स्तन कैंसर औरतों में सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर है. औरतों के समस्त कैंसरों में से एक तिहाई इसी के मामले होते हैं. इस विषय पर आगे बढ़ें इससे पहले एक और सवाल का जवाब जानना जरूरी है. सवाल यह कि क्या पुरूषों को भी स्तन कैंसर हो सकता है? जी हां, यह सच है. कई बार डॉक्टर भी भूल जाते हैं कि पुरुषों के स्तन में भी कैंसर संभव है. बहुत कम होता है, पर यह हो सकता है. ऐसा मानिये कि स्त्रियों के मुकाबले पुरुषों में इसके होने की आशंका 150 गुना कम होती है. इसीलिए किसी भी पुरुष के स्तन में (खासकर एक ही तरफ) कोई गांठ हो, जिसमें कोई दर्द न हो रहा हो तो यह कैंसर की गांठ हो सकती है. इसकी सारी जांचें उसी गंभीरता से की जानी चाहिए जैसी कि एक स्त्री के मामले में की जाती हैं.

अब स्त्रियों में होने वाले स्तन कैंसर पर आते हैं और इस बीमारी को कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं और सवाल-जवाब के माध्यम से समझते हैं :

स्तन कैंसर के लिहाज से स्त्रियों के जीवन में उम्र के तीन पड़ाव बेहद महत्वपूर्ण हैं :

(1) पहली बार माहवारी कब शुरू हुई?

यदि माहवारी बहुत कम उम्र में ही (ग्यारह-बारह साल की उम्र में ही) शुरू हो गई थी तो बाद में इन स्त्रियों में स्तन कैंसर की आशंका ज्यादा होती है.

(2) माहवारी कब बंद हुई?

यदि माहवारी जल्दी बंद हो गई हो (मीनोपॉज कम उम्र में ही हो गया हो) तो ऐसी स्त्रियों में स्तन कैंसर होने का खतरा काफी कम होता है.

(3) स्त्री पहली बार जब गर्भवती हुई तब उसकी उम्र क्या थी?

यदि कोई स्त्री 18 से 20 साल के बीच में गर्भवती हुई हो तो उसे ब्रेस्ट कैंसर का खतरा कम होता है.

किसी स्त्री के जीवन में ये पड़ाव या तिथियां इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

दरअसल माहवारी का कंट्रोल हार्मोंस के हाथ होता है. इनमें एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रोन आदि हार्मोंस शामिल हैं. चूंकि स्तन का कैंसर एक हार्मोन आधारित कैंसर माना जाता है इसलिए इस बीमारी में ये पड़ाव काफी अहम हो जाते हैं.

क्या इन हार्मोंस के अलावा भी कुछ और कारण स्तन कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं?

हां, बिलकुल और ऐसे कई कारण हैं. जैसे :

(1) बहुत ज्यादा कैलोरी और घी-तेल वाली डाइट.

(2) नियमित अल्कोहल का सेवन.

(3) मीनोपॉज के बाद किसी ‘हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी’ का नियमित सेवन.

क्या गर्भनिरोधक गोलियां यानी ओरल कंट्रासेप्टिव पिल्स भी कैंसर कारक हैं?

कुछ अध्ययनों में गर्भ निरोधक गोलियों पर कैंसर कारक होने का संदेह जताया गया है. हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी के विषय में भी ऐसी चिंताएं व्यक्त की गई हैं. हालांकि अंतिम तौर पर कोई भी स्टडी इन संदेहों को पुख्ता नहीं कर पाई है. अभी भी ये गोलियां दी जाती हैं. औरतें अभी भी इन्हें गर्भ निरोधक के रूप में या मीनोपॉज के बाद लेती ही हैं. हालांकि ऐसे में याद रखा जाए कि पूरी तरह सुरक्षित बताए जाने के बावजूद इन पर संदेह कायम है.

क्या स्तन कैंसर को शुरुआती स्टेज पर ही पहचाना जा सकता है?

इसकी शुरुआत में ही पहचान संभव है और ऐसा बहुत जरूरी भी है क्योंकि तब इस इसका पूरा इलाज आसानी से हो सकता है.

तो इसे कैसे पकड़ा जाए?

यह सलाह हर स्त्री के लिए है. उसे स्वयं अपने स्तनों को (जब वह नहा रही है तब, या अन्यथा कभी भी) अच्छी तरह से दबा-दबाकर सब तरफ टटोल कर नियमित रूप से देखना चाहिए कि स्तन में कहीं कोई गांठ तो नहीं है. कम से कम उसे हर माह यह करके देखना चाहिए. ऐसा करने पर यदि स्तन में कहीं भी, कोई छोटी-सी भी गांठ महसूस हो तो उसे कतई नजरअंदाज न किया जाए. तुरंत अपने डॉक्टर से सलाह ली जाए. इसके साथ ही यदि स्तन के निप्पल से कहीं कोई डिस्चार्ज भी दिखाई दे, स्तन की चमड़ी कहीं नीचे की तरफ चिपकी या अंदर की ओर खिंची सी लगे तब तो डॉक्टर की सलाह जरूर ली जानी चाहिए.

मीनोपॉज की उम्र से पहले तो अक्सर ऐसी गांठ कैंसर न होकर फाइब्रोसिस्टिक डिसीज के कारण होती है. ऐसे में डॉक्टर आपको इसे पुनः देखने के लिए बुला सकता है जिससे कि वो यह तय कर सके कि इस गांठ को और आगे जांच की आवश्यकता है भी अथवा नहीं.

