अगर किसी को देखकर यह लगे कि लेखक कितना अजेय और सारी भौतिक सीमाओं के बावजूद अनश्वर होता है तो वह व्यक्ति हमारे बीच कृष्णा सोबती रही हैं. इस महीने की 18 को वे 93 बरस पूरे कर लेंगी. अशक्त और वयोवृद्ध हो गई हैं. इतनी कि राष्ट्रपति जी के हाथों भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान पाने नहीं जा पा रही हैं. पर उनके सोच-विचार और संघर्षशीलता की ऊर्जा लगभग अक्षय है. इस बीच उनसे कई बार मिलना हुआ: उनकी तीखी-पैनी नज़र देश और समाज में जो घट रहा है उस पर बराबर बनी हुई है और उन्होंने किसी तरह के विराग में लाचार शरण नहीं ली है. इस उम्र में वे विशेषतः राजनीति, धर्म, बाज़ार और समाज में जो हो रहा है उससे बहुत बेचैन और विचलित हैं: उन्हें लगता है और इस अहसास के पीछे उन्हें भारत के बंटवारे के तीखे दर्द का दंश बारहा याद आता है कि कहीं फिर देश टूट न जाए. भारत के लोकतंत्र में उन की जो आस्था है वह लेखकों के बीच भी असाधारण है.

पिछली छमाही में ही उनकी चार पुस्तकें आई हैं: ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान तक’, ‘मुक्तिबोध’, ‘लेखक का जनतंत्र’ और ‘मार्फ़त दिल्‍ली’. सभी 92 बरस की उमर में. ऐसी अद्भुत सर्जनात्मकता का नाम है कृष्णा सोबती. एक अथक संघर्षशील और सारी भौतिक सीमाओं के बावजूद विचार और अहसास के क्षेत्र में सक्रिय, सजग, चौकन्नी. उनके जीने के सलीक़े में आभिजात्य भी है पर ऐसा नहीं है जो दूसरों की ज़रूरतों और हालत को नज़रन्दाज़ कर कमा लिया गया हो. उसमें ज़िद रही है जीने की अपनी शर्तों पर, बिना झुके-दुबके, पूरी हिम्मत से अपनी समावेशी मूल्यदृष्टि पर ज़िद कर अड़े रहने की. वे लेखकों के बीच सच्ची सत्याग्रही हैं. उनको देखना लेखकीय स्वाभिमान को साकार सजीव देखना है.

हालांकि वे स्वयं अपने कथा-गद्य में एक अप्रतिम महाकाव्यकार हैं, उनके मन में कविता के लिए बड़ा सम्मान है और उसे व गद्य से बेहतर विधा मानती हैं. उनके अलावा हिन्दी में कोई ऐसा कथाकार नहीं है जिसने एक कवि पर एक पूरी पुस्तक लिखी हो जैसी कि उन्होंने मुक्तिबोध पर लिखी है. इधर तब वे कभी-कभी मज़ाकिया तौर पर कहती हैं कि अब उन्हें जीवन से छुट्टी करना चाहिए तो मैं उन्हें कबीर की पंक्ति की याद दिलाता हूं: ‘हम न मरैं, मरिहै संसारा। हमका मिला जियावनहारा।’

कृष्णा जी को उनका साहित्य ही जियावनहारे के रूप में मिला हुआ है. दिवस का अवसान भले समीप है, इसमें कोई सन्देह नहीं कि उनका गगन हमेशा ऊर्जा, लालित्य, साहस, सृजन की ऊष्मा और विचार के पैनेपन से रक्ताभ रहेगा- रक्ताम, अनन्त, असमाप्य गहरे होते अंधेरे में कृष्णा सोबती एक मशाल हैं जिसकी रोशनी और गरमाहट में हम अपने समय को साफ़ देख सकते और उसमें अपनी शिरकत को नई दिशा दे सकते हैं.

