आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में दो दिवसीय यूपी इन्वेस्टर्स समिट का उद्घाटन किया. इस आयोजन में कारोबार जगत के कई बड़े नाम शामिल हो रहे हैं. इनमें मुकेश अंबानी, रतन टाटा और गौतम अडानी शामिल हैं.

‘उत्तर प्रदेश बदल रहा है, बहुत तेजी से बदल रहा है, इतनी तेजी से बदल रहा है कि 21 और 22 फरवरी बीता नहीं कि उत्तर प्रदेश में उद्योगों और निवेश की बरसात होने लगेगी’ बीजेपी के उत्तर प्रदेश के एक उभरते युवा नेता के चेहरे पर यह कहते-कहते अजब सी चमक आ जाती है. पिछले कुछ दिनों से यूपी सरकार की ओर से इन्वेस्टर्स समिट के बारे में जिस तरह की बड़ी-बड़ी उम्मीदें जाहिर की जा रही हैं उससे कई लोगों को ऐसा लग सकता है कि वाकई प्रदेश का कायाकल्प होने में अब तनिक भी देर नहीं लगने वाली.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पिछले दो महीनों में देश के अलग-अलग राज्यों में जाकर उत्तर प्रदेश इन्वेस्टर्स समिट के लिए छह बड़े रोड शो कर चुके हैं. इसमें उनके दोनों उपमुख्यमंत्री भी शामिल हुए थे. बीजेपी सरकार के औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने दावा किया है कि, ‘इन्वेस्टर्स समिट के दौरान उत्तर प्रदेश में एक लाख करोड़ से अधिक का निवेश जुटाने का जो लक्ष्य रखा गया था, निवेशकों के उत्साहजनक रूख के चलते 75 फीसदी निवेश प्रस्ताव पहले ही प्राप्त हो चुके हैं.’ महाना का ये भी कहना है कि 138 बड़े नामी निवेशकों ने अब तक उत्तर प्रदेश में 70 हजार करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव दिये हैं.

सतीश महाना के ये दावे भले ही उनका अपना जोश बढ़ा रहे हों लेकिन साथ ही वे अपनी ही सरकार के दावों को झुठला भी रहे हैं. उत्तर प्रदेश सरकार कुछ समय पहले 2.53 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव आने का दावा कर चुकी है. दिसंबर में मुंबई रोड शो के बाद उसने यह दावा किया था. सरकार के मुताबिक केवल मुंबई रोड शो से ही सवा लाख करोड़ से ज्यादा के निवेश प्रस्ताव मिले थे.

मुंबई रोड शो में टाटा और अंबानी थे. लखनऊ समिट में उनके साथ-साथ देश के बाकी तमाम बड़े उद्यमी भी हैं. नीदरलैंड, फिनलैंड, चेक गणराज्य जैसे कन्ट्री पार्टनर होने का भी दावा किया जा रहा है. इन दो दिनों के दौरान लखनऊ हवाई अड्डे पर जगह नहीं बचने की हालत में कई विमानों को दिल्ली-मुम्बई में पार्क कराने की भी योजनाएं हैं. सरकार मेजबानी में कोई कसर बाकी रखना नहीं चाहती. शहर के तमाम होटल बुक हो चुके हैं. प्रोटोकाल तय किए जा रहे हैं. उद्यमियों की सुविधा के लिए धड़ाधड़ योजनाएं बन रही हैं. उनके लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम शुरू किया जा रहा है. नई औद्योगिक नीति-2017 जारी की जा रही है.

