मान लीजिए कि सोमवार की सुबह आप दफ्तर जाने के लिए निकले, गैराज में गए और देखा कि आपकी कार स्टार्ट ही नहीं हो रही है। अब क्या करेंगे? या तो मैकेनिक को बुलाएंगे, गाड़ी ठीक कराएंगे और फिर दफ्तर जाएंगे. या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के भरोसे घर से निकलेंगे. दोनों ही स्थितियों में आपका मूड खराब होगा, वक्त भी ज़ाया होगा, परेशानी होगी सो अलग. लेकिन अब ज़रा फर्ज़ करिए कि शनिवार की ड्राइव के दौरान ही आपकी गाड़ी अपने अंदर आई हुई खराबी के बारे में मैकेनिक को खुद खबर कर दे. फिर वहां से आपके मोबाइल पर संदेश आए कि आपकी गाड़ी में फलां समस्या है, जिसे आप तुरंत आकर ठीक करा लें, तो? क्या तब आप तमाम परेशानियों से बच नहीं जाएंगे?

इसी तरह अगर आपके फ्रिज में कैमरा हो जो अंदर रखे सामान को देख कर आपको यह संदेश भेज सके कि दूध खत्म हो चुका है या फिर जूस का कार्टन इस्तेमाल की आखिरी तारीख से पुराना हो चुका है, तो कैसा रहेगा? अब आप कहेंगे कि गाड़ी खुद कैसे बता सकती है कि उसके अंदर कोई समस्या है, या फ्रिज कैसे संदेश भेज सकता है, तो इस कैसे का जवाब है आइओटी यानी इंटरनेट ऑफ थिंग्स. बहुत मुमकिन है कि अगले दस सालों में ये नई तकनीक आपकी ज़िंदगी वाकई इतनी आसान बना दे.

इंटरनेट ऑफ थिंग्स एक ऐसी तकनीक है जिसमें किसी भी मशीन को रेडिओ फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन टैग या किसी और सेंसर और इंटरनेट के जरिये एक-दूसरे से जोड़ा जा सकता है. अगर बिलकुल आसान भाषा में कहें तो आईओटी एक ऐसी दुनिया की बात करती है जिसमें हमारी रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें आपस में इस तरह से बातें करती हैं कि हमारी जिंदगी पहले से आसान हो जाती है. इन दिनों हम स्मार्ट कार, स्मार्ट हाउस और स्मार्ट सिटी के बारे में काफी सुनते हैं. ये सारी स्मार्ट चीज़ें कम से कम समय और आपकी मेहनत में आपके लिए ज़्यादा से ज़्यादा और अच्छा करने की कोशिश करती हैं. आईओटी भी इसी तरह सेंसर, कैमरों, वाई-फाई आदि की मदद से आपकी मशीनों को पहले से ज्यादा स्मार्ट बना देता है.

उदाहरण के लिए अगर आपने अपने फोन में सुबह सात बजे का अलार्म लगाया जो आपके गीज़र से जुड़ा हुआ है तो वह आपके उठने से पहले ही आपके नहाने का पानी गर्म कर चुका होगा. या मान लीजिए आप दफ्तर जाने के लिए रोज़ एक बस या ट्रेन पकड़ते हैं जो किसी दिन 15 मिनट लेट है. अगर यह जानकारी आपके अलार्म सिस्टम तक पहुंच जाये और वह आपको 15 मिनट और सोने दे तो? या फिर आपके कॉन्टैक्ट लैंस में लगा सेंसर आपके आंसू में मौजूद ग्लूकोज़ की मात्रा को नापकर आपके या आपके डॉक्टर के मोबाइल डिवाइस को बता सके तो? आईओटी ये सब कर सकता है.

आज हममें से बहुत से लोगों ने इंटरनेट ऑफ थिंग्स के बारे में सुना तक नहीं है. आज से पंद्रह साल पहले हमने स्मार्टफोन के बारे में भी नहीं सुना था, लेकिन पिछले पंद्रह सालों में जिस तरह स्मार्टफोनों ने दुनिया को बदला है, हम देख चुके हैं. इंटरनेट ऑफ थिंग्स पर वर्षों से काम कर रहे, भविष्यवादी टॉम राफ्टेरी अपनी वेबसाइट पर आईओटी के आने वाले दस सालों के बारे में कुछ दिलचस्प बातें लिखते हैं.

