुसूचित जाति 17.14 प्रतिशत, ईसाई 14.79 और अनुसूचित जनजाति 6.95 फ़ीसद की भागीदार है.’ हालांकि यह भी सच है कि सभी अनुसूचित जातियां कांग्रेस को वोट नहीं करने वालीं.

जानकारों के मुताबिक़ कांग्रेस के दलित नेतृत्व में ज़्यादातर नेता चलावडी जाति से हैं. पार्टी का मताधार (वोट बेस) भी ज़ाहिर तौर पर इसी जाति में अधिक है. शायद इसी वज़ह से मडिगा दलित समुदाय भाजपा के साथ है. दलितों में सबसे बड़ी भागीदारी रखने वाले इन दोनों समुदायों को दाएं और बाएं हाथ जैसा माना जाता है. हालांकि कांग्रेस के एक नेता बड़े यक़ीन के साथ दावा करते हैं, ‘इस बार दायां हो या बायां दोनों ही हमारे लिए वोट डालेंगे. क्योंकि हमने दलित समुदाय के लिए काफ़ी काम किया है.’ वे इसका उदाहरण देते हुए बताते हैं, ‘सरकार ने 2013 में अनुसूचित जाति उपयोजना व आदिवासी उपयोजना अधिनियम पारित किया. इसमें प्रावधान है कि सरकार दलित-आदिवासी समुदायों पर उनकी आबादी के अनुपात में खर्च करेगी. साथ ही इन समुदायों के लिए आवंटित रकम अगर खर्च नहीं होती तो वह न लैप्स होगी न ही दूसरी किसी योजना में लगाई जाएगी.’

और अब सिद्धारमैया अपनी ऐसी ही उपलब्धियों को जनता के बीच ले जाकर ठेठ देहाती टोन में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं. यहां बताते चलें कि सिद्धारमैया मूल रूप से कांग्रेसी नहीं हैं. वे जनता पार्टी के नेता रहे हैं और 2006 में ही उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा था. इसीलिए पांच साल पहले जब विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी तो सबको अचरज हुआ. वसावी कहती भी हैं, ‘कन्नड़ प्रेस ने तो उन्हें छह महीने भी नहीं दिए. उनके बारे में ख़बरें चलने लगीं कि वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में सोते रहते हैं. लेकिन अब देखिए. हालात पूरी तरह बदले हुए हैं. बीते दो साल में तो उन्होंने जिस तरह भाजपा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला वह ख़ास तौर पर काबिले ग़ौर है.’

वैसे इसका एक निजी कारण भी बताया जाता है. मुख्यमंत्री के दफ़्तर में काम करने वाले एक अाईएएस अफ़सर की मानें तो, ‘उन्होंने 2016 में अपना बेटा खो दिया. इसके बाद वे अब पूरी ऊर्जा सिर्फ़ काम में लगा रहे हैं. शायद इसलिए कि दिवंगत बेटे की याद को भूल सकें. उनकी सक्रियता का एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है.’

ज़ाहिर तौर पर सिद्धारमैया की इस सक्रियता का असर कांग्रेस पर भी पड़ा है जो इन दिनों कुछ ज़्यादा ही आक्रामक नज़र आती है. गुंडू राव कहते हैं, ‘हमने तमाम समितियां बना ली हैं. पूरी पार्टी एकजुट है और कार्यकर्ता उत्साह से भरे हुए हैं.’ बताया जाता है कि मुख्यमंत्री ख़ुद उन तमाम 120 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं जिन्हें पार्टी ने पिछली बार जीता था. जबकि प्रदेश अध्यक्ष जी परमेश्वरा बाकी विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं.

राव कांग्रेस और भाजपा की कार्यशैली में फ़र्क़ भी बताते हैं. वे कहते हैं, ‘बीते एक महीने से येद्दियुरप्पा धारवाड़ जिले के सभी लिंगायत बहुल विधानसभा क्षेत्रों में गांव-गांव की ख़ाक़ छान रहे हैं. वहां वे लोगों से कहते हैं- अगर आप मुझे (येद्दि को) मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं तो भाजपा को वोट दीजिए. जबकि कांग्रेस के नेता लाेगों से कह रहे हैं कि अगर हमने पिछले सालों में काम किया है तो हमें फिर सेवा का मौका दीजिए. यह फ़र्क़ है दोनों पार्टियों की कार्यशैली में.’

कांग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीज़ों से भी सबक सीखा है. उस वक़्त पार्टी को सिर्फ़ नौ लोकसभा सीटों पर जीत मिली थी. जबकि भाजपा ने 17 जीत ली थीं. लेकिन उसके बाद कांग्रेस ने अपना प्रदर्शन सुधारते हुए फरवरी-2016 के ज़िला पंचायत चुनाव और फिर अप्रैल-2017 में दो विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में जीत के साथ शानदार वापसी की.

