उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के सोमवार को जारी हुए ताजा आंकड़े केंद्र सरकार के लिए राहत लेकर आए हैं. इनके अनुसार जनवरी 2018 में खुदरा महंगाई दर घटकर 5.07 फीसदी रह गई है. एक महीने पहले यह 5.21 फीसदी थी. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने बताया है कि खाने-पीने के सामानों जैसे सब्जियों, अंडे, दाल, चीनी और मिठाई के सस्ते होने से सीपीआई में कमी दर्ज की गई है. यही वजह है कि सीपीआई में करीब 46 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले खाद्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीएफपीआई) में दिसंबर के 4.96 फीसदी के बजाय महज 4.70 फीसदी की वृद्धि हुई है.

हालांकि कई जानकारों को मानना है कि इन आंकड़ों पर खुश होने के बजाया मोदी सरकार को सतर्क रहने की जरूरत है. उनके मुताबिक जनवरी में खाने-पीने के सामानों के सस्ते होने के बावजूद आने वाले महीनों में उनके दाम ऊंचे होने का अंदेशा है. इसके अलावा और भी कई कारण हैं जिनके चलते मौजूदा वित्त वर्ष के बाकी दो महीनों में खुदरा महंगाई दर के पांच फीसदी से ज्यादा बने रहने का अनुमान है. इस साल गर्मियों में तो इसके छह फीसदी के पार हो जाने का खतरा बताया जा रहा है. आरबीआई के मध्यकालिक लक्ष्य के मुताबिक इस साल मार्च तक खुदरा महंगाई दर को चार फीसदी तक सीमित कर दिया जाएगा. लेकिन अब तो आरबीआई का अनुमान ही कह रहा है कि मौजूदा वित्त वर्ष में अक्टूबर से मार्च के बीच यह 4.3 से 4.7 फीसदी के बीच रह सकती है. जानकारों के मुताबिक ऐसे में आरबीआई गवर्नर की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति की ओर से ब्याज दरों में अगले कई महीनों तक कटौती करने की कोई संभावना नहीं है.

ऊंची महंगाई दर के अन्य कारण

1. निम्न आधार प्रभाव-किसी भी आंकड़े के आकलन में आधार प्रभाव यानी बेस इफेक्ट की बड़ी भूमिका होती है. खुदरा महंगाई दर भी इसका अपवाद नहीं है. 2017 की पहली छमाही में खुदरा महंगाई दर दूसरी छमाही के मुकाबले कम थी. जून 2017 में खुदरा महंगाई दर के पांच साल के न्यूनतम स्तर - 1.54 फीसदी - तक गिर जाने से पहली छमाही में इसका औसत केवल 2.89 फीसदी रह गया था. वहीं दूसरी छमाही में यह आंकड़ा बढ़ता हुआ 3.78 फीसदी तक जा पहुंचा था. जानकारों के अनुसार इसके चलते इस साल पहली छमाही में महंगाई में हुई थोड़ी सी भी तेजी इसके आंकड़ों को बढ़ाकर दिखाएगी. हालांकि दूसरी छमाही में इसका प्रभाव कम हो जाएगा.

2. कच्चे तेल के दाम-पिछले दो-तीन हफ्ते में कच्चे तेल के दाम लगभग 10 फीसदी गिर गए हैं. लेकिन अमेरिका के एनर्जी इनफॉरमेशन एडमिनिस्ट्रेशन ने हाल में जारी अपने अनुमान में कहा है कि ओपेक देशों द्वारा इसके उत्पादन में कटौती 2018 के अंत तक जारी रहने के चलते इसकी कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा ही रहेंगी. पिछले साल इसकी औसत कीमत 54 डॉलर रही थी. हाल की एक रिपोर्ट में तो यह दावा भी किया गया है कि इसकी कीमत इस साल 80 डॉलर के पार भी जा सकती है.

भारत तेल की जरूरत के लिए बहुत हद तक आयात पर निर्भर है. इसके चलते तेल के महंगा होने से व्यापार घाटा और चालू खाते का घाटा (आयात पर ज्यादा धन खर्च होने और निर्यात पर कम धन मिलने की स्थिति) भी बढ़ जाता है. इससे डॉलर की तुलना में रुपया कमजोर होने लगता है और दूसरी चीजों का आयात भी महंगा हो जाता है. इस वजह से देश में आयात की जाने वाली सभी चीजें महंगी हो जाती हैं. इस बार के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि केवल कच्चे तेल के 10 डॉलर महंगे हो जाने से महंगाई 0.3 फीसदी तक बढ़ जाती है. इसका मतलब यह हुआ कि इस साल केवल कच्चे तेल के चलते खुदरा महंगाई पर कम से कम 0.2 फीसदी का दबाव बने रहने की आशंका है.

3. राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में बदलाव - केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पिछले पखवाड़े बजट पेश करते हुए बताया कि 2017-18 और 2018-19 में पहले के तय लक्ष्य से ज्यादा राशि खर्च की जाएगी. इससे इन दोनों सालों में राजकोषीय घाटा (वह राशि जो सरकार के आय से ज्यादा खर्च होती है) पहले के लक्ष्य से 0.3 फीसदी ज्यादा रहेगा. अगले साल लोकसभा चुनाव होने के चलते राज्यों में भी ऐसा होने की संभावना है. इस चलते अगले कई तिमाहियों तक बाजार में मांग और महंगाई दोनों के बढ़ने का अंदेशा जताया जा रहा है.

4. एमएसपी की वृद्धि - केंद्रीय वित्त मंत्री ने बजट पेश करते हुए ऐलान किया कि अगले खरीफ सीजन में फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) उसकी लागत का 110 फीसदी के बजाय 150 फीसदी होगा. सरकार के इस फैसले से वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी छमाही में फसलों के दाम एक तिहाई से भी ज्यादा बढ़ जाएंगे. हालांकि माना जा रहा है कि एक दो महीने बाद ही फसलों की कीमत बढ़ना शुरू हो जाएगी.

5. इसी हफ्ते अमेरिका में भी जनवरी महीने के महंगाई का आंकड़ा जारी होने वाला है. जानकारों का मानना है कि यह पहले के अनुमान से ज्यादा रह सकती है. यदि ऐसा हुआ तो वहां का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में जल्द ही वृद्धि कर सकता है. इससे भारत से डॉलर की निकासी बढ़ जाएगी जिससे रुपये की तुलना में डॉलर का मजबूत होना तय है. ऐसी हालत में ​आयात पहले से ज्यादा महंगा हो सकता है जिससे अंतत: महंगाई को बढ़ावा मिल सकता है.

6. अन्य महत्वपूर्ण कारण-आने वाली गर्मी के दौरान महंगाई इस बात पर भी निर्भर करेगी कि अगले सीजन में मानसून का पूर्वानुमान कैसा रहेगा. वैसे 2017-18 के सीजन में खरीफ और रबी दोनों तरह की फसलों का उत्पादन एक साल पहले से थोड़ा कम रहने का अनुमान है. इसके अलावा एक जुलाई, 2017 से सातवें वेतन आयोग के तहत लंबित आवासीय और अन्य भत्ते देने के केंद्र के ऐलान का भी महंगाई पर असर पड़ने की आशंका है. आरबीआई ने भी सात फरवरी को मौद्रिक नीति की घोषणा करते वक्त इसके असर पर नजर रखने की बात कही है.