राज्यसभा में बीते बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी का हंसना और उस पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया एक हफ्ते से चर्चा और बहसों का मुद्दा बनी हुई है. उस दिन प्रधानमंत्री अपने भाषण में यह जिक्र कर रहे थे कि 1998 में एनडीए सरकार एक राष्ट्रीय पहचान पत्र बनाने की दिशा में काम कर रही थी और तभी ‘आधार’ का बीज बोया गया. इसी बीच रेणुका चौधरी की हंसी सदन में गूंजी और नरेंद्र मोदी ने उनकी हंसी की तुलना रामायण के किरदार से करते हुए उनपर तंज कसा था. इस मुद्दे पर राजनीतिक गलियारों से लेकर प्राइम टाइम प्रोग्रामों तक पर बहस चल रही है. इस क्रम में दिलचस्प यह है कि रेणुका चौधरी और कांग्रेस न सिर्फ इस हंसने को सही ठहरा रहे हैं बल्कि इसे महिलाओं की अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर भी दिखा रहे हैं.

रविवार को रेणुका चौधरी ने एक अखबार को बताया था कि इस घटना के बाद उनके समर्थन में कुछ महिलाएं ‘शूर्पणखा गैंग’ बना रही हैं और अब ये शूर्पणखाएं हर जगह अपनी ‘नाक’ घुसाएंगी. इस मुद्दे पर एक खतरनाक बात यह भी देखने को मिल रही है कि तमाम नारीवादी और बुद्धिजीवी इसे महिलाओं की आजादी से जोड़कर देख रहे हैं. यह खतरनाक इसलिए है कि इससे यह संदेश जाता दिखता है कि महिलाओं के मामले में सारी ऊट-पटांग हरकतें सही हो जाती हैं.

इसी मसले पर पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका मृणाल पांडे ने एक अंग्रेजी अखबार में लिखा कि कैसे रेणुका चौधरी की उन्मुक्त हंसी विवाद, चिंतन और चर्चाओं का विषय सिर्फ इसलिए बन गई है क्योंकि सालों से यह माना जाता रहा है कि महिलाओं को सिर्फ हौले से खिलखिलाना चाहिए, ठहाके नहीं लगाने चाहिए. इस आलेख में वे मोदी सरकार पर तंज करते हुए कहती हैं कि यह सरकार लोकतंत्र में महिलाओं के सार्वजनिक जगहों पर हंसने जैसी समस्याओं से कैसे पार पाएगी! इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी बराबरी की मांग करने वाली महिलाओं और महिलावादियों को भी मोदी की प्रतिक्रिया उनके हंसने की आजादी पर हमला लग रही है.

इस विवाद पर रेणुका चौधरी के समर्थकों की बातों और नारीवादियों की दलीलों को और बारीकी से समझने के लिए अब जरा कल्पना के परिंदों को थोड़ी ढील देते हैं और मान लेते हैं कि यह किस्सा संसद के बजाय किसी रेस्टोरेंट का है. एक बार के लिए यह भी मानते हैं कि मोदी प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि किसी कॉलसेंटर में काम करते हैं और रेणुका चौधरी कोई महिला नहीं, मोदी का कोई पुरुष सहकर्मी हैं. ये दोनों अपने कुछ और सहकर्मियों के साथ लंच टाइम में पिज्जा खाने आए हैं. इस बीच बातों का सिलसिला गर्म होता है और मोदी की बोलने की बारी आती है.

असली घटना से समानता दिखाने के लिए हम यह भी मान लेते हैं कि किन्हीं वजहों से चौधरी और मोदी की आपस में नहीं बनती. इसलिए मोदी के बोलने के दौरान कोई उनकी बात पर ध्यान न दे पाए या वे अपनी बात पूरी न कर पाएं इस गरज से (हालांकि यह जरूरी नहीं है, लेकिन ताजा राजनीतिक परिस्थितियां ऐसा मानने पर मजबूर करती हैं) चौधरी जी जोर-जोर से हंसना शुरू कर देते हैं. इस शोर-शराबे पर रेस्टोरेंट का मैनेजर आपत्ति जताता है, लेकिन मोदी उसे यह कहकर चुप होने के लिए कहते हैं कि उसे भी रामायण ब्रांड इस हंसी का मजा लेना चाहिए. अब सोचिए कि आपने यह सब रेस्टोरेंट की कोने की सीट में बैठे हुए देखा है.

अब दो सवालों पर गौर कर लेते हैं – क्या रेस्टोरेंट में जोर-जोर से हंसने को चौधरी की आजादी कहा जा सकता है? मोदी का खुद पर बेवजह हमला कर रहे अपने सहकर्मी को एक चुटीली टिप्पणी से धराशायी कर देना, क्या कहा जाएगा? कोई भी सामान्य समझ का आदमी चौधरी के व्यवहार को गलत और मोदी की टिप्पणी को जैसे को तैसा वाला जवाब कहेगा. बेशक, संसद के पृष्ठभूमि में आते ही ये दोनों बातें थोड़ी कम या ज्यादा गलत लगने लगती हैं. फिर भी यह बात इस बहस का जवाब हो सकती है कि अगर रेस्टोरेंट में इस तरह के व्यवहार को आप बदतमीजी कहेंगे तो संसद में यह व्यवहार सही कैसे ठहराया जा सकता है!

