मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन अपने देश में लोकतंत्र बहाली की विश्व समुदाय की मांग पर फिलहाल आंख मूंदे दिख रहे हैं. सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के लिए उन्होंने ठीक एक हफ्ते पहले देश में आपातकाल लगाया है. इस बीच उनके विरोधी भारत से दखल की मांग कर रहे थे, लेकिन माना जा रहा है कि यमीन के इस दुस्साहसी फैसले के पीछे चीन भी एक कारक है.

चीन का मालदीव में काफी निवेश है, साथ ही उसके विदेशी कर्ज में चीन की 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है. भारत के पश्चिमी-दक्षिणी तट के करीब स्थित इस देश में उठा-पटक शुरू होने के साथ ही चीन ने चेतावनी देनी शुरू कर दी थी कि यह मालदीव का आंतरिक मामला है और इसमें किसी को दखल नहीं देना चाहिए. हालांकि अब इस मसले पर चीन का रवैया थोड़ा बदला है और शुक्रवार को उसका बयान आया है कि मालदीव में स्थायित्व भारत और चीन, दोनों के हित में है. यह एक तरह से भारत की भूमिका और इस क्षेत्र में उसके प्रभाव को लेकर चीन की स्वीकारोक्ति है.

इस समय यमीन को सेना और पुलिस का साथ मिल रहा है. ऐसे में विरोधी नेता उनके सामने नहीं टिक सकते और इसीलिये यह स्वभाविक ही है कि वहां के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद मदद के लिए अपने परंपरागत सहयोगी भारत की तरफ देख रहे हैं. चीन ने करोड़ों डॉलर का निवेश भले किया हो, लेकिन यहां का एक बड़ा राजनीतिक वर्ग इस निवेश को संदेह की नजर से देखता है.

विरोधी नेताओं ने 1988 का हवाला देते हुए भारत से सैन्य दखल देने की मांग भी की है. हालांकि ऐसा मुमकिन नहीं लगता क्योंकि ताजा परिस्थितियां तीस साल पहले से एकदम अलग है. तब कुछ हथियारबंद लोगों ने मालदीव में तख्तापलट की कोशिश की थी और तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दूल गय्यूम ने भारत से मदद मांगी थी.

जबकि इस समय राष्ट्रपति यमीन का विरोधी नेताओं और न्यायपालिका से टकराव के चलते राजनीतिक अस्थिरता फैली है. ऐसे में सैन्य दखल संकट सुलझाने और यहां लोकतंत्र की स्थापना का सही तरीका नहीं है. कुछ ऐसी आवाजें भी उठ रही हैं कि भारत इस मसले पर ज्यादा कुछ नहीं कर रहा. लेकिन इन पर ध्यान दिए जाने की जरूरत नहीं है और भारत को जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए. वैसे नई दिल्ली यमीन के विशेष दूत को भारत आने से मना करके संकेत दे चुकी है कि वह इस मसले पर शांत नहीं है. भारत सरकार की तरफ से कहा गया है कि जब तक मालदीव के राष्ट्रपति लोकतंत्र और न्यायपालिका में भरोसा बहाली से जुड़ी विश्व समुदाय की चिंताओं पर वाजिब प्रतिक्रिया नहीं देते तब तक उनसे कोई बातचीत नहीं की जाएगी.

पिछले दिनों भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान एक नई हिंद-प्रशांत क्षेत्र (इंडो-पैसेफिक) रणनीति पर काफी चर्चा कर चुके हैं. यह इन देशों का ऐसा गठबंधन है जिसके तहत क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थायित्व सुनिश्चित किया जाना है. मालदीव के संकट को लेकर बीते हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फोन पर बातचीत कर चुके हैं और अगर सबकुछ सही दिशा में चलता है तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र रणनीति के जरिए यह संकट को सुलझाने की कोशिश की जा सकती है. यह भारत के लिए एक बड़ा मौका है और ऐसा हो पाता है तो इससे इन देशों के गठबंधन को काफी अहमियत मिलेगा और इसका प्रभाव भी बढ़ेगा. (स्रोत)