जयपुर की चारदीवारी में जीवन कुछ उसी तरह का है जैसा रियासतकाल के शहरों का होता है. तंग गलियां, खास दुकानें, ठसाठसी, रेलमपेल और गाड़ियों की चिल्लपों. कहीं मंदिरों की घंटियों की आवाजें तो कहीं अज़ान की आवाज़. पर एक बात जो इस शहर को बाकियों से अलहदा करती है वह है इसके मोहल्ले और रास्तों के नाम, जो उनमें रहने वालों की कारीगरी से जुड़े हुए हैं. जैसे ‘हल्दियों का रास्ता’, ‘ठठेरों का रास्ता’, ‘चांदी की टकसाल’, ‘घी वालों का रास्ता’, ‘खज़ानेवालों का रास्ता’. इन्हीं में से एक है ‘पन्नीगरों का मोहल्ला’.

आज पन्नीगरों के मोहल्ले में ख़ामोशी है. ‘औज़ार’ शांत और गलियां सूनी हैं. पूछने पर मालूम होता कि यहां बसने वाले घरों में किसी एक में कोई ग़मी हो गयी है. सब मातम मना रहे हैं. ‘जनाब, ये रिवायत है जो कई सालों से चली आ रही है. यहां ख़ुशी और मातम सब एक साथ ही मनाते हैं’, हमारे पूछने पर कोई कहता है. तभी एक और आवाज आती है, ‘ख़ाक डालो ऐसी रिवायत पर. आज दिन भर की मज़दूरी मारी गयी.’

ज़्यादातर पन्नीगर मुसलमान कारीगर हैं, जो चांदी के वर्क का काम करते हैं. लेकिन बीते कुछ समय से वे परेशान हैं. वजह यह है कि चांदी की वर्कसाज़ी का काम विवादों में घिरा हुआ है. यह वही वर्क है जिसको मिठाइयों, पान, सुपारी और बिरयानी जैसी खाने की चीज़ों में मिलाया जाता है. विवाद इसको बनाने के तरीके और इस्तेमाल में लायी गयी चीज़ों को लेकर है.

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दरअसल, कुछ साल पहले जयपुर के एक व्यवसायी सुरेन्द्र कर्नावट ने वर्क बनाने के तरीके पर सवाल उठाया था. उनका कहना था कि चांदी को जानवरों की खाल से बनाई गयी थैली के बीच में रखकर पीटा जाता है. उनका मानना है कि इस वर्क के लगने के बाद मिठाइयां और खाने की चीज़ें शाकाहारी नहीं रह जातीं. इसके बाद मेनका गांधी ने भी यह बात कही और यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया. फिर दिल्ली की ‘आप’ सरकार ने इसके निर्माण के पारंपरिक तरीके पर प्रतिबंध लगा दिया. यह दो साल पहले की बात है. वर्कसाज़ों की संस्था ने इसके ख़िलाफ़ दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील की. अदालत ने सरकार के बैन पर रोक लगा दी. अब पिछले महीने उसने यह रोक हटा ली है. यानी, फ़िलहाल वर्कसाज़ी बंद है.

हम इस विवाद पर पन्नीगरों की राय जानने के लिए उनके मोहल्ले में हैं. ज्यादातर कारीगरों में निराशा है. याकूब नाम के एक कारीगर कहते हैं, ‘साहब, इस काम को हमारी कई पुश्तें करती आ रही हैं. जब राजा साहब सवाई जय सिंह दूसरे ने जयपुर बसाया था तो हमें आगरा से यहां बुलाया गया था. हम पहले सांगानेर (जयपुर के बाहर का शहर) रहे फिर हमें यहां ज़मीन देकर बसाया गया. अगर वर्क लगने के बाद मिठाइयां मांसाहारी हो जातीं तो बरसों से लोग मिठाई और बाकी चीज़ें खा रहे होते?’

लेकिन सुरेन्द्र कर्नावट ऐसा नहीं मानते. सत्याग्रह से बातचीत में वे बताते हैं कि चांदी को जिस थैली में रखकर पीटा जाता है उसे जानवरों की अंतड़ियों की खाल से बनाया जाता है और इसके लिए जानवरों को ख़ास तौर पर मारा जाता है. वे कहते हैं, ‘ताज़ा अंतड़ियों से बनी इस जुगत के ऊपर एक ख़ास प्रकार के केमिकल का लैप किया जाता है जिससे वो खाल एकसार हो जाती है. कभी-कभी ये केमिकल सोप पाउडर भी होता है.’ वे आगे जोड़ते हैं कि इस तरीके से बनने वाला वर्क स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है.’