रज़ा उत्सव

दशकों से मैं यह शिकायत करता रहा हूं कि अपने समय में साहित्य और कलाओं की साझी रसिकता, जो हमारी विरासत थी, हमने गंवा दी और ख़ासकर हिन्दी समाज अपने मूर्धन्यों को सेलिब्रेट नहीं करता. 1973 में हमने इस दिशा में एक पहल करते हुए भोपाल में वार्षिक ‘उत्सव’ श्रृंखला शुरू की थी जिसके कम से कम भोपाल में अप्रत्याशित और सुखद परिणाम प्राप्त हुए थे. ऐसे ही एक ‘उत्सव’ में जिसमें ध्रुपद गायन, आधुनिक कविता-पाठ, नाटक, शास्त्रीय नृत्य आदि शामिल थे, मध्यप्रदेश के ही चित्रकार (तब पेरिस में बस गए) सैयद हैदर रज़ा की अपने घरू प्रदेश में पहली एकल प्रदर्शनी हुई थी. उन पर एक परिसंवाद भी. रज़ा को पहली बार इतनी सारी कलाओं का एक साथ रसास्वादन करने का अवसर मिला: उन्होंने बड़ी सुघड़ हिन्दी में उस अनुभव पर नोट्स लिखे जिन्हें बाद में उन पर एकाग्र ‘पूर्वग्रह’ के एक अंक में प्रकाशित भी किया गया.

इस समूचे अनुभव को याद करते हुए हमने इस वर्ष से उनकी स्मृति में वार्षिक ‘रज़ा उत्सव’ शुरू करने का निश्चय किया है जो शुरू हो गया है. उसमें स्वयं रज़ा से संबंधित दो ही आयोजन हैं: ‘रज़ा में गांधी’ प्रदर्शनी जो आकार-प्रकार गैलरी इंडिया आर्ट फ़ेयर में 9-12 फ़रवरी तक हो रही है. वढ़ेरा आर्ट गैलरी में दो चित्रकार-मित्रों रज़ा और रामकुमार की संयुक्त प्रदर्शनी ‘युग्म’ रज़ा की 96वीं वर्षगांठ के अवसर पर 22 फ़रवरी 2018 को शुरू हो रही है. दो विशेष रूप से संकलित प्रदर्शनियां क्रमशः आइफ़ैक्स गैलरीज़ और श्रीधराणी गैलरी में ‘बियॉन्ड ट्रांस नेशनलिज़्म’ और ‘मध्यमा’ नाम से क्रमशः 10 और 16 फ़रवरी को शुरू होंगी. पहली उत्तर अमेरिका में रह रहे दक्षिण एशिया के प्रवासी-कलाकारों की है जिसे अर्श्या लोखंडवाला ने और दूसरी मध्य प्रदेश के पन्द्रह युवा कलाकारों की है जिसे चित्रकार अखिलेश ने संकलित किया है.

वहीं, युवा कलालेखकों की एक वर्कशॉप भी चार दिन 18-21 फ़रवरी को चलेगी जिसमें वरिष्ठ कलाकार और कलाविद् भाग लेंगे : नाम है ‘रूप-अरूप’. आठ कलाकारों हुसैन, रज़ा, रामकुमार, कृष्ण खन्ना, अकबर पदमसी, राजेन्द्र धवन, के जी सुब्रमण्यम और कृष्ण रेड्डी पर एक फ्रेंच निर्देशक द्वारा बनाई आठ फ़िल्मों का एक समारोह 12 से 14 फ़रवरी तक अलियान्स फ्रांसेज़ में चलेगा. दो फ़रवरी को मकरन्द परांजपे और उदयन वाजपेयी ने ‘पढ़ने के सुख’ पर लम्बी बातचीत की और आठ फ़रवरी को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में शास्त्रीय गायकों पण्डित राजन और पण्डित साजन मिश्र से सुनीता बुद्धिराज संवाद करेंगे. 11 फ़रवरी को सेंटर की एनेक्स में गांधी को स्त्रियों की नज़र से देखनेवाली एक नाट्यप्रस्तुति ‘हर क़तरा तूफ़ान’ नाम से होगी. ‘आरम्भ’ के अन्तर्गत आदित्य खांडवे का शास्त्रीय गायन और आरोही मुंशी का सरतनाट्यम 15 फ़रवरी को अलियान्स के और 16 फ़रवरी को त्रिवेणी कला संगम के सभागार में होंगे. 23-24-25 फ़रवरी को इसी सभागार में ‘कवि-समवाय’ आयोजित है जिसमें विष्णु खरे, नरेश सक्सेना, अरुण कमल, नंदकिशोर आचार्य, पारुल पुखराज, राजेश जोशी, प्रयाग शुक्ल, मंगलेश डबराल, विवेक निराला, पुरुषोत्तम अग्रवाल, अपूर्वानन्द, तेजी ग्रोवर, अरुण देव, अविनाश मिश्र, ओम थानवी आदि कवितापाठ और कविता के कुछ मुद्दों पर बातचीत करेंगे. इस बीच राजकमल प्रकाशन से रज़ा पुस्तकमाला के पहले सेट की लगभग 23 पुस्तकें प्रकाशित हो गई हैं.

