संविधान में भारतीय गणराज्य के ‘शीर्ष’ यानी राष्ट्रपति के बारे में स्पष्ट है कि वे प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल (मतलब केंद्र सरकार) की ‘सलाह पर’ काम करेंगे. लेकिन ताजा मामले को देखें तो मौज़ूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के मामले में ऐसा नहीं होता दिखता. अपनी तरह के शायद इस पहले मामले से यह संकेत निकलता दिख रहा है कि केंद्र सरकार उन्हें ‘सलाह के बजाय निर्देश’ देने लगी है. विश्वभारती यूनिवर्सिटी के कुलपति की नियुक्ति का मामला इसकी मिसाल है.

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में स्थित विश्वभारती यूनिवर्सिटी (इसे गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ने स्थापित किया था) के कुलपति की नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति को पिछले साल एक पैनल भेजा. इसमें यूनिवर्सिटी के तत्कालीन कार्यकारी कुलपति स्वपन कुमार दत्ता का नाम था. साथ ही, इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडी के कृषि वैज्ञानिक पीएन मिश्रा और आईआईटी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) खड़गपुर के जियोफ़िजिक्स एंड जियोलॉज़ी विभाग के शंकर कुमार नाथ के नाम भी थे.

सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रपति कोविंद ने इन तीन में से दत्ता के नाम पर सहमति दे दी. लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने तब तक अपना विचार बदल लिया. लिहाज़ा उसने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कहा कि वे दत्ता के नाम अपनी सहमति पर दोबारा विचार करें. यही नहीं मंत्रालय ने वह पैनल भी भंग कर दिया जिससे राष्ट्रपति ने दत्ता को चुना था. बताया जाता है कि अब नया पैनल बनाने की तैयारी की जा रही है.

सूत्रों की मानें तो यह पहला मौका है जब राष्ट्रपति से किसी की नियुक्ति को हरी झंडी मिलने के बाद सरकार ने उनसे ही इस पर पुनर्विचार के लिए कहा हो और उनकी ओर से अनुमोदित नाम वाला पैनल भंग कर दिया हो. इस बाबत अख़बार ने जब मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से प्रतिक्रिया लेनी चाही तो वे उपलब्ध नहीं हुए. उच्च शिक्षा सचिव केके शर्मा और अतिरिक्त सचिव सुखबीर सिंह संधू ने इस बाबत उन्हें भेजे गए संदेशों का कोई ज़वाब नहीं दिया. राष्ट्रपति के प्रेस सचिव अशोक मलिक ने कोई भी टिप्पणी करने से साफ़ मना कर दिया.