हालांकि कांग्रेस के कुछ नेताओं को डर भी है कि भाजपा आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों के दम पर चुनाव प्रभावित कर सकती है. ऐसे ही एक नेता नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘मुझे एक बड़े आदमी से वित्तीय मदद मिलती है. वह राजनीति में मेरे पितृ पुरुष जैसे हैं. लेकिन अगर उन्होंने किसी दबाव में आकर मेरा साथ नहीं दिया तो मैं ख़त्म हो जाऊंगा. क्योंकि मैं वित्तीय मदद के लिहाज़ से पूरी तरह उन पर ही निर्भर हूं.’

इधर भाजपा के लिए मोदी और हिंदुत्व का सहारा

दूसरी तरफ़ भाजपा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदुत्व का सहारा है. उसके नेता इस तथ्य को भी ध्यान में रख रहे हैं कि 1985 के बाद से कर्नाटक की जनता ने किसी पार्टी की सरकार को लगातार दूसरी बार मौका नहीं दिया. इसके अलावा उन्हें यह भी भरोसा है कि ख़ास तौर पर लिंगायत जैसी ऊंची जातियों में जो पार्टी का जनाधार है वह बरक़रार रहेगा. हालांकि लिंगायत समुदाय में अलग धर्म की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन को लेकर कुछ चिंता भी है. लेकिन ज़्यादातर भाजपा नेताओं का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के आगे ये चिंताएं धराशायी हो जाएंगी.

एक भाजपा नेता 2013 के चुनाव को याद करते हुए कहते हैं, ‘हम उस वक़्त साफ़ हो गए. विधानसभा में संख्या बल के लिहाज़ से तीसरे नंबर पर फिसल गए थे. लेकिन वे दिन गुजर चुके. इस बार हम मुक़ाबले में हैं. केंद्रीय नेतृत्व ने सभी अंदरूनी गुटों को ठंडा कर दिया है.’ दरअसल पिछले विधानसभा चुनाव के समय भाजपा तीन हिस्सों में बंटी हुई थी. उस वक्त येद्दियुरप्पा और खनन कारोबारी जनार्दन रेड्‌डी के निकट सहयोगी बी श्रीरामुलु ने दो अलग-अलग पार्टियां बना ली थीं. इससे भाजपा को काफ़ी नुक़सान हुआ था.

भाजपा में येद्दियुरप्पा को किसान-मित्र चेहरा माना जाता है. उनसे ग्रामीण इलाकों में भाजपा को बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है. लेकिन शहरी मतदाताओं को लेकर थोड़ी चिंता भी है. क्योंकि येद्दियुरप्पा की पिछली सरकार के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप अब एक बार फिर मुद्दा बने हुए हैं. यहां आकर पार्टी फिर प्रधानमंत्री मोदी के आसरे टिक जाती है. जैसा कि एक नेता दावा भी करते हैं, ‘मोदी बड़े से बड़े झटके बर्दाश्त कर लेते हैं. और उन्हीं को आगे रख हम लोगों को बता रहे हैं कि भाजपा की देश के 19 राज्यों में सरकार है. इनमें से 14 में पार्टी ख़ुद सरकार चला रही है जबकि पांच में गठबंधन के सहयोगी दलों के साथ. इनमें से किसी राज्य में भ्रष्टाचार का एक भी मामला अब तक सामने नहीं आया है क्योंकि केंद्रीय स्तर (मोदी सरकार) पर सभी सरकारों की सख़्त निगरानी की जा रही है.’

हालांकि मोदी पर निर्भरता भाजपा के लिए थोड़ी जोख़िम भरी भी है क्याेंकि सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार कन्नड़ अस्मिता और क्षेत्रीय गौरव के मसले को चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है. लेकिन भाजपा को लगता है कि कांग्रेस की यह रणनीति काम नहीं करेगी. पार्टी के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है. लेकिन उसकी सोच क्षेत्रीय पार्टियों जैसी है. इसका उसे नुक़सान होना तय है. क्योंकि कर्नाटक पूरा का पूरा कन्नड़ भाषी राज्य नहीं है. कहीं यहां मराठी बोली जाती है तो कहीं हिंदी. ऐसे कन्नड़ गौरव का हथियार हर जगह नहीं चलेगा.’

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी पर अतिनिर्भरता पार्टी के लिए किस तरह परेशानी बन सकती है इसकी एक झलक इसी चार फरवरी को दिखी. उस रोज मोदी बेंगलुरु में पार्टी कार्यकर्ताओं की बड़ी रैली को संबोधित कर रहे थे. शुद्ध हिंदी में दिया गया उनका भाषण ज़्यादातर लोगों तक पहुंचा ही नहीं. क्योंकि भीड़ का बड़ा हिस्सा सिर्फ़ कन्नड़ ही समझने वाला था. और मंच पर प्रधानमंत्री के भाषण का कन्नड़ में अनुवाद करने वाला भी कोई मौज़ूद नहीं था.