और वैसे भी हमारे यहां औपचारिक-अनौपचारिक दोनों तरह के व्यवहार की बात करते हुए ‘संसदीय शिष्टाचार’ की दुहाई दी जाती है. राजनीति सहित किसी भी तरह के सामाजिक या पेशेवर संवाद में अगर किसी की जुबान जरा सी फिसलती दिखती है तो उस पर ‘असंसदीय भाषा’ के इस्तेमाल का आरोप लगता है. इसका सीधा मतलब है कि वह व्यवहार या भाषा जो संसद में इस्तेमाल की जाती है, सर्वश्रेष्ठ है या आदर्श है (हालांकि व्यवहार में ऐसा है नहीं). इस हिसाब से भारतीय संसद के सदस्य यानी सांसद देश के सबसे सभ्य लोग हुए, क्योंकि यह तो निश्चित ही है कि संसद में प्रवेश करने वाले किसी भी व्यक्ति को संसदीय शिष्टाचार का पालन करना है. अब सवाल है कि क्या एक जनप्रतिनिधि होते हुए रेणुका चौधरी का व्यवहार इन कसौटियों पर खरा उतरता है? शायद नहीं! यहां पर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मजाकिया शब्दों को संयत स्वरों में रखा इसलिए उन्हें संसद की मर्यादा पालन करने के अंक दिए जा सकते हैं.

अब जरा रेस्टोरेंट वाले चौधरी पर वापस लौटते हैं. अगर पुरुष चौधरी के अट्टहास को आप उसकी आजादी का गलत इस्तेमाल कहते हैं - वह भी तब जब वो किसी जिम्मेदारी वाले पद पर नहीं बैठा है - तो संसद में एक महिला चौधरी, रेणुका चौधरी को इस तरह हंसने की आजादी कैसे हो सकती है. यहां पर स्पष्ट शब्दों में दो बातें और कही जानी चाहिए, पहली यह कि रेणुका चौधरी की हंसी किसी महिला की निश्छल उन्मुक्त हंसी नहीं थी, बल्कि कानों को चुभने वाला अट्टहास था. दूसरी बात यह कि वे किसी सार्वजनिक जगह पर नहीं, अपने कार्यस्थल पर थीं जहां सवाल पूछना और जवाब सुनना उनकी जिम्मेदारी है, जो उन्होंने नहीं निभाई.

अगर हम महिलाओं को समान अधिकार देने की बात करते हैं तो उनके कर्तव्य भी समान हो जाते हैं. यानी एक जैसी परिस्थितियों में पुरुषों द्वारा किया गया कोई काम गलत है तो महिलाओं के द्वारा किए जाने पर उसे सही नहीं ठहराया जा सकता. संसद में खड़े होकर अगर मोदी ठहाके लगाना शुरू कर दें तो उसे भी गलत ही कहा जाएगा, इस बिना पर रेणुका चौधरी कैसे निर्दोष कही जा सकती हैं. यही बात इसे नारीवाद की बहस से अलग खड़ा कर देती है. अगर बराबरी या आजादी का मतलब अपने कर्तव्यों से विमुख होकर, विवेकहीन काम करना है तो हमें ऐसी बराबरी, ऐसे नारीवाद की जरूरत नहीं है. गलत बातों पर किसी का समर्थन सिर्फ इसलिए कर देना कि वह एक महिला है, एक गलत परंपरा की शुरूआत है.

चलते-चलते यहां एक बात का जिक्र और किया जा सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी पर गौर करें तो उस दिन उन्होंने ऐसा करके बहस की दिशा ही मोड़ दी और वैसे भी उनकी सरकार इसके लिए ही जानी जाती है. हां, इसके बाद उनके नेताओं और समर्थकों ने जिस तरह रेणुका चौधरी का अपमान किया, वह जरूर आपत्तिजनक बात है.

बावजूद इसके यहां पर मोदी की इस टिप्पणी को पूरी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता. यह मानवीय स्वभाव है कि अगर आप कहीं महत्वपूर्ण व्यक्ति के तौर पर कोई जरूरी बात कहने जा रहे हों, और अगला सिर्फ आपको चिढ़ाने के लिए कोई बेतुकी हरकत करता है तो आप किसी भी तरह बस उसका मुंह बंद कर देना चाहते हैं. प्रधानमंत्री की चुटकी के बारे में यह जरूर कहा जा सकता है कि वह हद तीखी प्रतिक्रिया थी. इस विवाद पर अगर कोई संतुलित नजरिया हो सकता है तो यही कि इस मामले को न रामायण से जोड़ा जाना सही है और न ही नारीवाद से, यह तो खांटी राजनीति है!