बीते मंगलवार को पाकिस्तान ने भारत सहित वैश्विक बिरादरी को चौंकाते हुए हाफिज सईद के संगठन जमात-उद-दावा (जेयूडी) और फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन (एफआईएफ) पर प्रतिबंध लगा दिया है. हालांकि, पिछले 15 सालों में चार बार जमात-उद-दावा के खिलाफ कार्रवाई हो चुकी है, लेकिन इस बार मामला अलग है क्योंकि पाकिस्तान ने अब एक अध्यादेश के जरिए आतंकरोधी कानून (एटीए) में बदलाव कर सईद के संगठनों पर प्रतिबंध लगाया है.

इस अध्यादेश में कहा गया है कि सरकार पाकिस्तान में स्थित उन व्यक्तियों और संगठनों के कार्यालयों और बैंक खातों को सील करेगी जिन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 के तहत प्रतिबंधित किया गया है. इस अध्यादेश पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद बुधवार को जेयूडी और एफआईएफ से जुड़े कई मदरसों और डिस्पेंसरियों को सील कर दिया गया. हाफिज के ये दोनों ही संगठन लश्कर-ए-तैयबा के मुखौटा संगठन माने जाते हैं जो समाजसेवा की आड़ में आतंकियों की फंडिंग करते हैं.

पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन के मुताबिक सरकार के इस फैसले के पीछे मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) का दबाव है. दुनियाभर में वित्तीय मामलों की निगरानी करने वाली एफएटीएफ दुनिया के दिग्गज देशों द्वारा बनाई गई एक संस्था है जो संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के साथ मिलकर काम करती है. यह संस्था वैश्विक स्तर पर बैंकों के लिए मानक निर्धारित करती है. साथ ही अलग-अलग देशों द्वारा आतंकियों की फंडिंग और मनी लॉन्डरिंग रोकने के लिए उठाये गए कदमों की समीक्षा भी करती है.

एफएटीएफ की अगली बैठक आज से पेरिस में होने वाली है जिसमें आतंकियों की फंडिंग और मनी लॉन्डरिंग रोकने के मामले में कमजोर प्रदर्शन के चलते पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट’ में डाले जाने का खतरा मंडरा रहा है. संस्था की इस सूची में आने वाले देश वित्तीय मामलों को लेकर दुनिया में अलग-थलग पड़ जाते हैं. इन देशों को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन में कड़ी जांच से गुजरना पड़ता है, साथ ही इनके लिए विदेशी निवेश और कर्ज लेने में भी मुश्किलें बढ़ जाती हैं. इस समय ईरान, इराक, युगांडा और उत्तर कोरिया जैसे देश इसमें शामिल हैं. पाकिस्तान भी 2012 से लेकर 2015 तक यानी तीन साल इस सूची में रह चुका है. 2015 में चीन की मदद से वह इससे बाहर निकला था.

पाकिस्तान पर एक बार फिर एफएटीएफ की टेढ़ी नजर है और माना जा रहा है कि इसके पीछे भारत का दबाव भी काम कर रहा है. दरअसल, बीते नवंबर में अर्जेंटीना में हुई एफएटीएफ की बैठक में पाकिस्तान को आतंकी संगठनों पर कड़ी कार्रवाई करने के लिए अंतिम चेतावनी दी गयी थी. इस बैठक में अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी ने पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट’ में डाले जाने का प्रस्ताव रखा था. इन देशों का कहना था कि पाकिस्तान ने अभी तक आतंकी फंडिग रोकने के लिए कोई कानून नहीं बनाया है इसलिए उस पर लगाम कसना जरूरी हो गया है. इसके बाद एफएटीएफ ने पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट’ से बचने के लिए तीन महीने का समय दिया. पाकिस्तान से कहा गया था कि वह फरवरी 2018 से पहले अपने यहां स्थित आतंकी संगठनों पर कानूनी कार्रवाई करे और इससे संबंधित रिपोर्ट अगली बैठक में पेश करे.

इस बैठक में एफएटीएफ के इस रुख का चीन ने जबर्दस्त विरोध किया था. उसने पाकिस्तान को लेकर बनी इस स्थिति को टालने की भी भरपूर कोशिश की, लेकिन 37 सदस्य देशों वाली इस संस्था में किसी अन्य देश ने उसका साथ नहीं दिया. एफएटीएफ में किसी कार्रवाई को रोकने के लिए कम से कम तीन सदस्य देशों का समर्थन हासिल करना जरूरी होता है, लेकिन चीन यह समर्थन भी नहीं जुटा पाया और उसकी मांग को सिरे से नकार दिया गया. उस समय पाकिस्तान और चीन दोनों ही एफएटीएफ के ऐसे रुख को लेकर सकते में थे क्योंकि उन्हें ऐसी स्थिति बन जाने का बिलकुल भी अंदाजा नहीं था.

यह भारत की जबर्दस्त कूटनीति ही थी कि इस बैठक में 36 सदस्य देश पाकिस्तान के खिलाफ गए और इसी के नतीजे में अब हाफिज सईद के संगठनों पर पाबंदी लगी है.

हालांकि, इस बैठक में चीन और पाकिस्तान की हैरानी के पीछे की एक वजह यह भी थी कि एफएटीएफ की एशिया मामलों को देखने वाली संस्था एपीजी की कुछ महीने पहले हुई बैठक में चीन ने आतंकी फंडिंग को लेकर कई देशों के कड़े विरोध के बाद भी पाकिस्तान को कार्रवाई से बचा लिया था. तब चीन को ठीक-ठाक समर्थन भी मिल गया था.

एफएटीएफ के प्रतिनिधिमंडल का पाकिस्तान दौरा

इस घटनाक्रम के बाद जनवरी में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी ने हाफिज सईद के संगठन जेयूडी और एफआईएफ को चंदा देने पर रोक लगा दी थी. लेकिन, पिछले महीने एफएटीएफ के एक प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान का दौरा किया और पाक सरकार के इन प्रयासों को नाकाफी बताया. प्रतिनिधिमंडल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तान को लेकर भारत और अमेरिका के वे दावे सही हैं जिनमें कहा गया है कि पाकिस्तान ने आतंकी संगठनों के खिलाफ केवल कागजों पर कार्रवाई की है. एफएटीएफ के प्रतिनिधिमंडल का यह भी कहना था कि पाकिस्तान में आतंकियों को मिलने वाली वित्तीय मदद और मनी लॉन्डरिंग के मामले इसलिए नहीं रुक रहे हैं क्योंकि वह इसके खिलाफ कोई सख्त कानून नहीं बना पा रहा है.

पेरिस में होने वाली एफएटीएफ की बैठक से पहले अपने खिलाफ बन रहे माहौल को देखते हुए पाकिस्तान ने न केवल सईद के संगठनों पर बड़ी कार्रवाई की है बल्कि उसने अन्य उपाय करने भी शुरू कर दिए हैं. हाल ही में उसने एफएटीएफ के सदस्य देश रूस, सऊदी अरब और तुर्की से पेरिस मीटिंग में उसका समर्थन करने की भी गुजारिश की है. एक फरवरी को रूस के दौरे पर गए पाक विदेश मंत्रालय के विशेष सचिव तसलीम असलम ने रूसी उपविदेश मंत्री ओलेग सिरोमोलोतोव के सामने यह मुद्दा उठाया था. हालांकि, इन देशों को वह अपने पक्ष में लामबंद करने में कितना सफल हुआ है इसका पता अगले मंगलवार को लग जाएगा जब एफएटीएफ की पेरिस में होने वाली तीन दिवसीय बैठक खत्म होगी.