2016-17 के बजट में पहली बार यह बात केंद्र सरकार की ओर से आई थी कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर दी जाएगी. इसके बाद 2017-18 के बजट में भी इस बात का जिक्र किया गया. बीते एक फरवरी को पेश 2018-19 के आम बजट में भी केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह कहा कि केंद्र सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन कई जानकार मानते हैं कि मोदी सरकार के लिए अब ऐसा कर पाना संभव नहीं हैं. आइये उन पांच तथ्यों और वजहों को जानने की कोशिश करते हैं जिनके चलते कई कृषि विशेषज्ञों को डर है कि 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का मोदी सरकार का वादा सिर्फ एक जुमला भर बनकर न रह जाए.

अब तक खास प्रगति नहीं

पहली बार किसानों की आय दोगुना करने की घोषणा हुए दो साल का वक्त हो गया है. पहली बार यह घोषणा 28 फरवरी, 2016 को वित्त वर्ष 2016-17 का बजट पेश करते हुए की गई थी. यानी कि 2016 से 2022 तक सरकार के पास किसानों की आय दोगुना करने के लिए छह साल का वक्त था. इस हिसाब से किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी पहले दो सालों में भी होनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सच्चाई तो यह है लगातार बढ़ रही कृषि लागत की वजह से किसानों की आमदनी उल्टी कम हो रही है. अच्छे उत्पादन के बावजूद नोटबंदी की वजह से भी किसानों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. अगर इस दौरान सरकार के स्तर पर कुछ ठोस काम हुआ होता तो पिछले एक साल में कई किसान आंदोलन नहीं होते और किसानों की कर्ज माफी की मांग भी जोर नहीं पकड़ती.

धीमी कृषि विकास दर

2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लिए सुझाव देने के मकसद से केंद्र सरकार ने अशोक दलवई समिति बनाई थी. इस समिति ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. इसमें यह कहा गया है कि अगर सरकार किसानों की आय दुगुनी करने का लक्ष्य अगर 2022 तक हासिल करना चाहती है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि कृषि की सालाना विकास दर 12 फीसदी या इससे अधिक रहे. केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने से अब तक सालाना कृषि विकास दर औसतन 1.9 फीसदी रही है. जाहिर है कि ऐसे में अगले चार साल में किसानों की आमदनी दोगुनी करना असंभव सा ही लगता है.

जरूरी निवेश का अभाव

अशोक दलवई समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर सरकार वाकई 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करना चाहती है तो उसे 2022 तक कृषि क्षेत्र में छह लाख करोड़ रुपये का निवेश करना होगा. समिति के मुताबिक ऐसा किए बगैर किसानों की आय 2022 तक दोगुना करना मुश्किल होगा. लेकिन इस मोर्चे पर मोदी सरकार कुछ खास करती नजर नहीं आ रही है. पिछले साल के मुकाबले इस साल के कृषि बजट में सिर्फ 14 फीसदी की बढ़ोतरी की घोषणा की गई है. इसका मतलब यह हुआ कि दलवई समिति जिस अनुपात में कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की बात कह रही है, उस अनुपात में सरकार निवेश नहीं बढ़ा रही है.

न्यूनतम समर्थन मूल्य की कोई गारंटी नहीं

केंद्रीय वित्त मंत्री ने बजट भाषण में कहा कि किसानों को कुछ फसलों की लागत के मुकाबले डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जा रहा है. बचे हुए फसलों को भी इस दायरे में लाने की घोषणा उन्होंने की. कृषि के विषयों को समझने वाले इस दावे पर दो तरह से सवाल उठा रहे हैं. एक, इन विशेषज्ञों को लगता है कि कृषि लागत का अनुमान लगाने वाला सरकारी फार्मूला गड़बड़ है और इससे कृषि उत्पादों की सही लागत का अंदाजा नहीं लगता. इसका मतलब यह हुआ कि अगर सरकार 50 फीसदी अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य देती भी है तो वह किसानों की वास्तविक लागत का डेढ़ गुना नहीं होगा.

इन लोगों का दूसरा सवाल यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी की सरकारी व्यवस्था ठीक नहीं है. कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि सिर्फ छह फीसदी किसानों को ही न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पा रहा है और बचे 94 फीसदी को अपने उत्पाद इससे कम कीमत पर बाजार में बेचने को बाध्य होना पड़ रहा है. इस हिसाब से 2022 तक ज्यादातर किसानों की आय का दोगुना होना बेहद मुश्किल दिख रहा है.

स्पष्ट नहीं आधार

सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने को कह तो रही है लेकिन यह स्पष्ट नहीं कर रही है कि इसके लिए आधार वर्ष क्या होगा. इस योजना की घोषणा 2016-17 का बजट पेश करते हुए की गई थी. तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि किसानों की जो आमदनी 2016-17 में थी, सरकार 2022 तक उसे दोगुना कर देगी? आधार वर्ष को लेकर सरकार ने अब तक स्पष्ट तौर पर कोई बात नहीं कही है. कुछ लोग इसी आधार पर किसानों की आमदनी दोगुना करने के सरकार के वादे की गंभीरता पर सवाल उठा रहे हैं.

इसके अलावा सरकार ने अब तक यह भी स्पष्ट नहीं किया है कि किसानों की आमदनी में बढ़त को नापते वक्त क्या महंगाई के प्रभाव को भी इसमें शामिल किया जाएगा? क्योंकि अगर कोई किसान 2016 में 1,000 रुपये कमा रहा था तो 2022 में उसके 2000 रुपये कमाने को उसकी आमदनी का दोगुना होना इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि इन छह सालों में महंगाई भी बढ़ेगी. इसे भी अब तक सरकार ने स्पष्ट नहीं किया है.