नगालैंड में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है. लेकिन चुनाव हो पाएंगे या नहीं इस पर आशंका है. इस बीच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने मुख्यमंत्री टीआर ज़ेलियांग के दफ़्तर के दो कर्मचारियों को समन भेजा है. उनसे आतंकी/उग्रवादी गतिविधियों के लिए वित्तीय मदद के मामले में पूछताछ होनी है. हालांकि एनआईए की इस कार्रवाई को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जेलियांग सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है.

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ जिस मामले में मुख्यमंत्री के दफ़्तर के कर्मचारियों से पूछताछ होनी है वह नगालैंड के 14 सरकार विभागों से कथित तौर पर की गई अवैध वसूली से जुड़ा है. यह वसूली एनएससीएन (के), एनएससीएन (एम) और नगा नेशनल काउंसिल जैसे उग्रवादी संगठनों ने की थी. माना जा रहा है कि इस काम में उनकी मदद ज़ेलियांग के दफ़्तर के कर्मचारियों ने भी की थी.

हालांकि ठीक चुनाव के वक़्त एनआईए की इस कार्रवाई को राजनीतिक पृष्ठभूमि से जोड़कर भी देखा जा रहा है. क्योंकि इन नगा संगठनों ने विधानसभा चुनाव के बहिष्कार का आह्वान किया है. उनकी मांग है कि जब तक केंद्र सरकार नगा शांति समझौते को अंतिम रूप नहीं दे देती, इस पर सभी पक्ष दस्तख़त नहीं कर देते, चुनाव में कोई भाग न ले. कहा जा रहा है कि इसे ज़ेलियांग सरकार का भी समर्थन है.

वैसे यहीं एक दिलचस्प बात ये भी है कि टीआर ज़ेलियांग जिस नगालैंड पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ़) के नेता हैं उसका बीते 15 साल से भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन है. भाजपा के दो मंत्री तो अब तक ज़ेलियांग सरकार में मंत्री हैं. मगर बताया जाता है कि भाजपा की नज़दीकी राज्य की एनपीएफ़ सरकार के पूर्व मुखिया नेफ़ियू रियो से है न कि ज़ेलियांग से. एनपीएफ़ में ये दोनों विरोधी गुटों के नेता हैं.

रियो 2014 में लोक सभा चुनाव जीतकर सांसद बन गए थे. इसके बाद ज़ेलियांग ने मुख्यमंत्री पद संभाला था. लेकिन बताते हैं कि उसके बाद से दोनों नेता आमने-सामने हैं. इनके बीच अदावत अब इतनी बढ़ गई है कि रियो ने एनपीएफ़ से अलग नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) बना ली है. भाजपा रियो की एनडीपीपी के साथ हो गई है. और दोनों दल क्रमश: 40-20 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं.