रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने बिहार के मुजफ्फरपुर में स्यवंसेवकों के एक कार्यक्रम को संबोधित किया था. इसमें उन्होंने दावा किया कि अगर देश को जरूरत हो तो संघ के कार्यकर्ता तीन दिन में मुस्तैद हो सकते हैं जबकि इसी काम में सेना को छह से सात महीने लगते हैं. जाहिर है कि इस बयान पर बवाल मचना था. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे हर भारतीय, तिरंगे, सैनिकों, शहीदों और सेना का अपमान बताते हुए मांग की कि संघ माफी मांगे. वहीं केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का कहना था कि इस बयान से साबित होता है कि संघ भारतीय संस्थानों का सम्मान नहीं करता और अपनी एक समानांतर फौज खड़ी करना चाहता है.

हालांकि सोमवार को संघ की तरफ से इस पर ‘स्पष्टीकरण’ आया है, फिर भी विरोधी नेता संगठन से माफी की मांग कर रहे हैं. यह गलत भी नहीं है कि अपने मुखिया के जबर्दस्ती के दावे की आंच संघ को सहनी पड़े. यह इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि इस संगठन को भाजपा की शक्ति का स्रोत माना जाता है और आज इसका राजनीति और सरकार के तमाम अंगों पर असर को भी स्वीकार किया जाता है. वैसे संघ मौके-बेमौके खुद को सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन बताकर इस तरह की जवाबदेहियों से बचता रहा है.

इस विवाद से जुड़ी एक यह बात भी सही है कि संघ को किसी भी तरह हाशिए पर पहुंचाने की मंशा रखने वाले लोग और भागवत के विरोधी उनके बयान का शब्दश: मतलब निकालकर आलोचना कर रहे हैं. देश को खतरा यह नहीं है कि बयान के मुताबिक स्वयंसेवक तुरंत ही अपने-अपने इलाकों-घरों से निकलकर सेना की मदद करने सीमा पर पहुंच जाएंगे, बल्कि यह बयान एक अलग मायने में चिंता पैदा करने वाला है. दरअसल मोहन भागवत की टिप्पणी राष्ट्रवाद की बहस को एक अलग दिशा की तरफ मोड़ने की कोशिश दिखती है. यहां तक कि इस मामले पर संघ का जो ‘स्पष्टीकरण’ आया है, उससे भी यही बात जाहिर होती है. इसमें कहा गया है कि इस बयान में भारतीय सेना और स्यवंसेवकों के बीच कतई तुलना नहीं की गई बल्कि आम समाज और स्वयंसेवकों की तुलना की गई थी.

बीते चार साल और उसके पहले से भी संघ और भाजपा तरह-तरह से राष्ट्रवाद की बहस को आम जनमानस के बीच चलाने की कोशिश करते रहे हैं. और हर बार राष्ट्रवाद की सबसे संकीर्ण परिभाषा को आगे बढ़ाने की कोशिश हुई है जहां लोगों को कुछ निश्चित प्रतीकों के माध्यम से ही अपनी राष्ट्रभक्ति साबित करनी होती है. जो लोग ऐसा नहीं करते वे इनके लिए देशभक्त नहीं हैं.

आज एक राष्ट्रवादी के लिए जरूरी है कि वह गाय को पूरा मान-सम्मान दे, सिर्फ अपने धर्म में शादी करे और उसे पाकिस्तान से नफरत हो. अब ऐसा लग रहा है कि एक राष्ट्रवादी को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, की इस सूची में एक बात और जोड़ने की कोशिश की जा रही है और वो यह कि एक राष्ट्रवादी को देश की सुरक्षा के लिए सीमा पर जाने को हमेशा तैयार रहना चाहिए. हो सकता है भागवत ने ‘भारतीय समाज’, जिसे कमजोर मान लिया गया है और युद्ध के लिए तैयार स्वयंसेवकों के बीच अंतर दिखाने के लिए यह बयान दिया है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसे टकराव वाले सैन्य राष्ट्रवाद पर पला-बढ़ा है. राष्ट्रवाद को लेकर इस संगठन का नजरिया हमेशा से यह रहा है कि समाज के बहु-सांस्कृतिक आयाम को खत्म करके उसे एक पहचान में तब्दील किया जाए. अगर संघ अपनी इस सोच को लेकर गंभीर है तो विरोधियों के लिए इस बड़ी चुनौती से निपटने के लिए गहराई से रास्ते तलाशने होंगे. वे सिर्फ प्रतीकात्मक जीतों जैसे किसी से माफी की मांग करने या उसे स्पष्टीकरण के लिए मजबूर करने के भरोसे नहीं रह सकते. (स्रोत)