राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत का एक बयान सुर्खियों में है. 11 फ़रवरी को बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में एक कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कहा कि संघ के कार्यकर्ताओं का अनुशासन और क्षमता भारतीय सेना के सैनिकों के बराबर है. यह भी कि अगर देश को (युद्ध के समय) ज़रूरत पड़ी और संविधान इजाज़त दे तो संघ के कार्यकर्ता केवल तीन दिन में सैनिक बन कर तैयार हो सकते हैं.

मोहन भागवत के इस बयान को लेकर विवाद हो गया है. विपक्ष इसे लेकर हमलावर है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि मोहन भागवत ने भारतीय सेना और उसके शहीदों का अपमान किया है. सवाल किया जा रहा है कि क्या संघ ख़ुद को और अपने कार्यकर्ताओं को भारतीय सेना के बराबर मानता है.

मामला बिगड़ता देख संघ और उसके अन्य वैचारिक सहयोगियों को सफ़ाई देनी पड़ी है. उन्होंने कहा कि मोहन भागवत के बयान को ग़लत तरीक़े से पेश किया गया है. उनके मुताबिक भागवत के बयान का मतलब यह नहीं था कि सेना को युद्ध के लिए तैयार होने में छह-सात महीने लगेंगे, बल्कि यह था कि समाज को युद्ध के लिए तैयार करने में सेना को छह से सात महीने लगेंगे, जबकि संघ के स्वयंसेवकों को केवल तीन दिन में युद्ध के लिए तैयार किया जा सकता है क्योंकि वे (सेना जैसे) अनुशासन से जीवन जीते हैं. संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ मनमोहन वैद्य का कहना था, ‘मोहन भागवत जी के वक्तव्य को ग़लत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है. यह सेना के साथ तुलना नहीं थी बल्कि ये सामान्य समाज और स्वयंसेवकों के बीच में तुलना थी. दोनों को भारतीय सेना को ही तैयार करना होगा.’

लेकिन सवाल इस सफाई के बाद भी उठ रहे हैं. मसलन पूछा जा रहा है कि क्या संघ अपने कार्यकर्ताओं की क्षमता को सामान्य जन की क्षमता से ज़्यादा समझता है. यह भी कि क्या वह भारतीय समाज को कमज़ोर मानता है. जानकारों के एक वर्ग के मुताबिक भारतीय प्रादेशिक सेना (या टेरिटोरियल आर्मी) में दो लाख जवान इसी ‘सामान्य’ भारतीय समाज से हैं और संघ यह दावा नहीं कर सकता कि वे सभी संघ के कार्यकर्ता हैं. सामान्य जन से निकले ये सभी सैनिक देश की पहली पंक्ति की सेना की तरह नियमित रूप से तैनाती पर नहीं रहते, लेकिन जब भी सेना का बुलावा आता है तो अपना परिवार, पेशा, रोज़गार छोड़ कर देश की रक्षा में योगदान करते हैं. वे मुख्य सेना के जवानों को आराम करने का मौक़ा देते हैं और किसी भी त्रासदी की स्थिति में राहत और बचाव कार्य का काम करते हैं, बिलकुल सेना की तरह.

इतिहास बताता है कि दूसरी पंक्ति के सैनिक के रूप में टेरिटोरियल आर्मी के इन्हीं जवानों ने 1962, 1965 और 1971 के युद्धों में अपनी सैन्य क्षमता का परिचय देते हुए लड़ाइयां लड़ी हैं, शहादत दी है और मेडल भी जीते हैं. सामान्य समाज से आने वाले टेरिटोरियल आर्मी के ये जवान आतंकी हमलों और पाकिस्तानी की तरफ़ से होने वाली गोलीबारी का भी शिकार होते हैं. अब तो देश की टेरिटोरियल आर्मी के जवान देश के लिए शहादत देने के बाद अपने शरीर के अंग भी दान करना चाहते हैं. हाल में टेरिटोरियल आर्मी की यूनिट टीए 123 इन्फ़ैन्ट्री बटालियन के जवानों ने इस बारे में इच्छा ज़ाहिर की थी.

सैन्य क्षमता है तो स्वयंसेवक टेरिटोरियल आर्मी में क्यों नहीं आते?

