फुर्सत के क्षणों में एक बार लाल बहादुर शास्त्री से मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर ने पूछा था कि उनके बाद कौन प्रधानमंत्री होगा. शास्त्री कुछ देर सोचने के बाद बोले, ‘अगर मैं एक या दो साल में मर गया तो इंदिरा गांधी और अगर तीन या चार साल बाद मेरी मृत्यु हुई तो वाईबी चव्हाण.’ कुछ समय बाद ताशकंद में शास्त्री चल बसे. कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज के सामने एक बार फिर प्रधानमंत्री चुनने की ज़िम्मेदारी आन पड़ी. देश को अगला नेता चाहिए था. विकल्प कई थे.

गुलजारी लाल नंदा

लाल बहादुर शास्त्री की असमय मृत्यु के बाद वे दूसरी बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री चुने गए थे. नंदा मज़दूरों से जुड़े मुद्दों के बड़े जानकर थे. आज़ादी से कुछ साल पहले बनी अंतरिम सरकार में वे श्रम मंत्री रहे. लेकिन कामराज की नज़र में नंदा क़ाबिल नेता नहीं थे.

मोरारजी देसाई

मोरारजी देसाई एक तेज़तर्रार राष्ट्रवादी नेता थे जो नेहरू सरकार में गृह मंत्री रह चुके थे. एक मायने में वे इस पद के सबसे प्रबल दावेदार भी थे. जवाहर लाल नेहरू के बाद उन्होंने अपनी दावेदारी पेश भी की थी. पर तब शास्त्री सर्वसम्मति से चुने गए.

मोरारजी देसाई अपनी बेबाक़ी और साफ़गोई के लिए जाने जाते थे. 50 के दशक में चीन के साथ सीमा पर विवाद शुरू हो चुका था और तिब्बती धार्मिक गुरु दलाई लामा ने हिंदुस्तान में शरण में ले थी. उन्हीं दिनों चीनी नेता चाऊ-एन-लाई भारत आये. जहां सारे भारतीय नेता चाऊ-एन-लाई से सीमा विवाद पर मान-मनुहार करते दिख रहे थे, वहीं मोरारजी आक्रामक थे. बताते हैं कि जब चीनी नेता ने उनसे पूछा कि कैसे भारत सरकार अपनी ज़मीन पर चीन विरोधी आंदोलन होने दे सकती है तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया, ‘इस देश में कोई भी विरोध कर सकता है. हिंदुस्तानी अपनी सरकार के ख़िलाफ़ विरोध करते हैं. विदेशी, उनका आशय अल्जीरिया से था, भी यहां आकार अपनी सरकार के ख़िलाफ़ मीटिंग कर सकते हैं.’

मोरारजी यहीं नहीं रुके. चाऊ-एन-लाई को संबोधित करके वे आगे बोले, ‘आप भूल गए कि मार्क्सवादी नेता लेनिन ने पूंजीवादी इंग्लैंड में जाकर शरण ली थी. ब्रिटिश सरकार ने उन पर पाबंदी नहीं लगाई थी.’ हालांकि इस कथन में थोड़ी सी त्रुटि है. लेनिन ने नहीं, कार्ल मार्क्स ने इंग्लैंड में शरण ली थी. लेकिन मोरारजी का रुख साफ था कि भारत की जमीन से तिब्बती शांतिपूर्ण तरीके से चीन के खिलाफ विरोध कर सकते हैं. खैर, बात पर वापस आते हैं. तो प्रखर मोरारजी देसाई ने दोबारा प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी ठोक दी थी.

के कामराज, जिन्होंने कभी खुद को प्रबल दावेदार नहीं माना

जानकारों के मुताबिक जवाहर लाल नेहरू की मौत के बाद अन्य वरिष्ठ कांग्रेसियों का मत था कि देश को अब ‘सिंडिकेट’ चलाये. यह कांग्रेसी नेताओं का समूह था. इसके लिए उन्हें ऐसा नेता चाहिए था जो उनकी ‘हां’ में ‘हां’ मिलाए. सिंडिकेट को शास्त्री ऐसे नेता लगे. पर डेढ़ साल के कार्यकाल में उन्होंने दिखा दिया था कि वे नेहरू के असल उत्तराधिकारी हैं. कुछ कांग्रेसियों ने अध्यक्ष कामराज का मन भी टटोला. पता चला कि मंशा तो उनकी भी थी. पर समस्या इस बात की थी कि उनका जनाधार दक्षिण तक ही सिमटा हुआ था. और फिर वे ख़ुद मानते थे कि उन्हें हिंदी और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान न होना उनकी राह में एक रोड़ा था. सो वे तीसरे दावेदार होते हुए भी अखाड़े में नहीं उतरे.

इंदिरा गांधी

शास्त्री मंत्रिमंडल में इंदिरा गांधी की कोई अहम् भूमिका नहीं थी. एक वर्ग के मुताबिक लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें विदेश मंत्रालय इसलिए नहीं दिया था कि वे प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखती थीं. शास्त्री उनके सामने हिचकते भी थे. नेहरू की मौत के बाद इंदिरा ने तीन मूर्ति भवन शास्त्री का प्रधानमंत्री आवास नहीं बनने दिया था. शास्त्री ने भी उन्हें सूचना और प्रसारण मंत्रालय देकर कन्नी काट ली थी.

