इस पुस्तक की कहानी ‘विपदा का संहार’ का एक अंश : ‘देबकुमार बाबू अनजाने में ही एक असाधारण आविष्कार करने में सफल हो गए थे... लेकिन आर्थिक साधन के अभाव में वे उसका उचित प्रयोग नहीं कर पाए. ऐसे आविष्कार का ‘कॉपीराइट’ बुक करने के लिए आवेदन नहीं किया जा सकता, क्योंकि वाणिज्यिक मार्केट में इसका कोई मूल्य नहीं है. लेकिन युद्धोन्मुख देश जैसे जर्मनी, जापान अथवा फ्रांस आदि को इस आविष्कार की यदि भनक भी पड़ जाए तो वे इस फॉर्मूले को लेकर अपनी प्रयोगशाला में शोध करके नरसंहार के हथियार बनाने में जुट जाएंगे. और आविष्कार करने वाला न तो कुछ कर पाएगा और न ही उसे कोई लाभ हो पाएगा... इस जहर के विभिन्न प्रयोगों के लिए बड़े पैमाने पर अनुसंधान की जरूरत थी, इसलिए उन्हें आर्थिक अनुदान चाहिए था...उन्हें पैसों की सख्त जरूरत थी...

...और तब उन्होंने बीमा कंपनी का वह विज्ञापन देखा, जिसमें कहा गया था, पति-पत्नी संयुक्त रूप से जीवन का बीमा कर सकते हैं और यदि दोनों में से कोई एक इस दौरान मर जाता है तो पूरी रकम दूसरे को मिल जाएगी... वे दोनों का संयुक्त बीमा करवाने के बाद अपने ही आविष्कार से उससे हमेशा के लिए छुट्टी पा लेंगे. एक तीर से दो निशाने!’


कहानी संग्रह : ब्योमकेश बक्शी की कहानियां

कहानीकार : सारदेंदु बंदोपाध्याय

अनुवादक : राजेंद्र कुमार ‘राज’

प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स

कीमत : 175 रुपये


रहस्यात्मकता कम या ज्यादा हर किसी के जीवन का हिस्सा होती है. ज्यादातर लोगों के जीवन के अनुभवों की गठरी में ऐसी कुछ घटनाएं जरूर होती हैं, जिनका रहस्य कभी-कभी तो आजीवन नहीं खुलता. ऐसे में अक्सर ही मन करता है कि काश ब्योमकेश बक्शी जैसा कोई खोजी व्यक्ति उनके संपर्क में भी होता जो उनकी गुत्थी को सुलझा सकता. व्यवहार में तो अक्सर ऐसा संभव नहीं हो पाता, लेकिन इस कहानी संग्रह में पाठक रहस्य की कई गुत्थियों को सुलझते हुए देख पाते हैं. सारदेंदु बंदोपाध्याय की यह किताब, ऐसी ही जासूसी कहानियों का बड़ा ही दिलचस्प संग्रह है.

इस कहानी संग्रह की लगभग सभी कहानियों को पाठक ब्योमकेश बक्शी पर बने टीवी सीरियल में देख चुके होंगे. लेकिन इन कहानियों के दीवाने जो लोग उस सीरियल को भूल चुके हों, इन कहानियों को पढ़कर फिर से वह थ्रिल महसूस कर सकते हैं. इन कहानियों में सारदेंदु हर एक पात्र की विस्तृत जानकारी देते हुए आगे बढ़ते हैं. कभी वे खलनायक की मासूम-सी तारीफ कर रहे होते हैं तो कभी उसके क्रियाकलापों को बेहद सहज या कभी-कभी निहायत की गैरजरूरी दिखा रहे होते हैं. और इन सब बातों के बीच में पाठक अंदाज ही नहीं लगा पाता कि सबसे मासूम-सा दिखने वाला और शक के घेरे से बहुत दूर खड़ा शख्स ही मुख्य अभियुक्त है.

ऐसी ही एक कहानी ‘सत्यान्वेष’ के निहायत ही शरीफ दिखने वाले खलनायक के भेद खुलने के बाद ब्योमकेश बताता है कि वह कैसे उसे पकड़ने में सफल हुआ -

‘अश्विनी बाबू ने यह घटना अपनी खिड़की से देखी थी और कुछ मतिभ्रष्ट हो जाने की स्थिति में इस घटना की जानकारी डॉक्टर को देने गए थे. मैं कह नहीं सकता उनकी मंशा क्या थी? वे अनुकूल बाबू के अहसानों से दबे हुए थे और शायद इसीलिए अनुकूल बाबू को इस घटना से सचेत करना चाहते थे. लेकिन उसका परिणाम ठीक इसके विपरीत हुआ. डॉक्टर की नजर में अश्विनी बाबू ने जिंदा रहने का अधिकार खो दिया था. उसी रात जब वे बाथरूम जाने के लिए उठे थे, उनकी नृशंस हत्या कर दी गई. ...अनुकूल बाबू को विश्वास हो गया कि मैं इनवेस्टिगेटर हूं,...अपना विशाल हृदय दिखाते हुए मुझे उस रात रहने की अनुमति दे दी. इस दरियादिली का एक ही उद्देश्य था कि उसी रात किसी भी समय मुझे मौत के घाट उतार दिया जाए.’

