केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर उच्च अदालतों की अनदेखी करने का अक्सर आरोप लगता है. और अब सरकारी आंकड़े ही इस आरोप की पुष्टि करते दिखाई देते हैं. ये आंकड़े देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशाें के खाली पदों से संबंधित हैं. साथ ही इन पदों को भरने के प्रति सरकार कितनी गंभीर है इसका भी ख़ुलासा करते हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स ने केंद्रीय कानून मंत्रालय से मिले आंकड़ों के हवाले से बताया है कि इसी एक फरवरी को उच्च न्यायालयों में अतिरिक्त न्यायाधीशों के खाली पदों की संख्या 403 हो चुकी थी. हालांकि बीते शनिवार को सरकार ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में पांच न्यायाधीशों की नियुक्ति को हरी झंडी दी. इसके बाद यह आंकड़ा 398 हो गया है. लेकिन मंत्रालय के मुताबिक़ एक महीने पहले भी यही स्थिति थी जब न्यायाधीशों के 397 पद खाली थे.

इस तादाद में पद खाली होने के बावजूद सरकार इन्हें भरने के लिए गंभीर है ऐसा भी नहीं लगता. कानून मंत्रालय के ही एक वरिष्ठ अफ़सर बताते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम उच्च न्यायालयों के लिए लगभग 75 न्यायाधीशाें की नियुक्तियों को हरी झंडी दे चुका है. लेकिन ये नियुक्तियां सरकारी तंत्र के विभिन्न स्तरों पर अटकी हैं. और यह स्थिति भी तब है जबकि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की तादाद 2016 में 126 के मुताबले 2017 में 115 रह गई है.

विशेषज्ञों की मानें तो इस स्थिति की बड़ी वज़ह वह गतिरोध है जो एनजेएसी (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) अधिनियम के बाद से ही केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच अब तक बना हुआ है. याद दिला दें कि मोदी सरकार ने 2015 में एनजेएसी अधिनियम पारित किया था. लेकिन उसी साल अक्टूबर में शीर्ष अदालत की संविधान बेंच ने इस अधिनियम को ‘असंवैधानिक’ बताकर रद्द कर दिया. फिर दो महीने बाद सरकार को आदेश दिया कि न्यायाधीशाें की नियुक्ति के लिए वह एक प्रक्रिया पत्र (मेमोरेंडम ऑफ़ प्रोसीज़र-एमओपी) तैयार करे. लेकिन इस एमओपी पर सरकार और शीर्ष अदालत के बीच अब तक सहमति नहीं बन सकी है.