अपनी जीवनी ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में कुलदीप नैयर लिखते हैं कि इंदिरा को उस समय बड़ी कोफ़्त हुई जब उन्होंने पाया कि उनके मंत्रालय ने नए साल के कैलेंडर में शास्त्री के कन्धे पर हाथ रखे नेहरू की तस्वीर जारी की है. ज़ाहिर है कि वे शास्त्री को नेहरू का उतराधिकारी नहीं बनने देना चाहती थीं.

इंदिरा तब 48 साल की थीं. थोड़ी ग़ैर तजुर्बेकार थीं. पर उन्होंने सत्ता को बहुत नज़दीक से देखा था सो उसके हर पहलू से वे वाक़िफ़ थीं. नेहरू ने उनकी परवरिश भी कुछ ऐसे अंदाज़ में की थी कि मानो आगे चलकर उन्हें ही देश की कमान संभालनी है. इंदिरा ऐसा मानती भी थीं.

ख़ैर, चार में से दो की दावेदारी अपने आप ही ख़त्म हो गयी. अब बचे थे मोरारजी देसाई और इंदिरा गांधी. कामराज के न करने के बाद, ‘सिंडिकेट’ इंदिरा के पक्ष में आ खड़ा हुआ. मोरारजी और इंदिरा ने अपनी-अपनी तरफ से लामबंदी शुरू कर दी. आनंद मोहन की इंदिरा गांधी पर लिखी किताब, ‘इंदिरा गांधी- अ पर्सनल एंड पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी’ से मालूम होता है कि कामराज ने कांग्रेस शासित राज्यों के ज़्यादातर मुख्यमंत्रियों को इंदिरा के पक्ष में राज़ी कर लिया था. नयी दिल्ली में राजनैतिक हलचल चरम पर थी. इंदिरा और मोरारजी बड़े कांग्रेसी नेताओं से और उनके चाहने वाले बाकी नेताओं से मिलकर अपने पक्ष में हवा बांधने लग गए.

रामचंद्र गुहा, ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि तजुर्बे के लिहाज़ से मोरारजी देसाई इंदिरा गांधी पर भारी पड़ते थे. नेहरू ने भी एक बार ज़िक्र किया था कि कार्यकुशलता, क़ाबिलियत, निष्पक्षता और इन्साफ के मामले में वे देसाई का सबसे ज़्यादा सम्मान करते हैं.

कांग्रेस के इतिहास में पहली बर प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव होने जा रहा था. इंदिरा को नेहरू का वारिस होने का फ़ायदा मिला. उनके पक्ष में 355 कांग्रेसियों ने मत दिया. उधर, मोरारजी को महज़ 165 मत मिले. इस तरह देश को तीसरा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रूप में मिल गया.

विरोधियों की राय

जनसंघ को इंदिरा गांधी रूस की तरफ़ झुकी हुई लगती थीं तो राम मनोहर लोहिया को वो एक गूंगी गुड़िया से ज़्यादा कुछ नहीं. वाम यानी लेफ्ट उनसे खार खाए बैठा था क्योंकि केरल में ईएमएस नंबूदरीपाद की वाम सरकार को उन्होंने सनसनीखेज़ तरीके से बर्ख्वास्त करवा दिया था और वह भी तब जब नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे. वहीं, कांग्रेस के नीलम संजीव रेड्डी को लगता था कि इंदिरा उन्हें दरवाज़े के बाहर रखे पायदान से ज़्यादा कुछ नहीं समझती थीं.

बाद में जब उन्होंने कांग्रेस के दो फाड़ करवा दिए, मोरारजी देसाई को वित्त मंत्री के पद हटा दिया, बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करवा दिए तो इन्हीं विरोधियों में से किसी को इंदिरा गांधी ‘दुर्गा’ और किसी को पूरे कांग्रेस मंत्रिमंडल में अकेली ‘मर्द’ नज़र आती थीं

भारतीय राजनीति का स्वरूप बदल गया

इंदिरा गांधी के बाद भारतीय राजनीति का परिदृश्य हमेशा के लिए बदल गया. नेहरू और शास्त्री सर्वसम्मति से काम करने में यकीन करते थे. इंदिरा गांधी युग में यह तरीका पीछे छूट गया. इंदिरा गांधी का प्रभाव हर फ़ैसले में नज़र आने लगा था. उनके शुरुआती महीने तो बस यूं ही गुज़रे पर कुछ दिनों के बाद मिजोरम में अलगाववाद शुरू हो गया. विद्रोह को कुचलने के लिए ताक़त का इस्तेमाल किया गया. पहली बार भारतीय वायु सेना को अपने ही देश के लोगों के ख़िलाफ़ बम बरसाने का हुक्म दिया गया. मिज़ो आंदोलन के कुचले जाने के साथ ही इंदिरा काल शुरू हो गया था.

चलते-चलते

जब कुलदीप नैयर ने वाईबी चव्हाण को शास्त्री की मंशा बताई तो उन्हें हैरत हुई. उन्होंने नैयर साहब से इसरार किया को वे अपने किसी लेख में इस बात का ज़िक्र ज़रूर करें. कई बार ऐसे मौके भी आये जब उन्होंने इंदिरा के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाई. पर जब कांग्रेस के दो फाड़ हुए तो वो सिंडिकेट के साथ न जाकर इंदिरा कैंप में शामिल हो गए. हो सकता है कि शास्त्री द्वारा कही गई बात सुनकर प्रधानमंत्री बनने की इच्छा उनमें ताज़िंदगी रही हो. पर विडंबना देखिये, इंदिरा गांधी की मृत्यु के महज़ 25 दिन बाद वे भी चल बसे.