ऐसा मान लें कि यदि अपने स्तन में आपको कोई भी ऐसी गांठ महसूस हो जो ठोस हो, दर्दरहित हो तब, और यदि वह वह गांठ नीचे के टिश्यू से या ऊपर की चमड़ी से चिपकी हुई सी भी लगे तब तो खासतौर पर, या फिर उसके ऊपर की चमड़ी अंदर की तरफ खिंची सी लगती हो, या पहले वाला नॉर्मल निप्पल अब अंदर की तरफ खिंच गया हो, तब तो आपको तुरंत ही इसकी पूरी जांचें करवानी ही चाहिए. ये जांचें आपका जीवन बचा सकती हैं.

स्तन कैंसर का पता लगाने के लिए डॉक्टर कौन-सी जांचें करेगा?

सबसे महत्वपूर्ण जांच गांठ की बायोप्सी की जांच है. आमतौर पर हम बायोप्सी नाम से ही से घबरा जाते हैं. इसे हम कोई बड़ी काट-पीट मानकर इसे टालने की कोशिश करते हैं. यह गलती कभी न करें. यदि डॉक्टर ने बायोप्सी का बोला है तो इसे कतई न टालें. आखिरकार इस छोटे से ऑपरेशन द्वारा ही तो तय हो पाता है कि यह गांठ कैंसर की है या नहीं.

होने को तो स्तन की मैमोग्राफी, एमआरआई या अल्ट्रासाउंड इत्यादि जांचें भी होती हैं परंतु डॉक्टर के लिए ये केवल एक गाइड के तौर पर का काम करती हैं कि बायोप्सी की दिशा में बढ़ा जाये या नहीं. ये जांचें अंतिम तौर पर कभी तय नहीं कर सकतीं कि गांठ कैंसर की है या नहीं? ये जांचें सर्जन को केवल इस मामले में सहायता करती हैं कि आगे बायोप्सी करें कि नहीं.

कभी-कभी यह भी मान लिया जाता है कि गर्भवती स्त्री या वह स्त्री, जो बच्चे को अपना दूध पिलाती हो, यदि ऐसी स्त्री के स्तन में कोई गांठ हो तो हमें कोई चिंता नहीं करनी चाहिए. यह सोच गलत है.ऐसी स्त्रियों के स्तन में भी यदि कभी कोई गांठ मिले तो उसके बारे में भी वही चिंतायें, वे ही जांचें होंगीं जो ऐसे मामले में किसी भी अन्य स्त्री की होंगी.

क्या स्त्रियों को अपने स्तनों की नियमित मेमोग्राफी जांच करवाते रहना चाहिए?

दावा किया जाता है कि इस एक्सरे के द्वारा बहुत शुरुआती स्टेज का स्तन कैंसर भी पकड़ में आ जाता है. दरअसल ऐसी नियमित मेमोग्राफी मेडिकल जगत में भी एक बड़े विवाद का विषय है. अक्सर यह सलाह दी जाती है कि 50 वर्ष की आयु के बाद हर स्त्री को हर साल मैमोग्राम करवाकर देखते रहना चाहिए कि कहीं स्तन में कोई कैंसर तो नहीं हो रहा. आजकल तो कुछ लोग इसे 40 साल की उम्र के बाद हर वर्ष करने की सलाह देने लगे हैं. इसे वे स्क्रीनिंग मैमोग्राम कहते है. इस शुरुआती स्क्रीनिंग करने पर यदि कोई शक पैदा करने जैसी चीज दिखे तो फिर उसे एमआरआई और डायग्नोस्टिक मेमोग्राफी द्वारा आगे जांचा जाता है. परंतु कई लोग इतनी नियमित मेमोग्राफी के खिलाफ भी हैं. वे कहते हैं कि बार-बार एक्सरे द्वारा जांच करना भी स्तन कैंसर के लिए जिम्मेदार कारक हो सकता है.

तो क्या सोनोग्राफी द्वारा यह स्क्रीनिंग हो सकती है? और वैसे सोनोग्राफी तो एकदम सुरक्षित, सुलभ तथा सस्ती जांच है.

इस सवाल का जवाब है, नहीं. सोनोग्राफी में मेमोग्राफी जैसी सूचनायें नहीं मिल पातीं. हां, कोई गांठ यदि वह सिस्टिक गांठ है अर्थात उसमें कोई द्रव्य पदार्थ है तो यह जरूर सोनोग्राफी द्वारा तय हो सकता है. उसके सहारे नीडिल डालकर उसका द्रव्य पदार्थ जांच के लिए जरूर निकाला जा सकता है.

कुल मिलाकर इस पूरी चर्चा में याद रखने लायक सबसे ज्यादा जरूरी बात यही है कि स्तन कैंसर की सबसे महत्वपूर्ण जांच बायोप्सी ही है. बिना बायोप्सी के कोई भी डॉक्टर पुख्तातौर पर नहीं बता सकता कि संबंधित गांठ कैंसर की है या नहीं. ऐसे में अगर आपका डॉक्टर आपको इस जांच की सलाह देता है तो आप फालतू की अन्य जांचों में न उलझकर सीधे बायोप्सी ही करा लें. इसमें हम जितनी ही देर करते चले जाते हैं उतनी ही कैंसर की डायग्नोसिस में देर हो जाती है, और जितनी देर उसमें होती जाती है उतना ही उसका ऑपरेशन भी बड़ा होता जाता है. फिर उसकी दवाइयां भी बढ़ जाती है और मरीज की उम्र भी कम हो जाती है.