उधर, वर्कसाजों का कहना है कि अब कारीगर जापानी पेपर या जर्मन प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हैं इसलिए यह बहस बेकार की है. सालों से यह काम कर रहे मोहसिन कहते हैं, ‘अगर कहीं जानवर की खाल इस्तेमाल में आ भी रही है तो वह अब मृत है, इससे शरीर को क्या नुकसान हो सकता है.’ कारीगरों का कहना है कि इन बेवजह की बातों से उनके व्यवसाय को काफी नुकसान हुआ है और अब यह बंद होने की कगार पर आ चुका है.

याकूब के मुताबिक जयपुर में लगभग 3000 घर सिर्फ़ इसी पुश्तैनी कारीगरी के सहारे चल रहे हैं और उन्हें कोई दूसरा काम नहीं आता. वे कहते हैं, ‘जैसे तैसे करके एक पन्नीगर दिनभर चांदी के एक छोटे से टुकड़े को पीट कर बनाये गए वर्क से बमुश्किल सौ या डेढ़ सौ रुपये कमाता है. अब अगर ये काम भी उनसे छीन लिया जाएगा तो वो क्या करेंगे?’

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उधर, सुरेन्द्र कर्नावट वर्क बनाने की प्रक्रिया को मशीन से करना चाहते हैं. वे बताते हैं कि उन्होंने ऐसी मशीन और कागज़ तैयार किया है जिससे जानवरों की खाल और कैमिकल के इस्तेमाल से बचा जा सकता है. उनका कहना है कि मशीन की मदद से काम जल्दी और ज़्यादा हो सकेगा. सुरेंद्र कर्नावट के मुताबिक उन्होंने केंद्र और राजस्थान सरकार के कई अधिकारियों और नेताओं से मिलकर इस पर चर्चा भी की है पर उन्हें कोई मुकम्मल जवाब नहीं मिला.

वर्कसाज़ी लगभग एक हज़ार साल पुरानी कारीगरी है. जयपुर के अलावा यह हैदराबाद, वाराणसी और दिल्ली में भी बड़े स्तर पर की जाती है. चांदी और सोने के वर्क का इस्तेमाल हिंदुस्तान के अलावा जापान, दक्षिण एशिया और अन्य देशों में काफी किया जाता है. बौद्ध धर्म मानने वाले देशों में यह वर्क बुद्ध की प्रतिमाओं पर लगाया जाता है. जानकारों के मुताबिक संभव है कि इसी से प्रेरणा लेकर हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों पर इसे लगाया जाता हो. एक पन्नीगर कहता है, ‘तब तो इसे मांसाहारी नहीं कहा गया था. फिर आज क्यों इतनी बहस हो रही है?’

सुरेन्द्र कर्नावट इस व्यवसाय में निर्यात की अच्छी संभावनाएं देखते हैं. उनके मुताबिक़ इस काम में देश में हर साल 300 टन चांदी की खपत होती है और अगर वर्कसाज़ी का काम तय मानकों से किया जाए तो इसका निर्यात भी किया जा सकता है. पन्नीगरों के रोज़गार ख़त्म होने की बात को नकारते हुए कर्नावट कहते हैं कि मशीनें अगर लगाई जाती हैं तो बड़ी तादाद में लोगों को रोज़गार मिलेगा. वे इसमें महिलाओं की भागीदारी की बात भी कहते हैं. उनके शब्दों में ‘यह काम बड़ी बारीकी का है इसलिए इसमें मुलायम हाथ बड़े कारगर रहते हैं.’

चांदी और सोने के वर्क के और भी इस्तेमाल हैं. आयुर्वेद और यूनानी दवाइयों के अलावा ये नक्काशी, मीनाकारी और फ़र्नीचर बनाने में भी काम आते हैं. कारीगरों का मानना है कि उनके वर्क बनाने के तरीके पर सवाल उठाकर कुछ लोगों ने अपने फ़ायदे के लिए उन्हें नुकसान पहुंचाया है.

दिल्ली हाई कोर्ट निर्णय के बाद वर्कसाजों ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के सामने गुहार लगाने का मन बनाया है. उनका कहना है कि वे पारपंरिक तरीके से बनने वाले वर्क को शाकाहारी और स्वास्थ्य को नुकसान न पहुंचाने वाला साबित करेंगे. बहरहाल, आगे जो भी हो, फिलहाल तो वर्कसाज़ी और उसके कारीगरों पर संकट के बादल हैं.