सारदेंदु की कहानियों के पात्र बेहद चालाकीभरे और शातिराना हैं. कभी-कभी लगता है जैसे वे पाठकों के सामने भी एक चुनौती खड़ी कर रहे हों कि पता लगाकर दिखाओ अपराधी कौन है. ऐसी ही एक मजेदार कहानी है ‘तरनतुला का जहर’. इसमें एक बूढ़ा-बीमार व्यक्ति तमाम घरवालों को चकमा देकर, मकड़ी के जहर को नशे के लिए प्रयोग करता है, लेकिन पूरा परिवार पहरेदारी करके भी उसे नहीं पकड़ पाता. ब्योमकेश अपने एक साथी को खोजबीन के लिए भेजता है, लेकिन वह भी पता नहीं लगा पाता. जबकि ब्योमकेश बिना वहां जाए ही, सिर्फ अपने साथी के दिये वर्णन से उस बूढ़े की चोरी का पता लगा लेता है. ब्योमकेश कहता है -

‘तुमने अपनी जांच में एक और भूल यह की कि उस महिला को भेजे जाने वाले पैसे को तुमने ‘पेंशन’ मान लिया. यह परंपरा कहीं भी नहीं रही. यह उस जहर की कीमत है जो वह महिला पोस्टमैन के जरिए नंदूलाल बाबू तक पहुंचाती है. अब देखो, जहर नंदूलाल बाबू के हाथों में कैसे पहुंच जाता है और कोई शक भी नहीं करता! लेकिन कमरे के अंदर भी निरंतर पहरा रहता है, तो कैसे वे उसे खा लेते हैं? और यहीं पर उनका लेखन काम में आता है...वे काले पेन से लिखते हैं. बीच-बीच में लाल पेन से लाइनें खींचते हैं और जब भी अवसर मिलता है, लाल पेन के निब को मुंह से चूस लेते हैं. जब पेन की स्याही खत्म हो जाती है, तब वे उसे दुबारा भर लेते हैं. अब तुम समझ सके कि उनकी जीभ का रंग लाल क्यों है?’

बीमा कंपनियों द्वारा दी गई योजनाओं का गलत फायदा उठाने के लिए किसी की हत्या करने वाला प्लॉट कई जासूसी कहानियों और फिल्मों एक मुख्य कथ्य रहा है. हॉलीवुड में भी इस प्लॉट पर काफी फिल्में बनी हैं. इसी थीम की एक बहुत अच्छी कहानी है विपदा का संहार. इसमें एक वैज्ञानिक द्वारा किसी और को मारने के चक्कर में, खुद उसी के दोनों बच्चों की हत्या हो जाती है. कहानी के शुरू में ब्योमकेश बीमा कंपनियों की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहता है - ‘एक बीमा कंपनी ने बड़ा इश्तिहार छापा है. वह संयुक्त रूप से पति-पत्नी का बीमा करेगी और यदि किसी कारण से उनमें से एक की मृत्यु हो जाती है तो बीमा की सारी रकम जीवित साथी को मिलेगी. ये बीमा कंपनियां जीवन को इतना कष्टमय बना सकती हैं. यानी आदमी शांति से मर भी नहीं पाएगा.’

सारदेंदु बंदोपाध्याय ने पहली बार बंगाली समाज में जासूसी लेखक को सम्माननीय स्थान दिलाया था. इसका मूल कारण यह था कि उन्होंने किसी विदेशी जासूसी लेखक की नकल न करके भारतीय मूल, स्थान और परिवेश में अपने पात्रों को जीवित किया. उनका गढ़ा पात्र ब्योमकेश बक्शी आज भारतीय जासूसी साहित्य में मील का पत्थर बन चुका है. सत्यजीत राय के प्रसिद्ध उपन्यास ‘फेलूदा के कारनामे’ की तरह ही सारदेंदु का ब्योमकेश बक्शी साहित्य भी क्लासिक साहित्य में जगह बना चुका है.

राजेन्द्र कुमार ‘राज’ ने संग्रह की कहानियों का अनुवाद इतना अच्छा किया है कि ये मूलतः हिंदी की कहानियां ही बन जाती हैं. पाठक इन रहस्यभरी कहानियों को उनके जीवंत वर्णन के लिए, अंत जानने के बावजूद, बार-बार पढ़ने के लिए लालायित हो सकते हैं.