तीन ख़बरें

रोज़ पांच अख़बार पढ़ता हूं: टेलीविजन नहीं देखता हूं सो उन्हीं से पता चलता है कि दुनिया में क्या हो-चल रहा है. तीन असम्बद्ध ख़बरों पर ध्यान गया. एक कहती है कि भारत सरकार के एक देशव्यापी शैक्षणिक सर्वे से यह पता चला है कि तीसरी, पांचवी और आठवीं कक्षाओं में पढ़ रहे बच्चों में देहाती स्कूलों के बच्चे शहराती स्कूलों के बच्चों से बेहतर हैं, लड़कियां लड़कों से बेहतर पढ़ रही हैं और अन्य पिछड़ी जातियों के बच्चे बाक़ी सबसे बेहतर हैं. सर्वे में अन्य कई विफलताओं का ज़िक्र भी है जिनमें गणित और भाषा में पिछड़ापन विशेष उल्लेखनीय है. यहां भाषा से अभिप्रायः प्रभुभाषा अंग्रेज़ी में दक्षता से है. पर पहले के तीन तथ्य निश्चय ही उत्साहजनक हैं. आगे जाकर शहरों और देहात के शैक्षणिक और दक्षता के समीकरण बदलेंगे. यह भी कि बुद्धि और ज्ञान के लिए आवश्यक क़दम उठाना बहुत ज़रूरी है. तीसरे यह कि शिक्षा अन्ततः लिंगपरक और जातीय असन्तुलन को ठीक करने का माध्यम बनने जा रही है.

दूसरी ख़बर दुखद है. कर्नाटक राज्य में स्कूल की दीवारों को विज्ञापनों के लिए बेचा जानेवाला है. पहले ही हमारे ज़्यादातर स्कूलों की इमारतें स्थापत्य का बहुत ख़राब निरुत्साह नमूना होती हैं पर वहीं बच्चों को कुछ ख़ाली जगहें मिलती हैं. अब उसे विज्ञापनों से भरकर एक तरह के बाज़ारूपन को स्कूलों तक में भर दिया जाएगा. निजी स्कूल तो पहले ही पूरी बेशर्मी से दुकानें बनाए जा चुके हैं. यह बहुत निन्दनीय निर्णय है और इसे शिक्षा और बच्चों के हित में वापस लिया जाना चाहिए.

तीसरी ख़बर है कि आईआईटी के दो गणितज्ञों ने यह पाया है, काफ़ी परिष्कृत विधि और यन्त्र-विद्या का उपयोग कर, कि सिन्धु घाटी सभ्यता की जो लिपि अब तक अबूझ बनी हुई है वह दायें से बायें की ओर लिखी जाती थी. इसका आशय यह हुआ कि वह लिपि अरबी जैसी लिपि की तरह थी. हमारी सभी भारतीय भाषाएं, उर्दू को छोड़कर, बायीं से दायीं ओर लिखी जानेवाली लिपि में हैं. इस तरह की खोज को कई ‘वैज्ञानिक’ कारणों से निरस्त किया जाना चाहिए.

पहला तो यह कि देववाणी संस्कृत और अन्य भाषाओं की जो लिपि-पद्धति अनादि काल से रही है उससे भी प्राचीन पद्धति को कैसे स्वीकार किया जा सकता है. दूसरा यह कि ‘अरबी’ से समानता तो देशद्रोह माना जा सकता है. वह हमारी जातीय शुद्धता पर हमला है. इन दो गणितज्ञों को अग्रिम जमानत तुरन्त ले लेना चाहिए. तीसरा यह कि ऐसी सारी वैज्ञानिक खोजें अस्वीकार्य हैं जो हमारे प्राचीन ज्ञान को किसी और आलोक में देखने की ओर प्रेरित करती हैं. चौथा यह कि यह खोज हमारे जगतगुरु होने की प्रतिज्ञा से मेल नहीं खाती. आईआईटी शुरू से ही भारत-विरोधी खोजें करते रहे हैं: इनकी अभारतीय वैज्ञानिकता पर रोक लगाना चाहिए! अगर क़ानूनन संभव न हो तो हमारे हिंसक युवा दल प्रदर्शन-प्रहार-हिंसा द्वारा उन्हें भारतीयता के रास्ते पर ला सकते हैं!!