इन सब कामों के लिए पैसा खर्च करने में कोई रोक नहीं थी. एयरपोर्ट से लेकर इन्वेस्टर्स समिट स्थल इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान तक की सड़क को यूरोप जैसा बनाने का काम हुआ. शहर के सारे प्रमुख होटलों तक जाने के रास्ते चमकाए गए. अखिलेश सरकार के समय से ही उपक्षित पड़े मायावती के स्मारकों के दिन भी बहुर गए. बताया जाता है कि 100 करोड़ तो सिर्फ लखनऊ की चुनिंदा सड़कों के रंग-रोगन और बिजली की सजावट पर खर्च हुए हैं. खंभे बदल गए, तार बदल गए, बल्ब बदल गए. अब 21-22 फरवरी के बाद यूपी को बदलना है.

लेकिन योगी सरकार के ये अंदाज विपक्ष को नहीं भा रहे हैं. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं, ‘इस जगमग के साथ उत्तर प्रदेश सरकार को यह भी बताना चाहिए कि यूपी का युवा अपनी रोटी कहां से हासिल करेगा. अगर सरकार के पास इसकी कोई योजना हो तो वह भी तो बताए.’

अखिलेश जिस योजना के बाबत योगी सरकार से प्रश्न पूछ रहे हैं, वह सवाल तो है ही लेकिन दूसरे कुछ सवाल ये भी हैं कि क्या पहले ऐसे प्रयास नहीं हुए हैं? अगर हुए हैं तो उनका अब तक का हासिल क्या है? और उस हासिल को ध्यान में रखते हुए योगी सरकार के प्रयासों से कितनी उम्मीद जगती है?

कभी ‘मैनचेस्टर आफ द ईस्ट’ कहलाने वाले कानपुर जैसे बड़े औद्योगिक शहरों वाला उत्तर प्रदेश कांग्रेसनीत सरकारों के राज में मुरादाबाद, मेरठ, फिरोजाबाद, आगरा, भदोही, बनारस जैसे परंपरागत उद्योग नगरों से आगे नहीं घिसट सका. नारायण दत्त तिवारी द्वारा ओखला की तर्ज पर न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलेपमेंट अथॉरिटी यानी नोयडा के जरिए एक नई कोशिश जरूर की गई लेकिन अंतत: ग्रेटर नोयडा तक फैलते-फैलते यह सारा इलाका यूपी नहीं बल्कि दिल्ली ही समझा जाने लगा है. संजय, राजीव, इंदिरा, सोनिया और राहुल गांधी के अमेठी-रायबरेली में भी उद्योगों के नाम पर सिर्फ खंडहर ही दिखते हैं तो बाकी यूपी का हाल खुद ब खुद समझा जा सकता है.

कांग्रेसी राज के बाद मुलायम सिंह यादव ने यूपी में निवेश की संभावनाएं तलाशने का प्रयास किया. वर्ष 2003 में उन्होंने अपनी सरकार के दौर में इस काम के लिए यूपी डेवलेपमेंट काउंसिल नाम से एक संस्था बनवाई. उनके तब के सबसे प्रिय अमर सिंह इसके अध्यक्ष बनाए गए और संस्था को शानदार पांच सितारा दफ्तर दिया गया. छोटे अंबानी से लेकर तमाम बड़े उद्यमियों ने इस काउंसिल की कई बैठकों में लखनऊ आकर हिस्सेदारी भी की. लेकिन उपलब्धि के नाम पर इसके हिस्से आया सिर्फ रिलायंस का दादरी पावर प्लांट जिसकी शिलान्यास हुई भूमि उसी हालत में कई वर्षों और अदालती चक्करों के बाद रिलायंस को वापस छोड़नी पड़ी.

मुलायम सिंह यादव के सत्ता पतन के बाद मुख्यमंत्री बनी मायावती ने इस काउंसिल को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया. साथ ही उन्होंने रिलायंस रिटेल की कृषि, डेयरी व बागबानी आदि क्षेत्र में दस हजार करोड़ के निवेश की योजनाओं पर भी पानी फेर दिया. हालांकि बाद के दिनों में मायावती ने रिलायंस को मनाने की कई कोशिशें कीं लेकिन फिर बात नहीं बन सकी. अपने समय में मायावती ने मुंबई से लेकर लंदन और अमेरिका तक जाकर यूपी में निवेश लाने की कोशिश की लेकिन नतीजा ढाक के तीन पत्ते ही रहा.