भाजपा की प्रदेशव्यापी परिवर्तन यात्रा की समाप्ति पर प्रधानमंत्री मोदी की सभा आयोजित की गई थी. यह यात्रा क़रीब 80 दिन तक चली. इसे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने बीते साल दो नवंबर को हरी झंडी दिखाई थी. रैली में प्रधानमंत्री ने सिद्धारमैया सरकार को ‘10 फ़ीसदी वाली सरकार’ बताया. यानी ऐसी सरकार जो हर परियोजना में 10 फ़ीसद कमीशन खाती है. लेकिन भ्रष्टाचार के मसले पर उनका यह संकेत-संदेश सिर्फ़ उन लोगों तक ही पहुंचा जो थोड़ी-कुछ हिंदी समझते थे. बाकी तो भाषण के दौरान ही दाएं-बाएं होते नज़र आए.

हालांकि पार्टी के कई नेता अब इस स्थिति का बचाव करते हुए नज़र आते हैं. एक नेता कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान कार्यकर्ताओं के इधर-उधर हो जाने का मतलब समझा गया. वे भाषण समझ में न आने की वज़ह से नहीं बल्कि मोटरसाइकिल रैली की वज़ह से इधर-उधर हुए थे. उनसे बेंगलुरु में मोटरसाइकिल रैली निकालने के लिए कहा गया था. लेकिन 200-300 किलोमीटर मोटरसाइकिल कौन चलाएगा?’

बहरहाल इस सबके बावज़ूद कुछ जगहों पर लगता है जैसे भाजपा ने सही मुद्दा पकड़ा है. जैसे- तटवर्ती इलाकों में मुस्लिम तुष्टिकरण का मसला. यहां भाजपा की सिद्धारमैया सरकार के एक आदेश ने मदद की है. यह आदेश इसी जनवरी में जारी हुआ है. इसमें सरकार ने पुलिस विभाग को निर्देशित किया है कि बेग़ुनाह ‘मुस्लिमों के ख़िलाफ़ दर्ज़ मामलों पर फिर विचार किया जाए. उन्हें वापस लिया जाए.’ भाजपा ने तुरंत यह मसला लपक लिया. और अब पार्टी नेता आरोप लगा रहे हैं कि सिद्धारमैया सरकार सामाजिक ताना-बाना बिगाड़ने में लगी है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रदेश प्रवक्ता राजेश पदमार सवाल करते हैं, ‘सिर्फ़ मुस्लिमों के ख़िलाफ़ दर्ज़ मुक़दमे वापस लेने को धर्मनिरपेक्षता कैसे कहा जा सकता है?’

भाजपा-आरएसएस का दावा है कि कांग्रेस की मौज़ूदा सरकार के कार्यकाल में उनके 23 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई. हालांकि सरकार का दावा है कि यह आंकड़ा सही नहीं है. वह इसे नौ बताती है. लेकिन जानकारों के मुताबिक भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि तटीय इलाकों और कू्र्ग, मैसूर या हुबली जैसे दूसरे क्षेत्रों को छोड़ दें तो हिंदुत्व की राजनीति का राज्य में असर एक दायरे से आगे नहीं जाता.

जेडीएस किधर जाएगा?

कर्नाटक में एक तीसरी पार्टी भी है. इसका नाम है जनता दल (सेकुलर) यानी जेडीएस. इसकी कमान पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और उनके बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के हाथ में है. जेडीएस दक्षिण कर्नाटक में मजबूत है जहां वोक्कालिगा समुदाय का प्रभुत्व है. हाल तक राजनीतिक विश्लेषक मान रहे थे कि कर्नाटक में कांग्रेस हार सकती है लेकिन, भाजपा के जीतने के आसार भी कम ही हैं. उनके मुताबिक ज्यादा संभावना इस बात की है कि त्रिशंकु विधानसभा बने. ऐसी हालत में जेडीएस पर सबकी नजर रहेगी. पार्टी कांग्रेस और भाजपा दोनों के साथ मिलकर सरकार बना चुकी है और दोनों ही प्रयोगों का अंत बुरे तरीके से हुए. सवाल यह है कि इस बार जेडीएस किसकी तरफ जाएगी. एक कांग्रेस नेता कहते हैं, ‘भाजपा की तरफ, और कहां? आखिर पार्टी केंद्र की सत्ता में है. उसके पास लुभाने के लिए ज्यादा सामान है. जेडीएस की 20-30 सीटें भी आ गईं तो वे कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बना देंगे क्योंकि वे कांग्रेस को सत्ता से बाहर देखना चाहते हैं.’

(सभी फोटो : सुप्रिया शर्मा)