पाकिस्तान की जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता असमा जहांगीर का निधन हो गया है. वे 66 साल की थीं. उनके निधन की वजह दिल का दौरा बताई गई है.

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ असमा जहांगीर की बेटी मुनीज़े जहांगीर ने अपने ट्वीट के जरिए इसकी पुष्टि की है. उन्हाेंने बताया कि अंतिम संस्कार से पहले कुछ नज़दीकी रिश्तेदारों का इंतज़ार किया जा रहा है. उनके आते ही सुपुर्दे खाक की तारीख़ का भी ऐलान कर दिया जाएगा.

 “I am devastated @ loss of my mother Asma Jahangir. We shall B announcing date of funeral soon. We R waiting 4 our relatives 2 return 2 Lahore,” - Munizae Jahangir

असमा पाकिस्तान के उन चुनिंदा सामाजिक कार्यकर्ताओं के शुमार होती थीं जो सत्ता-संस्थानों के अन्याय के ख़िलाफ़ खुलकर बोलते थे. ख़ास तौर पर सैन्य तानाशाही की तो वे मुखर विरोधी थीं. बहुत सी लड़ाइयां वे अदालतों में ले गईं जो अब कानूनी इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं. मसलन- 1972 का जिलानी बनाम पंजाब सरकार मामला. तब पाकिस्तान में याह्या खान के नेतृत्व में सैन्य शासन लागू था. सरकार ने असमा के पिता को क़ैद कर लिया था. इसे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और अदालत ने सैन्य शासन को ‘अवैधानिक’ घोषित कर दिया.

असमा जहांगीर जनरल ज़िया-उल-हक़ के सैन्य शासन के ख़िलाफ़ भी लड़ीं. उस वक़्त उनका घर ऐसे लोगों का बड़ा जमावड़ा बन चुका था जिनके ख़िलाफ़ हक़ सरकार ने तमाम मुक़दमे खोल दिए थे. उन्होंने जनरल ज़िया की सरकार द्वारा महिलाओं के ख़िलाफ़ लाए गए हुदूद कानून के विरुद्ध भी आवाज़ उठाई. इसके बाद जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की सैन्य तानाशाही के ख़िलाफ़ भी उनका इसी तरह का संघर्ष ज़ारी रहा. इसके चलते कई बार उन पर भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी- रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) का एजेंट होने के आरोप भी लगाए गए. उन्हें जेल भी जाना पड़ा.

असमा की प्रेरणा व समर्थन से 1980 में उनकी बहन हिना जिलानी ने देश की पहली महिला कानून फ़र्म स्थापित की. इसमें सभी कर्मचारी महिलाएं थीं और इसे महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए स्थापित किया गया था. उन्होंने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन में देश की पहली महिला अध्यक्ष बनकर महिलाओं के सामने मिसाल पेश की. इसके अलावा पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की स्थापना के लिए भी उन्होंने संघर्ष किया. वे इस आयोग की संस्थापक सदस्य भी थीं.