निर्देशक : आर बाल्की

लेखक : आर बाल्की, स्वानंद किरकिरे, ट्विंकल खन्ना

कलाकार : अक्षय कुमार, राधिका आप्टे, सोनम कपूर

रेटिंग : 3.5/5

आर बाल्की हमेशा ही एक अच्छे वन-लाइनर विचार पर फिल्में बनाते आए हैं और पिछले कुछ समय से फिल्म के इंटरवल तक आते-आते उनका सत्यानाश भी करते आए हैं. ‘शमिताभ’ और ‘की एंड का’ उदाहरण हैं कि कैसे वे एक अच्छे विचार को मुकम्मल विस्तार नहीं दे पाते. लेकिन ‘पैडमैन’ में वे वही करते हैं जिसकी उनसे अपेक्षा नहीं थी और वही करते हैं जिसकी उम्मीद तकनीकी रूप से कुशल फिल्मकारों से हमेशा होती है, यानी बढ़िया सिनेमा बनाने की.

‘पैडमैन’ न सिर्फ तकनीकी रूप से स्तरीय सिनेमा है (सिवाय शोर मचाते बैकग्राउंड स्कोर के) बल्कि एक प्रेरक व्यक्तित्व (अरुणाचलम मुरुगनाथम) पर बनी उतनी ही प्रेरक व दमदार फिल्म भी है. यह अपने सब्जेक्ट के बेहद करीब रहने की वजह से ईमानदार भी है और मशहूर शख्सियतों पर ‘कुछ-तो-भी’ बायोपिक्स व सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्में बनाने के लिए बदनाम बॉलीवुड के नुमाइंदों के लिए यह उदाहरण भी है कि आखिर फैक्ट में फिक्शन कितना मिलाना सही है!

अरुणाचलम मुरुगनाथम की जुझारू जीवनी काफी कानों और आंखों से गुजर चुकी है और उसे आप यूट्यूब पर मौजूद उनकी किसी टॉक में या फिर किसी विस्तृत लंबे लेख में आसानी से पूरा का पूरा पढ़-सुन सकते हैं. इसीलिए ‘पैडमैन’ देखकर खुशी होती है कि एक सुपरस्टार की मदद लेकर मसाला फिल्मों की बंधी-बंधाई ऑडियंस को साधने के लिए बाल्की ने कहानी में बेवजह के हेर-फेर नहीं किए और सोनम कपूर के किरदार से जुड़े ट्रैक के अलावा कहीं भी फिल्मी होने की कोशिश नहीं की. वो भी तब जबकि ‘पैडमैन’ अरुणाचलम पर बनी आधिकारिक बायोपिक न होकर सिर्फ उन पर आधारित एक काल्पनिक फिल्म है, और ऐसी छूट मिलने पर अक्सर हिंदी फिल्मों के निर्देशक अति करने के लिए मचलने लगते हैं.

अरुणाचलम की जिंदगी और उनके संघर्षों को सच्चे और ईमानदार तरीके से पेश करने की वजह से फिल्म धीमी गति से भी आगे बढ़ती है. अपने तीसरे और सबसे मनोरंजक अंतिम एक्ट में पहुंचने से पहले दो घंटे 20 मिनट लंबी यह फिल्म जरूरत से ज्यादा लंबी भी लगती है और कम मनोरंजक भी, लेकिन यह इसकी कमी नहीं है. धीमी गति की उच्चस्तरीय ड्रामा फिल्में अक्सर नायक की विजय दिखाने से पहले अपने किरदारों और उसके संघर्षों को स्थापित करने में जानबूझकर ज्यादा समय लेती हैं, ताकि विजय की चमक जल्दबाजी में फीकी न पड़ जाए. ‘पैडमैन’ बिलकुल इसी समझदार फलसफे पर चली है, और धीमी गति से आगे बढ़ने के बावजूद हर गुजरते मिनट के साथ आपको फिल्म से थोड़ा ज्यादा जोड़ती चलती है.

फिल्म की कहानी अरुणाचलम के घर, तमिलनाडु के कोयम्बटूर से उठाकर मध्य प्रदेश के महेश्वर नाम के कस्बे में स्थापित की गई है. साफ तौर पर कमर्शियल हिंदी फिल्मों के दर्शकों को साधने के लिए ताकि उन्हें परिवेश अपना-अपना सा लगे, और फिल्मकार व कलाकारों को भी दक्षिण भारत के परिवेश का ‘बॉलीवुडीकरण’ करने में मेहनत न करनी पड़े.