मायावती की सत्ता के बाद अखिलेश यादव ने कुर्सी संभालते ही यूपी को उद्योगमय बनाने के लिए 2012 की अपनी नई उद्योग नीति में 11.2 फीसदी की इंडस्ट्रियल ग्रोथ का लक्ष्य तय किया. उन्होंने भी मायावती की तर्ज पर विदेशों से इन्वेस्टमेंट लाने के लिए लंदन आदि के दौरे किए. लेकिन मायावती राज की तरह इन दौरों को भी प्रदेश में निवेश लाने के बजाये अपना निवेश करने के अवसरों के तौर पर खूब चर्चाएं मिलीं. अखिलेश सरकार द्वारा मार्च 2016 में किये गये 50,793.79 करोड़ रूपये के निवेश के दावे के बावजूद सिर्फ साढ़े तीन हजार करोड़ रूपये का ही निवेश यूपी में आ पाया. इसमें भी ज्यादातर बिजली, चीनी जैसे परंपरागत उद्योगों में ही था.

अपने समय में अखिलेश यादव भी वह काम कर चुके हैं जिसके जरिये आज योगी सरकार उत्तर प्रदेश का औद्योगिक कायाकल्प करने का सपना देख रही है. 12 जून 2014 को उन्होंने नई दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में ‘यूपी इन्वेस्टर्स कॉन्क्लेव’ का आयोजन किया उस वक्त सरकार ने था. ‘द लैंड ऑफ अनलिमिटेड पोटेंशियल’ में निवेश के 54.6 हजार करोड़ के एमओयू किए जाने का दावा किया था. खूब प्रचार और हो-हल्ले के बावजूद अखिलेश सरकार दिल्ली के इन्वेस्टर्स कॉनक्लेव से यूपी के लिए कुछ ला नहीं पाई.

तो क्या इस बार जो हो रहा है उससे कुछ अलग उम्मीद लगाई जा सकती है?

बीजेपी के कुछ नेताओं और सरकार तथा शासन के दावों में कई झोल होने के बावजूद कुछ लोगों को योगी आदित्यनाथ सरकार की इस इन्वेस्टर्स समिट से इसलिए भी उम्मीद है कि इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है. यह उम्मीद कुछ और मजबूत तब हो जाती है जब यह ध्यान आता है कि अगले साल देश के आम चुनाव होने हैं और उनमें सत्ताधारी पार्टी की जीत के लिए उत्तर प्रदेश की भूमिका बहुत बड़ी है.

लेकिन फिर भी यह तथ्य अपनी जगह है कि किसी भी राज्य में निवेश की पहली शर्त इन्वेस्टर्स समिट करना या उसमें प्रधानमंत्री का आना या उसके लिए राजधानी की सड़कें सवांर देना और उनकी रंगाई-पुताई कर देना ही नहीं हैं. इसकी पहली शर्त है राज्य का बुनियादी ढांचा. उसमें मौजूद सड़क, बिजली, पानी और कानून-व्यवस्था जैसी बुनियादी सुविधाएं. क्या इनकी स्थिति में बुनियादी बदलाव किए बिना उत्तर प्रदेश का औद्योगिक कायाकल्प संभव है? निवेश की किसी भी कल्पना की सफलता के लिए कम से कम यह तो समझा ही जाना चाहिए कि कोई भी उद्यमी अपना पैसा शूटरों, हूटरों, वसूली गिरोहों और छुटभैय्यों के बीच खुशियां बांटने के लिए तो लगाता नहीं है. पिछली सरकारों और मुख्यमंत्रियों ने इसे समझकर भी नहीं समझा था. योगी आदित्यनाथ ने भी अब तक कुछ खास ऐसा नहीं किया है जो पहले से अलग हो.