टॉम लिखते हैं कि ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ कहना आने वाले दस सालों पूरी तरह से गैर जरूरी होगा. वैसे ही जैसे आज हम ‘इंटरनेट कनेक्टेड स्मार्टफोन’ या फिर ‘इंटरेक्टिव वेबसाइट’ नहीं कहते हैं. जैसे आज हर स्मार्टफोन इंटरनेट से जुड़ा है और हर वेबसाइट इंटरेक्टिव है उसी तरह दस साल बाद हर चीज़ इंटरनेट से जुड़ी होगी.’ टॉ्म के मुताबिक अगले दस सालों में वाहनों के एक दूसरे से जुड़े होने के कारण यातायात बहुत बेहतर हो जाएगा जिससे दुर्घटनाएं भी कम होंगी. इससे स्वास्थ्य व्यवस्था भी बेहतर होगी क्योंकि बीमारी होने के बाद इलाज करने की मौजूदा स्थिति के बजाय तब तमाम सेंसर्स की मदद से इनके बारे में पहले से ही पता लग सकेगा. खेती से लेकर मेन्यूफैक्चरिंग तक, अगले दस सालों में बहुत बदल चुका होगा.

टॉम राफ्टेरी 10 साल बाद की जिस स्थिति की बात कर रहे हैं चीजें उस दिशा में जाते हुए अब दिखने भी लगी हैं. वाई-फाई इनेबल्ड घड़ियां, कैमरे, टीवी और फ्रिज अब कई लोगों के लिए रोजमर्रा की चीज बन चुके हैं. लेकिन यह सिर्फ एक शुरुआत है. आईओटी एक्सपर्ट गगन दीप कहते हैं, ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स एक ऐसी क्रांति है जो बहुत जल्द बहुत कुछ बदल देने वाली है. आप निजी या सामाजिक, किसी भी समस्या के बारे में सोचिए, आईओटी उस समस्या को दूर करने में ज़रूर कोई न कोई भूमिका निभाती नज़र आएगी. जैसे आप सुपर बाज़ार में खरीदारी कर रहे हैं, काफी भीड़ है और बिलिंग कराने के लिए आपको काफी लंबे समय तक लाइन में रहना पड़ता है. जब मैं इस समस्या से गुज़रा तो मैंने सोचा कि क्यों न सामान रखने वाली ट्रॉली में ऐसे सेंसर लगा दिए जाएं जो उसमें रखे गए सामान की कीमत खुद जोड़ लें, और फिर इसे सुपरबाज़ार के दरवाज़े और आपके बैंक खाते या ई-वॉलेट से जोड़ दिया जाए ताकि बाहर निकलते ही ट्रॉली में रखे गए सामान की कीमत खुद ब खुद आपके खाते से अदा हो जाए. हमने इस पर काम किया और सिस्टम बना लिया. लेकिन दिक्कत फिलहाल ये है कि हम उसे कॉस्ट इफेक्टिव नहीं बना पाए. लेकिन आने वाले समय में इस तरह की समस्याओं का कॉस्ट इफेक्टिव समाधान बहुत मुमकिन है.’

गगन आगे बताते हैं कि जब अमेरिका के सुरक्षा विभाग ने इंटरनेट बनाया था तब इससे जोड़ी जा सकने वाली डिवाइसेज की संख्या सीमित रखी थी. कुल 400 करोड़ डिवाइसेज इंटरनेट से जोड़ी जा सकती थीं. लेकिन आइपीवी-6 के आने के बाद असंख्य डिवाइसेज को इंटरनेट से जोड़ा जा सकता है. और अब क्योंकि इन डिवाइसेज को इंटरनेट से जोड़ने वाली चिप का आकार लगातार छोटा होता चला जा रहा है और कीमत कम, तो हम किसी भी चीज़ को इंटरनेट या मोबाइल फोन से जोड़ सकते हैं. हमें इसके लिए हार्डकोर प्रोग्रामिंग जानने की भी ज़रूरत नहीं, बस एक चिप चाहिए, और थोड़ी सी प्रोग्रामिंग जो इंटरनेट से भी सीखी जा सकती है. अपने घर की लाइट,एसी आदि को तो लोग खुद ही मोबाइल से कंट्रोल करने लायक बना सकते हैं. ऐसे में आने वाले समय में आईओटी से जुड़ी चीजों और उनसे जुड़े लोगों की सुरक्षा भी एक खास मसला बनकर उभर सकती है. लेकिन जानकारों का मानना है इस तकनीक से जुड़ी चुनौतियों से निपटने का काम भी तकनीक ही करेगी.

आईओटी से जुड़ा एक सवाल यह भी है कि इस तकनीक का विकसित और विकासशील देशों के बीच के अंतर पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है? क्या जादुई फायदों वाली यह तकनीक सबको उतना ही फायदा पहुंचाने वाली है?

