स्वच्छ भारत अभियान के तहत पूरे देश में शहरी-ग्रामीण इलाकों को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने की होड़ लगी हुई है. और कहीं इस होड़ का आलम यह है कि असलियत में हों या न हों, पर कई इलाके कागज़ों पर तो खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ़) होते ही जा रहे हैं. छत्तीसगढ़ के तमाम नक्सल प्रभावित इलाके इसकी मिसाल हैं.

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ छत्तीसगढ़ के बीजापुर, सुकमा, कोंडागांव और दंतेवाड़ा जैसे नक्सल प्रभावित जिले ओडीएफ़ घोषित हो चुके हैं. इसके बाद इसी साल चार जनवरी को भारत सरकार के पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के सचिव परम अय्यर ने ट्विटर पर बीजापुर के साथ सुकमा जिले को बधाई दी. दिसंबर में वे दंतेवाड़ा और कोंडागांव को भी उनकी इस उपलब्धि के लिए बधाई दे चुके हैं.

लेकिन दिलचस्प है कि ये जिले सिर्फ़ कागजों पर ओडीएफ़ से मुक्त हुए हैं. क्योंकि अख़बार ने सरकारी आंकड़ों के हवाले से बताया है कि बीजापुर की 169 ग्राम पंचायतों में से 84 तो ऐसी हैं जहां तक सरकारी मशीनरी की सामान्य पहुंच ही संभव नहीं है. इसके बाद जो बच गए हैं उन्हें ओडीएफ़ घोषित किया गया है. ऐसे ही सुकमा के 146 में से 49, दंतेवाड़ा के 83 में 30 और कोंडागांव के 99 में से 15 गांवों तक पहुंच संभव नहीं है.

बीजापुर के कलेक्टर अयाज़ तंबोली तो मानते भी हैं कि जिले को भले ओडीएफ़ घोषित कर दिया गया हो, लेकिन कई गांव ऐसे हैं जहां शौचालय बनाना संभव नहीं है. अखबार से बातचीत में वे कहते हैं, ‘हम 85 ग्राम पंचायतों तक पहुंच पाए हैं. लेकिन नक्सलियों के असर के चलते बाकी जगहों पर योजना का क्रियान्वयन काफी मुश्किल है.’