इन्हीं तथ्यों का हवाला देकर कई कह रहे हैं कि अगर आरएसएस के स्वयंसेवकों में सैन्य क्षमता है तो संगठन उन कार्यकर्ताओं को टेरिटोरियल आर्मी में क्यों नहीं भेजता. वे संघ के लिए काम करते हुए देश की रक्षा कर सकते हैं. उन्हें केवल तभी बुलाया जाएगा जब उनकी ज़रूरत होगी और बाक़ी सारा जीवन वे संघ को अपनी सेवाएं देते रह सकते हैं. इन लोगों का यह भी कहना है कि इस तरह उनके दोनों उद्देश्य पूरे हो जाएंगे. आख़िर देश में दो थल सेनाएं तो हो नहीं सकतीं!

पिछले साल टेरिटोरियल आर्मी ने नई भर्तियों के लिए नोटिफ़िकेशन जारी किया था. भारत में रहने वाला कोई भी पुरुष नागरिक सैनिक बनने के लिए आवेदन कर सकता है. उसकी उम्र 18 से 42 वर्ष के बीच होनी चाहिए, वह किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक हो और मेडिकली फिट हो. टेरिटोरियल आर्मी का हिस्सा होते हुए देश की रक्षा करना एक स्वैच्छिक अंशकालिक नागरिक सेवा है. चूंकि यह पूर्णकालिक नौकरी नहीं है इसलिए अप्लाई करने वाला व्यक्ति पहले से नौकरीपेशा भी होना चाहिए. एक वर्ग का कहना है कि संघ के सभी शिक्षित, स्वस्थ, युवा और रोज़गार-प्राप्त कार्यकर्ता अगले मौक़े का फ़ायदा उठा सकते हैं.

युद्ध की औपचारिकता की प्रतीक्षा क्यों?

साफ़ है कि देश में आम नागरिकों और आरएसएस के सैन्य क्षमता वाले कार्यकर्ताओं को सैनिक बनने का अवसर दिए जाने की व्यवस्था है. लेकिन मोहन भागवत कहते हैं कि जब देश को ज़रूरत होगी तब संघ अपने लोगों को सैनिक के रूप में भेज सकता है. जानकार और आलोचक भागवत के इस बयान को अजीब बताते हैं. उनका कहना है कि भारतीय सैनिक तो रोज़ युद्ध जैसे हालात में ही काम कर रहे हैं. वे कह रहे हैं कि पाकिस्तान की तरफ़ से आए दिन सीमा पर गोलाबारी की जाती है जिसमें हमारे सैनिक शहीद होते हैं, चीनी सैनिकों की घुसपैठ भी समस्या बनी हुई है, आतंकवादी और नक्सलवादी संगठनों द्वारा सुरक्षाबलों पर जानलेवा हमले किए जाने जैसी समस्याएं अभी भी मज़बूती से बनी हुई हैं, इसके बावजूद संघ प्रमुख और कार्यकर्ताओं ने कभी सेना में भर्ती होने की बड़ी सामूहिक पहल नहीं की. वे सवाल करते हैं कि मोहन भागवत और आरएसएस युद्धघोष की औपचारिकता का इंतज़ार क्यों कर रहे हैं जो किसी लोकतंत्र में एक दुर्लभ घटना है और जिससे सरकारें अमूमन बचती ही हैं.

वहीं, राजनीतिक जानकारों के मुताबिक मोहन भागवत के बयान पर कम से कम भाजपा राजनीतिक रूप से फंस गई है. पहले संघ प्रमुख पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को भारतीय सैनिकों के बराबर बता दिया, और बाद में उनके लोगों ने सफ़ाई देते हुए आम लोगों की संघ कार्यकर्ताओं से तुलना करते हुए उन्हें कमतर बता दिया. इसे लेकर जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से सवाल किया गया तो उन्होंने यह कहते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है और उन्होंने इस बारे में फ़ोन पर केवल मैसेज देखा है. अमित शाह से यह सवाल तब किया गया जब वे त्रिपुरा चुनाव को लेकर प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर रहे थे. साफ है कि भाजपा इस मुद्दे पर कुछ भी टिप्पणी करने में खुद को असहज पा रही है.