राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर से एक नामित सदस्य हैं स्वपन दासगुप्ता. पिछले दिनों उन्होंने द टाइम्स ऑफ इंडिया अख़बार में एक कॉलम लिखा. इसका शीर्षक था, ‘अगर 2019 में मोदी हारे तो हम फिर पुरानी अस्थिर राजनीति के धरातल पर आ खड़े होंगे.’ इसके बाद अगले लोकसभा चुनाव के लिहाज़ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक था, जो लगने शुरू भी हो गए.

हालांकि दासगुप्ता का कॉलम पूरी तरह से इस मुद्दे पर केंद्रित नहीं था कि मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में पार्टी चुनाव हार रही है या जीत रही है. यही वजह थी कि उनके कॉलम को लेकर बहस शुरू होने के बाद उन्होंने तुरंत ट्विटर पर अपना स्पष्टीकरण भी जारी किया. उन्होंने बताया कि कॉलम का जो शीर्षक प्रकाशित हुआ है वह उन्होंने नहीं दिया था. फिर भी बात बनी नहीं क्योंकि दासगुप्ता ने लेख में दलील दी थी कि मोदी के साढ़े तीन साल के कार्यकाल ने ही सबको यह भुला दिया है कि गठबंधन की सरकारों के दौर में किस-किस तरह की दिक्क़तों का सामना करना पड़ता था. मसलन सत्ताधारी गठबंधन के मुख्य दल को बात-बात पर छोटी क्षेत्रीय पार्टियों के आगे झुकना पड़ता था और उनके दबाव की वज़ह से सरकार का कामकाज़ बुरी तरह प्रभावित होता था जो स्थिति अब नहीं है.

इसीलिए यह कहना बहुत ग़लत नहीं होगा कि दासगुप्ता के लेख से भाजपा की चिंता की झलक तो मिल रही थी.चिंता इस बात की कि अगर अगले साल मई में होने वाले लोक सभा चुनाव में वह सामान्य बहुमत हासिल न कर पाई तो क्या होगा? अगर कहीं लोक सभा में सबसे बड़ी पार्टी या दूसरे नंबर का ही दल बनकर रह गई तो क्या होगा? और बीते दिनों सामने आए कुछ ओपिनियन पोल सर्वे, सहयोगी दलों द्वारा दबाव बनाने की ख़बरें और कुछ विश्लेषणों का निष्कर्ष भाजपा की इस चिंता की पुष्टि करता दिखाई देता है.

पहले सर्वे की बात

लोक सभा में कुल 545 सीटें हैं. बहुमत के लिए किसी भी पार्टी को 272 का आंकड़ा पार करना होता है. या कम से कम इतनी सीटें तो चाहिए ही होती हैं. साल 2014 की बात करें तो उससे पहले के 30 साल के दौर में पहली बार ऐसा हुआ था जब किसी एक पार्टी ने 272 से ज़्यादा सीटें (भाजपा को 282 सीटें मिली थीं) हासिल की थीं. लेकिन अभी की स्थिति की झलक इंडिया टुडे में जनवरी में प्रकाशित एक सर्वे से मिलती है. इस सर्वे के मुताबिक़ अगर तुरंत चुनाव हो जाएं तो भाजपा को 264 सीटों के आसपास ही मिल पाएंगी. जबकि 12 महीने पहले इसी सर्वे ने भाजपा को 305 सीटें दी थीं.

बीती जनवरी में ही लोकनीति और सीएसडीएस का सर्वे भी आया. इसमें भी बताया गया कि अगर अभी चुनाव हुए तो भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को 293 से 309 के बीच सीटें मिलेंगी. जबकि 2014 में एनडीए ने 336 सीटें जीती थीं. यानी तब की तुलना में 30 के क़रीब सीटों का नुक़सान. और इसका दूसरा मतलब यह भी कि गठबंधन में भाजपा इस बार 272 के आसपास या उससे कुछ नीचे के आंकड़े पर ठहर सकती है.

अब गठबंधन के सहयोगियों का ज़िक्र

प्रधानमंत्री मोदी और उनके सहयोगी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में एनडीए के सहयोगी बहुत शक्तिशाली नज़र नहीं आते. हालांकि भाजपा ने इसके बावज़ूद सहयोगी दलों को अपनी सरकार में शामिल किया है. इनमें शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल, तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और अन्य छोटे दल प्रमुख हैं. फिर भी सरकार में इनकी अहमियत और गुंजाइश ज़्यादा नहीं है. इसकी मुख्य वज़ह है, भाजपा के पास लोक सभा में 282 सीटों का संख्या बल होना. यानी यह समझ सबको है कि भाजपा अकेले भी सरकार चला सकती है.

