2014 के लोकसभा चुनावों की तैयारी के दौरान भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की कई छवियां गढ़ी जा रही थीं. उनमें एक छवि चाय वाले की भी थी. नरेंद्र मोदी दावा करते हैं कि बचपन के दिनों में उन्होंने चाय बेचने का काम किया था. इन सबके बीच कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने यह बयान दे दिया कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनना भूल जाएं, लेकिन वे चाहें तो कांग्रेस कार्यकारिणी में स्टाॅल लगाकर चाय बेच सकते हैं.

इस बयान के बाद भाजपा ने इसे एक बड़ा मुद्दा बना दिया. भाजपा और खुद नरेंद्र मोदी ने इसे आम लोगों के संघर्ष का अपमान बताया. भाजपा की प्रचार मशीनरी ने इस बयान के आसपास इस ढंग से चुनाव प्रचार अभियान तैयार किया कि नरेंद्र मोदी को अय्यर के इस बयान पर भारी जनसमर्थन मिला. इस बयान की वजह से ही कांग्रेस को अपने पूरे चुनाव अभियान में रक्षात्मक मुद्रा अपनाने के लिए बाध्य होना पड़ा. सामान्य पृष्ठभूमि वाले उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के संघर्ष पर नरेंद्र मोदी का संघर्ष हावी हो गया और मई, 2014 में मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री उनकी जगह ले ली.

पकौड़ा कहीं मुंह न जला दे

उस बात को अब करीब चार साल होने जा रहे हैं. विपक्षी दल अब जिन मुद्दों पर भाजपा को लगातार घेर रहे हैं उनमें से एक रोजगार भी है. भाजपा भी लगातार इस पर प्रतिक्रिया दे रही है. हाल ही में एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी ने रोजगार सृजन के सवाल पर पकौड़े बेचने को भी एक रोजगार बताया. उनका कहना था, ‘अगर पकौड़े बेचकर कोई पूरे दिन में 200 रुपये कमाता है तो उसे आप रोजगार मानेंगे कि नहीं!’

इस बयान को कांग्रेस ने कुछ उसी तरह से सियासी मुद्दा बना दिया है जिस तरह से भाजपा ने मोदी के ‘चाय बेचने’ की बात को बना दिया था. पकौड़ा बेचने को रोजगार बताए जाने के बाद से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत पार्टी के तमाम नेता इस मसले पर लगातार मोदी और उनकी सरकार पर हमले कर रहे हैं.

दूसरे दलों के नेता भी इस बयान पर नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश में हैं. सोशल मीडिया पर आम लोग भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान पर अपनी नाराजगी दिखा रहे हैं. कांग्रेस की तरफ से इस मसले पर कटाक्ष करते हुए जो भी सामग्री सोशल मीडिया पर डाली जा रही है, वह लोगों के बीच खासी लोकप्रिय हो रही है. बहुत लोगों को यह लगता है कि अगर कांग्रेस ने इस मुद्दे को सही ढंग से उठाया तो इसका उसे चुनावी लाभ भी मिल सकता है. इनका मानना है कि बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं को प्रधानमंत्री का पकौड़े वाला बयान एक भद्दा मजाक लग सकता है.

सौदा और सवाल

इसी तरह से राफेल सौदे के मसले पर नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और उनकी पार्टी भाजपा कुछ उसी तरह से घिरती नजर आ रही है जिस तरह 1980 के दशक के अंत में बोफोर्स के मुद्दे पर राजीव गांधी और कांग्रेस घिरे थे. बोफोर्स मामले में पैसे खाने के आरोपों की आंच तब राजीव गांधी तक पहुंच गई थी. उस समय राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर इसे बहुत बड़ा मुद्दा बना दिया था.

1989 के लोकसभा चुनावों में वीपी सिंह को इस मुद्दे दूसरी विपक्षी पार्टियों का भी साथ मिला. अपनी हर चुनावी सभा में वीपी सिंह एक कागज दिखाते थे और कहते थे कि इसमें उन लोगों के नाम हैं जिन्होंने बोफोर्स सौदे में पैसे खाए हैं और वे प्रधानमंत्री बनते ही इन सभी को जेल भेज देंगे. बोफोर्स मामले से ऐसा माहौल बना कि मिस्टर क्लीन की छवि रखने वाले राजीव गांधी भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से चुनाव हार गए. इसके बाद वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बन गए. हालांकि, प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने ऐसी किसी लिस्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया जिसकी बात वे अपनी चुनावी सभाओं में किया करते थे.

इसी तर्ज पर आज नरेंद्र मोदी सरकार राफेल विमानों की खरीद के मसले पर घिरी हुई दिख रही है. फ्रांस की राफेल कंपनी से केंद्र सरकार 36 विमान खरीद रही है. कांग्रेस मांग कर रही है कि यह सौदा कितने में हुआ है, इसे वह सार्वजनिक करे. लेकिन मोदी सरकार इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का विषय बताते हुए विमानों की कीमत बताने को तैयार ही नहीं है.

इन सबके बीच कांग्रेस यह आरोप लगा रही है कि उसकी सरकार ने इन विमानों का सौदा तकरीबन 450 करोड़ रुपये प्रति विमान की दर से किया था, लेकिन मोदी सरकार एक विमान के लिए इसके दुगने से ज्यादा खर्च कर रही है. राष्ट्रीय सुरक्षा के सरकार के तर्क को न तो कांग्रेस मानने को तैयार है और न ही आम लोग ही इसे कोई खास तवज्जो देते दिख रहे हैं. सबको यही लग रहा है कि पारदर्शिता की बात करने वाली सरकार को सौदे की कीमत सार्वजनिक करने में क्या परेशानी है सरकार की इसी अनिच्छा को राजनीतिक मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बीते दिनों ट्वीट किया, ‘डील में कुछ काला है.’ यह हिंदी कहावत ‘दाल में कुछ काला है’ पर आधारित है.

राजनीतिक जानकारों को लगता है कि राफेल सौदे के मसले पर मोदी सरकार जिस तरह की हीलाहवाली कर रही है, उसे अगर कांग्रेस ने ठीक से मुद्दा बना दिया तो इसका चुनावी फायदा कांग्रेस को कुछ उसी तरह से मिल सकता है जिस तरह का फायदा बोफोर्स की वजह से वीपी सिंह को मिला था. कांग्रेस इस मुद्दे को उसी दिशा में ले जाना चाहती है, इसके संकेत कर्नाटक से मिल रहे हैं. अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए अभी से कांग्रेस राफेल सौदे को मुद्दा बना रही है और पार्टी के हर मंच से इसे उठाया जा रहा है.