राम मंदिर के नए फॉर्मूले पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में जमकर महाभारत हुई लेकिन यह फॉर्मूला इस्लामी यूनिवर्सिटी नदवतुल उलेमा के मौलाना सलमान नदवी का था या आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर का? मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अहम बैठक से ठीक पहले मौलाना सलमान नदवी का वीडियो यूट्यूब पर आना और फिर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में राम मंदिर का छा जाना, क्या यह सिर्फ संयोग था?

सुनी-सुनाई है कि इसके पीछे करीब तीन महीने की तैयारी थी. अयोध्या विवाद पर पहले चरण की बातचीत में श्रीश्री रविशंकर पूरी तरह नाकामयाब हो गए थे. अयोध्या जाने और लखनऊ में योगी आदित्यनाथ से मिलने के बाद भी उन्हें इस मसले पर कुछ भी हासिल नहीं हुआ. अब एक बार फिर श्रीश्री रविशंकर अयोध्या जा रहे हैं. 20 फरवरी की तारीख तय हो चुकी है. लेकिन इस बार वे अकेले नहीं होंगे, उनके साथ मौलाना सलमान नदवी भी होंगे और इस दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड के कुछ सदस्यों से भी उनकी सीधी बात होगी.

14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई होनी है. पिछली सुनवाई में ही उसने साफ कह दिया है कि ये पूरा मामला ज़मीन विवाद की तरह देखा जाएगा और इसमें भावनात्मक दलील की कोई जगह नहीं होगी. अदालत ने एक और बड़ी बात कही थी जो गौर करने वाली है. अब इस मुकदमे में कोई नया पक्षकार भी नहीं जुड़ सकता. इसका मतलब ये कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में अब सिर्फ तीन मुख्य पक्षकार ही रहेंगे - सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा.

इस लिहाज से नया फॉर्मूला कुछ ऐसा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पास ज्यादा कुछ करने का विकल्प नहीं छोड़ता. इसकी बुनियाद बड़ी सीधी है. अगर सुन्नी वक्फ बोर्ड को इस मसले पर तैयार कर लिया जाता है और सुप्रीम कोर्ट के सामने वह अपनी बात रख देता है तो यह मामला अदालत के जरिये लेकिन अदालत के बाहर हल हो सकता है. अयोध्या के तीन मुख्य पक्षकारों में से सुन्नी वक्फ बोर्ड ही एक ऐसा पक्षकार था जो मस्जिद बनाने पर अड़ा था. अब इसके कई सदस्य मौलाना नदवी और रविशंकर के संपर्क में हैं.

कुछ पत्रकार और नेताओं के अलावा रविशंकर के कुछ खास लोग ही जानते हैं कि 20 फरवरी के बाद राम मंदिर पर क्या होने वाला है. इन लोगों से बात करने पर पता चलता है कि उनकी इस बार की यात्रा पिछली बार से एकदम अलग है. इस बार वे करीब 90 दिनों की तैयारी के बाद अयोध्या निकलेंगे. दिसंबर, जनवरी और फरवरी महीने में उन्होंने देश के करीब 200 मौलानाओं से खुद बात की है.

दिसंबर में एक बड़ा ट्विस्ट तब आया जब रविशंकर का सुझाया फॉर्मूला देश के कुछ मौलानाओं ने कबूल कर लिया. इसके बाद जनवरी में रविशंकर ने नदवातुल के लोकप्रिय मौलाना सलमान नदवी को भी इस पर तैयार कर लिया. फिर सुन्नी वक्फ बोर्ड के चीफ ने भी उनके फॉर्मूले पर मौखिक सहमति दे दी. यह फॉर्मूला तीन सूत्रीय है - पहला, अयोध्या में राम मंदिर बनगा और इसके बदले देश में मुस्लिम समाज जहां चाहे वहां एक बड़ी मस्जिद बनाई जाएगी. दूसरा, राम मंदिर के बाहर भी लिखा जाएगा कि यह मंदिर हिंदू और मुस्लिम समाज के भाईचारे की निशानी है और इसे दोनों समाज ने मिलकर बनाया है. और तीसरा सरकार यह भरोसा देगी कि अब किसी मुस्लिम धर्मस्थल पर हमला नहीं होगा.

इस तीनसूत्रीय फॉर्मूले पर अयोध्या जाकर श्रीश्री रविशंकर इस विवाद से जुड़े बाकी लोगों से मिलेंगे और उन्हें भी अपनी बात समझाने की कोशिश करेंगे. अयोध्या से खबर आई है कि इनमें से भी कुछ लोग मान चुके हैं बाकियों को मनाना है. बताया जाता है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को उम्मीद थी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ सदस्य भी इस फॉर्मूले का साथ देंगे, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ. उल्टा बोर्ड ने सलमान नदवी को ही बाहर कर दिया. इसके बाद से सुन्नी वक्फ बोर्ड चलाने वाले कुछ लोगों के होश उड़े हुए हैं. रविशंकर को अब उन्हें भी समझाना है.

सुनी-सुनाई है कि जब श्रीश्री रविशंकर लखनऊ जाएंगे तो एक बार फिर योगी आदित्यनाथ से उनकी मुलाकात होगी. मन से योगी फॉर्मूले के साथ बताए जाते हैं लेकिन ऐसा वे खुलेआम दिखा नहीं सकते. इसलिए अयोध्या पर फिलहाल बात रविशंकर और सलमान नदवी के जरिए ही होगी. भाजपा से नजदीकी रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार की बात बेहद गौर करने वाली है. अगर 2019 के चुनाव से पहले राम मंदिर बनने का माहौल बनना शुरू हो गया तो इससे पैदा हुई राम लहर एक बार फिर से भाजपा की चुनावी नैया पार लगा सकती है.