लेकिन इसके बाद भी पिछले कुछ दिनों एनडीए सहयोगियों की विरोध की आवाज़ें बुलंद हो रही हैं. शिवसेना घोषणा कर चुकी है कि वह महाराष्ट्र में अकेले दम पर ही चुनाव लड़ेगी. उसे शिकायत है कि महाराष्ट्र में भाजपा ने उसका जनाधार लील लिया है. ऐसे ही पिछले कुछ समय से टीडीपी खुलेआम नाराज़गी ज़ता रही है. उसे आंध्र प्रदेश के पुनर्निर्माण के लिए केंद्र से आर्थिक मदद चाहिए. उसकी चिंता यह भी है कि भाजपा आंध्र में उसकी विरोधी वाईएसआर कांग्रेस को भी पटाने में लगी है. इन दोनों दलों की तरह अकाली दल ने भी अपना असंतोष ज़ताया है. उसकी ओर से हाल में ही आए बयान कहा गया कि भाजपा को अपने सहयोगियों से बेहतर व्यवहार करना चाहिए.

इन तमाम अावाज़ों का मतलब सीधा है. भाजपा के सहयोगी अब उस पर दबाव बढ़ाने लगे हैं. और अगर अगले चुनाव में पार्टी बहुमत से थोड़ा भी कम रही तो उसे इन सहयोगियों की सख़्त सौदेबाज़ी का सामना करना पड़ सकता है.

और अंत में विश्लेषणों का निष्कर्ष

तीसरी बात आती है विश्लेषणों की. उदाहरण के तौर पर जाने-माने पत्रकार शेखर गुप्ता इस बार के बजट का विश्लेषण करते हुए मानते हैं कि मोदी सरकार राजनीतिक भविष्य को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है. स्वपन दासगुप्ता (जिनका ज़िक्र ऊपर किया गया) भी एक अन्य लेख में यह स्वीकार करते हैं कि भाजपा अगले चुनाव में शायद 220 सीटें ही जीत सके. हालांकि यहीं वे यह भी ऐलान करते हैं कि खेल अभी पूरा खुला हुआ है. लेकिन एक अन्य विश्लेषक नीलांजन मुखोपाध्याय साफ़ तौर पर मानते हैं कि मोदी को अगले चुनाव के बाद नए सहयोगियों की ज़रूरत पड़ सकती है. और 2014 में मोदी के मिशन-272 के साथी रहे तकनीकी उद्यमी राजेश जैन लिखते हैं, ‘अगला चुनाव लोगाें की सोच से भी ज़्यादा खुला होगा.’ यानी आश्वस्ति यहां भी नज़र नहीं आती.

तो इन विश्लेषणों का निष्कर्ष क्या? पहला- भाजपा अब भी बहुमत के लिए उत्तर के उन्हीं राज्यों पर ज़्यादा निर्भर है जहां उसने 2014 में अन्य दलों का लगभग सूपड़ा साफ कर दिया था. जैसे गुजरात, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, आदि. यह निर्भरता कुछ समय पहले तक तो ज़्यादा चिंताजनक नहीं थी. लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव और राजस्थान में तीन सीटों (दो लोक सभा और एक विधानसभा) के नतीजों ने चिंता बढ़ाई है. गुजरात में जहां भाजपा 100 के आंकड़े से नीचे ठहर गई है. वहीं राजस्थान में तीनों सीटें उससे कांग्रेस ने छीन ली हैं.

इसीलिए अब कुछ लोग यह मान रहे हैं कि ऊपर जिन राज्यों का ज़िक्र हुआ है उनमें कांग्रेस अब भाजपा को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में आ चुकी है. हालांकि कुछ लोग अब भी ऐसे हैं जो मानते हैं कि इन राज्यों में 2014 का प्रदर्शन 2019 में भी दोहराया जा सकता है. लेकिन चिंताएं और चिंतितों का पलड़ा भारी होता जा रहा है. संभवत: यही कारण है कि भाजपा लोक सभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए ज़्यादा बेक़रार है ताकि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता स्थानीय सरकारों (ख़ासकर भाजपा शासित) के प्रदर्शन या सत्ताविरोध रुझान पर भारी पड़ सके. और पार्टी आसानी से चुनाव निकाल ले जाए.

भाजपा नेतृत्व इस सिलसिले में तमाम दलों के नेताओं से बातचीत भी कर रहा है. सुना है प्रधानमंत्री मोदी ख़ुद विपक्षी नेताओं से इस बाबत मिल रहे हैं. कोशिश इस बात की है कि लोक सभा के चुनाव अगर इसी साल हो जाएं तो भी कोई दिक्क़त नहीं है. या फ़िर अगले साल हों तब भी. लेकिन कम से 12-15 राज्य विधानसभाओं के चुनाव तो उसके साथ हो ही जाएं. अलबत्ता भाजपा की यह बेक़रारी भी उसकी चिंता ही ज़्यादा ज़ाहिर करती है. वैसा माना यह भी जा रहा है कि दो महीने बाद होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीज़ों के बाद तस्वीर और साफ़ नज़र आने लगेगी और शायद तब भाजपा तेजी से हरकत में आती हुई भी दिखे.