क्रिकेट में एक शब्द होता है ‘रन-मशीन.’ जो बल्लेबाज धुआंधार रन बनाते हैं उनके लिए इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि इस वक़्त भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के लिए काफ़ी कुछ यही काम इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल टूर्नामेंट कर रहा है. वह रन के बजाय धुआंधार धन बना रहा है और साथ ही बीसीसीआई के लिए ‘धन-मशीन’ बन चुका है. दिलचस्प बात यह है कि 2008 में बोर्ड ने यही टूर्नामेंट अपने ‘साइड शो’ के तौर पर शुरू किया था.

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ बीसीसीआई को साल भर में जितना मुनाफा होता है उसका 95 फ़ीसदी हिस्सा आईपीएल से आता है. बीसीसीआई का अनुमान है कि आने वाले वित्तीय वर्ष में उसकी आमदनी में आईपीएल की हिस्सेदारी क़रीब 2,017 करोड़ रुपए हो जाएगी जबकि आईपीएल के अलावा अन्य घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों का हिस्सा महज़ 125 करोड़ रुपए के क़रीब ही रहेगा.

दूसरे अर्थों में कहें तो बीसीसीआई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों के विज्ञापन-प्रसारण-प्रायोजन अधिकार आदि से साल के 320 दिनों में जितना मुनाफा कमाता है उसका 16 गुना अधिक 45 दिनों में आईपीएल के मार्फ़त हासिल कर लेता है. फ़िलहाल बीसीसीआई का सालाना ख़र्च 1,272 करोड़ और आमदनी 3,413 करोड़ रु बताई जाती है. यानी उसे होने वाले मुनाफे की रकम साल भर में 2,141 करोड़ रु के आसपास बैठती है.