अक्षय कुमार की फिल्म पैडमैन इस शुक्रवार को रिलीज हो चुकी है. बीते दिनों उन्होंने यूट्यूब चैनल बीइंग इंडियन के साथ मिलकर एक वीडियो बनाया था. यह वीडियो एक सोशल एक्सपेरीमेंट दिखाता है. इसमें एक आकर्षक लड़की जहां-तहां अपना सामान गिराती चलती है और लोग उस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देते हैं. वीडियो दिखाता है कि जब लड़की पर्स से रूमाल, चश्मा, वॉलेट जैसी चीजें गिराती है तो लोग इन चीजों को बहुत आराम से उठा-उठाकर उसे वापस कर देते हैं. लेकिन जब उसके पर्स से सैनिटरी पैड गिरता है तो वे ऐसा नहीं करते. इस वीडियो के आखिर में अक्षय कुमार इसे देखने वालों से सैनिटरी पैड्स को लेकर उनकी पुरानी मानसिकता बदलने की अपील करते नजर आते हैं. बावजूद इसके यह जागरूकता लाने वाला एक्पेरीमेंटल वीडियो न लगकर सिर्फ एक फिल्म के प्रचार के लिए रचा गया प्रपंच भर क्यों लगता है?

इस एक्सपेरीमेंट के दौरान हर बार एक खुला हुआ सैनिटरी पैड जमीन गिरता दिखाया जाता है. इस वीडियो को दिल्ली-मुंबई जैसे किसी बड़े शहर में फिल्माया गया है. किसी इतने बड़े शहर में रहने वाले ज्यादातर पढ़े-लिखे पुरुष कम से कम यह तो जानते ही होंगे कि जमीन पर गिरी हुई ऐसी चीज़ अब किसी काम की नहीं रही. तो हो सकता है, बहुत से लोगों ने इसलिए भी वह पैड लड़की को उठाकर वापस न किया हो. अगर वे ऐसा करते तो कमअक्ल कहलाते, लेकिन अपनी अक्ल का इस्तेमाल करने पर उन्हें पुरानी मानसिकता वाला बताया जा रहा है.

यहां पर सवाल पैड्स को लेकर पुरुषों की सहजता से ज्यादा इस बात का भी है कि किसी वस्तु या विषय के प्रति महिलाओं की सहजता का स्तर कितना है. और फिर इसके बाद पुरुष और महिलाओं के बीच सहजता का स्तर किस तरह का है. इस वीडियो में नजर आने वाले कुछ पुरुष इसे देखकर उठाने के लिए तो झुकते नजर आते हैं लेकिन फिर वे शायद यह सोचकर पैड को उठाकर महिला को नहीं देते कि कहीं वह इस बात को अन्यथा न ले ले. इसकी वजह यह है कि पीरियड एक महिला से जुड़ी ऐसी बेहद निजी चीज मानी जाती है जिस पर बात करते हुए कई बार महिलाएं महिलाओं से ही उतनी सहजता का अनुभव नहीं करतीं. तो ऐसे में कुछ पुरुषों के असहज होने का संबंध महिलाओं के इस विषय से सहज न होने से जुड़ा भी हो सकता है. इसका मतलब यह हुआ कि एक हद तक ऐसे विषयों पर पुरुषों को नई मानसिकता वाला बनाने का संबंध महिलाओं को इनके प्रति सहज बनाने से भी जुड़ा हुआ है.

कुछ लोगों को गिरे पैड को देखकर पुरुषों के चेहरों पर आई भंगिमाओं से भी आपत्ति हो सकती है. वे यह कह सकते हैं पुरुष पैड्स देखते ही अजीब तरह से मुस्कुराने लगे, बगलें झांकने लगे. ऐसा उन्होंने सिर्फ इसलिए किया क्योंकि उन्होंने एक पैड को गिरते देखा था, यह कहना पूरी तरह से सही नहीं लगता. पर्सनल हाइजीन से जुड़ी किसी भी चीज को देखकर इनमें से ज्यादातर लोग शायद इसी तरह से रिएक्ट करते, फिर चाहे वह सैनिटरी पैड हो या कॉन्डम या मेल अंडरवियर. इसी तरह से कुछ लोगों की थोड़ी नाराजगी वाली भंगिमाओं को भी सिर्फ उनकी पुरानी मानसिकता से जोड़ना ठीक नहीं होगा. यह पैड के प्रति उनकी असहजता के बजाय लड़की की लापरवाही पर जताई गई प्रतिक्रिया भी हो सकती है.

इन सबके बावजूद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह वीडियो पीरियड्स से जुड़ी हमारी सोच की एक झलक तो दिखाता ही है. यह थोड़े गलत तरीके से ही सही एक जरूरी मुद्दे की तरफ हमारा ध्यान भी खींचता है. हमें अक्षय कुमार से इस बात की शिकायत तो हो सकती है कि जब जमीनी हालात बेहद खराब हैं तब वे सोशल मीडिया के जरिए केवल ऊपर-ऊपर की बातें करके फिल्म बेचने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इस बात के लिए उनकी तारीफ भी की जानी चाहिए कि जिस फिल्म को बेचने के लिए वे ऐसा कर रहे हैं वह इस विषय पर वाकई एक सार्थक पहल करती दिखाई देती है.

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