इस सवाल को अगर हम सीधे हल करने की कोशिश करें तो जवाब बहुत सकारात्मक नहीं लगता. भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश भी अभी अपनी पूरी जनसंख्या को इंटरनेट तो क्या बिजली भी नहीं दे पाए हैं. ऐसे में आईओटी किसी सुनहरे सपने जैसा लगता है. दूसरी तरफ, तेज़ी से बढ़ते मोबाइल पेनिट्रेशन के इस दौर में आईओटी का इस्तेमाल एक विकासशील देश को विकास की नई संभावनाएं भी दे सकता है. यूनाइटेड नेशंस ब्रॉडबैंड कमिशन फॉर सस्टेनिबल डिवेलपमेंट के लिए तैयार की गई सिस्को की रिपोर्ट ‘हारनेसिंग द इंटरनेट ऑफ थिंग्स फॉर ग्लोबल डिवेलपमेंट’ तो कम से कम यही कहती है.

क्योंकि विकसित देशों में पहले से ही आईओटी डिवाइसेज और कनेक्टिविटी पर काफी काम हो चुका है तो ये वस्तुएं आसानी से कम दामों में विकासशील देशों के लिए भी उपलब्ध कराई जा सकती हैं. और क्योंकि दुनिया की 95 फीसदी जनसंख्या के पास कम से कम 2जी इंटरनेट पहुंच चुका है तो हम कह सकते हैं कि दुनिया के ज्यादातर लोगों के पास इंटरनेट ऑफ थिंग्स का बुनियादी ढांचा भी मौजूद है. ऐसे में अगर सरकारें ध्यान दें तो आइओटी को विकास के नये हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकती हैं. इसके लिए सबसे पहले बिना देर किए पहले तो उन्हें आईओटी में शोध और इनवेस्टमेंट को बढ़ावा देना होगा और यह भरोसा भी बनाना होगा कि इसके द्वारा इकट्ठा किया जा रहा डेटा गलत इस्तेमाल नहीं होगा.

भारत में आईओटी के भविष्य के बारे में गगन कहते हैं, ‘हमारे पॉलिसी-मेकर्स की देर कर देने की टेंडेंसी के चलते हम पीछे रह जाते हैं. ज़्यादा तकनीक आने से चीज़ें ज़्यादा पारदर्शी हो जाएंगी, और ऐसे में भ्रष्टाचार के मौके और कम हो जाएंगे, इसलिए भी नई तकनीक को अपनाने से हमारी सरकारी मशीनरी डरती है. मान लीजिए कल हमने अपनी कारों को ट्रैफिक सिग्नल्स से जोड़ दिया. और ट्रैफिक लाइट जंप करने के बाद अगर आपकी कार ट्रैफिक पुलिस को खुद मैसेज भेजे कि मुझे चालान भेज दो क्योंकि मेरी गलती है, तो पुलिस वाले को चालान देना पड़ेगा और यहां उसे रिश्वत लेने का मौका नहीं मिलेगा.’

‘मौजूदा केंद्र सरकार के स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट में भी आईओटी के लिए काफी संभावनाएं हैं’, गगन बताते हैं. हालांकि वे कहते हैं कि 100 करोड़ की राशि एक स्मार्ट सिटी के लिए ऊंट के मुंह में ज़ीरा है. लेकिन वे ये भी कहते हैं कि विप्रो, इनफोसिस जैसी बड़ी कंपनियां जो अभी आईओटी पर काफी काम कर रही हैं उन्हें बहुत जल्द ही इन स्मार्ट सिटीज़ पर काम करने के लिए सरकारी टेंडर मिल सकते हैं.

‘इन सिटीज़ में सफाई-व्यवस्था, परिवहन, कानून व्यवस्था और हैल्थकेयर को स्मार्ट बनाने के लिए आईओटी की ज़रूरत पड़ेगी. जैसे कि सीवेज पाइप में अगर सेंसर है तो वो कंट्रोल रूम को बता सकता है कि फलां जगह पर ब्लॉकेज है जिसे तुरंत दूर किए जाने की ज़रूरत है. इस तरह का सारा काम बड़ी कंपनियों के पास जाएगा. तो आईओटी का भारत में बहुत ज़्यादा स्कोप है’ गगन कहते हैं, ‘आप अगले दस साल की बात करती हैं, आप देखिए 2020 तक दुनिया भर में करीब 50000 करोड़ डिवाइसेज आईओटी का हिस्सा होंगी, जबकि विश्व की कुल जनसंख्या 800 करोड़ से कम है.’