लेकिन यह बदलाव फिल्म देखने के दौरान बिलकुल अखरता नहीं है – भले ही देखने से पहले अरुणाचलम के बारे में पढ़ते वक्त आपको इसपर आपत्ति हो – क्योंकि महेश्वर, मांडू और मालवा को कहानी का बेहद मन से हिस्सा बनाया गया है. बेहिसाब सुंदर खेतों और नर्मदा किनारे की खूबसूरत दृश्यावली रचने में मदद करने के अलावा यह बैकड्रॉप नायक लक्ष्मी और उसके संघर्षों को ज्यादा वास्तविकता भी देता है और इसका श्रेय – ऐसा हमको लगता है – फिल्म के सह-लेखक स्वानंद किरकिरे को जाएगा जो कि खुद महेश्वर से लगे इंदौर शहर के रहने वाले हैं.

‘पैडमैन’ अपने लीड एक्टर की पिछली फिल्म ‘टॉयलेट - एक प्रेमकथा’ की तरह सरकारी विज्ञापन भी नहीं है. भले ही सामाजिक मुद्दे उठाने वाला सरोकारी सिनेमा है लेकिन बिना किसी प्रौपेगेंडा के. खासतौर पर इस बात की तारीफ फिल्म देखते वक्त हर क्षण आपके मस्तिष्क में जज्ब रहती है कि माहवारी जैसे ‘अछूत विषय’ पर इस देश के सबसे बड़े सुपरस्टारों में से एक ने बेहद निर्भीकता के साथ काम किया है. फिल्म में न कुछ दबा-छिपाकर डर-डरके दिखाया गया है और न ही - जैसा कि फिल्म के ‘ऑन योर फेस’ प्रमोशन से लगा था - सनसनीखेज बनाकर मानीखेज बताने की चतुराई की गई है. यहां बेहद वास्तविकता से जो कई बरस पहले घट चुका है, उसका सिनेमाई संस्करण पेश किया गया है.

निर्भीकता पर बात आई है तो अक्षय कुमार की अदाकारी पर भी यहीं विस्तार से बात कर लेते हैं. जी हां, ‘अदाकारी’ न कि अदा-कारी, या फिर अदाओं की कारीगरी, जो कि दशकों से अक्षय कुमार की यूएसपी रही है.

‘पैडमैन’ में ‘एयरलिफ्ट’ की ही तरह - और ‘टॉयलेट’ की तरह बिलकुल भी नहीं – अक्षय कुमार ने लाजवाब अभिनय किया है. केवल कमर्शियल सिनेमा के फ्रेमवर्क की बात करें तो उनका किरदार कहानी में मुख्तलिफ बदलावों से गुजरता है, कभी सैनिटरी पैड्स बनाने को लेकर बेहद जुनूनी होता है, कभी समाज और परिवार के बर्ताव पर भौचक्क रह जाता है, तो कभी लाख कोशिशों के बावजूद समाज के नहीं समझने पर बेहद निराश और हताश नजर आता है. कभी जुगाड़ से बनी सस्ती मशीन के सफलतापूर्वक काम करने पर गजब का आनंदित महसूस करता है तो जब उसकी पहली ग्राहक उससे कहती है कि तुम्हारे पैड ने ठीक काम किया तो बच्चे की तरह बिलखने के बाद उसी की तरह खिलखिलाने लगता है. किरदार के ये सारे ही बदलाव, जो कई सालों के दरमियान घटते हैं, अक्षय ने फिल्म में बखूबी धारण किए हैं. वो भी सरल और मासूम बने रहते हुए सहजता से, न कि किरदार बनने की कोशिश में ओवरएक्टिंग करते हुए (‘टॉयलेट...’ की तरह).

साहस भी इतना दिखाया है कि सैनिटरी पैड पहनने तक पर वे नहीं रूके हैं, उसके बाद के एक सीन में भागकर नर्मदा के पास आते हैं और वो सीन भी अति का साहसिक है. यकीन जानिए, उन जैसे ही दूसरे सुपरस्टार सलमान खान तो ऐसा रक्तरंजित सीन कभी नहीं करेंगे, भले ही एक्टिंग छोड़ देंगे!

साथ ही आईआईटी में अपनी मशीन की खासियत दिखाते वक्त उनका अलग से चमकने वाला अभिनय हो या फिर क्लाइमेक्स वाला टूटी-फूटी इंग्लिश में बोला गया बेहद शानदार सात-आठ मिनट लंबा मोनोलॉग – यह बात इस फिल्म के साथ साबित हो जाती है कि उम्दा फिल्मों और उम्दा अभिनय के लिए अब अक्षय के भरोसे रहा जा सकता है!

‘पैडमैन’ जरूर देखें, राधिका आप्टे और सोनम कपूर के लिए भी, जिनका वजनदार काम फिल्म को हल्का नहीं होने देता.