नरेंद्र मोदी वह कर रहे हैं जो इससे पहले भारत के किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया था. वे दुश्मन कहे जाने वाले दो देशों - इजराइल औऱ फिलिस्तीन - से एक दोस्ती की राह पर चल पड़े हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फिलिस्तीन जाना कुछ जानकारों और विशेषज्ञों की राय में भारत के मुसलमानों को खुश करने वाला फैसला है. लेकिन इससे जुड़ी एक बेहद हैरान और रोमांचित कर देने वाली सुनी-सुनाई और भी है.

नरेंद्र मोदी को जानने वाले बताते हैं कि जो लोग ये सोचते हैं कि प्रधानमंत्री भारत के मुसलमानों को अपने पाले में लाने के लिए फिलिस्तीन गए वे उन्हें जरा भी नहीं जानते. मोदी जब भी सोचते हैं कुछ अलग सोचते हैं. यहां तक कि उन्होंने अपने करीबी मंत्रियों और अफसरों तक को यह कह रखा है कि वह सोचिए जो भारत में अब तक कोई प्रधानमंत्री नहीं सोच पाया. ऐसी ही एक सोच का नतीजा था हर तरह का जोखिम होने पर भी फिलिस्तीन जाना.

फिलिस्तीन एक ऐसा देश है जिसका अपना एक ढंग का हवाई अड्डा तक नहीं है. जॉर्डन से ही हेलीकॉप्टर के जरिए नेता वहां पहुंचते हैं. रमाल्लाह जाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जॉर्डन नरेश के विशेष हेलीकॉप्टर का सहारा लिया. वे खुद इस रॉयल हेलीकॉप्टर में बैठे थे और इजराइली आर्मी के हेलीकॉप्टर उन्हें हवा में सुरक्षा दे रहे थे. रमाल्लाह में फिलिस्तीन के प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात के बाद मोदी ने एकदम फिलिस्तीन के मन की बात कही और ऐसा बयान दिया जिससे इज़राइल नाराज़ हो सकता था. फिलिस्तीन ने भी मोदी को ग्रेंड कॉलर सम्मान से नवाज़ा जिसे वहां का सबसे बड़ा सम्मान कहा जाता है.

अब सोचने वाली बात यह है कि इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू प्रधानमंत्री मोदी के जिगरी यार हैं. दोनों एक-दूसरे को पहले नाम से यानी नरेंद्र और बेंजामिन कहकर बुलाते हैं. कुछ दिन पहले जब नेतन्याहू भारत आए थे तब प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दोस्त की जबरदस्त खातिरदारी की थी. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने फिलिस्तीन में जाकर भारत-इज़राइल की दोस्ती में खटास लाने वाली बात कह दी!

मोदी की विदेश यात्रा की खबर रखने वाले एक विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि नरेंद्र मोदी से मिलने बेंजामिन नेत्नयाहू का दिल्ली आना और फिर मोदी का फिलिस्तीन जाना और इजराइली हैलिकॉप्टरों का उन्हें सुरक्षा देना, ये सब इत्तेफाक से बहुत ज्यादा है. दिल्ली से साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक में अफसरों के बीच खबर उड़ी हुई है कि प्रधानमंत्री की नजर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार नोबल शांति पुरस्कार पर है. वह पुरस्कार जो महात्मा गांधी को भी नहीं मिल पाया था.

पूरी दुनिया में इज़राइल-फिलिस्तीन की दुश्मनी सबसे बड़ी खबर बनती है. भारत-पाकिस्तान के बीच की दुश्मनी भी उसके सामने कमजोर पड़ती है. जितने भी विदेश के बड़े अखबार और टेलिविजन चैनल्स हैं उनके लिए इजराइल-फिलिस्तीन के बीच किसी भी तरह का समझौता करवाने वाला नेता हीरो माना जाता है. अमेरिका राष्ट्रपति रहे बिल क्लिंटन से लेकर बराक ओबामा तक ने इसकी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए. अब खबर है कि इस दिशा में अगली कोशिश भारत की तरफ से होने वाली है.

मोदी सरकार में विदेश मंत्रालय में काम करने वाले एक अफसर की मानें तो यह पहला मौका होगा जब भारत सरकार इतने बड़े स्तर पर कोई विश्व शांति की पहल करेगी. नरेंद्र मोदी अब केवल भारत के नहीं दुनिया के बड़े नेताओं में शुमार होना चाहते हैं. अगर उन्होंने इस दिशा में ऐसा कुछ कर दिखाया जो अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं कर पाए तो यह जबरदस्त खबर बनेगी. पूरी दुनिया के मीडिया में तब मोदी छा सकते हैं.

जो मोदी को जानते हैं वे बताते हैं कि अब वे अपना कद अंतरराष्ट्रीय नेता का बनाना चाहते हैं. इसलिए जब टाइम मैग्जीन ने उन्हें पर्सन ऑफ द ईयर की रेस में शामिल किया था तो इससे उन्हें बेहद उम्मीद थी. लेकिन दोनों बार उन्हें पर्सन ऑफ द ईयर नहीं चुना गया. इसके बाद उन्होंने अपने करीबी लोगों से कहा कि इस पोल की कसौटी लोकप्रियता नहीं कुछ और ही है, इसलिए अब वे इसे गंभीरता से नहीं लेते.

जब इज़राइल के प्रधानमंत्री भारत आए थे तो नरेंद्र मोदी ने उनसे अनौपचारिक तरीके से फिलिस्तीन-इज़राइल के संबंधों पर बात की थी. सुनी-सुनाई है कि इज़राइल इस बात पर तैयार हो गया है कि भारत इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाए. उसी बातचीत की दूसरी कड़ी जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री ने फिलिस्तीन जाकर वहां के राष्ट्रपति से बात की. खबर है कि उसे भी भारत की मध्यस्थता पर कोई एतराज नहीं है. अगर मोदी ने दिल्ली में इजराइल-फिलिस्तीन की दोस्ती की इबारत लिखवा दी तो फिर उन्हें नोबल शांति पुरस्कार मिल सकता है. मोदी को जानने वाले कहते हैं यह एक ऐसी इच्छा है जो वे बता भी नहीं सकते और ठीक से छिपा भी नहीं पाते.