भारतीय टीम जब दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर गई थी तो ज्यादातर विश्लेषकों का कहना था कि इस टीम का प्रदर्शन यहां पिछले दौरों पर गई भारतीय टीमों से बेहतर रहने वाला है. इसके पीछे की मुख्य वजह मजबूत भारतीय बल्लेबाजी के साथ-साथ संतुलित गेंदबाजी आक्रमण का होना था जिससे यह टीम पिछली भारतीय टीमों से ज्यादा बेहतर नजर आ रही थी. हालांकि, दक्षिण अफ्रीका में स्पिन के मुफीद पिचें न होने के कारण इस गेंदबाजी आक्रमण से भी कोई बड़ी उम्मीद तो नहीं लगाई जा रही थी, लेकिन यह तय था कि अफ्रीकी बल्लेबाज इन्हें उतनी आजादी से नहीं खेल पायेंगे जितना कि पिछले दौरों पर भारतीय गेंदबाजी को खेलते रहे हैं. यही वजह थी कि हमेशा की तरह इस दौरे पर भी दारोमदार बल्लेबाजों के कंधों पर ज्यादा था.

लेकिन, अगर अफ्रीका दौरे पर टेस्ट, वनडे और टी20 सीरीज खत्म होने के बाद टीम के प्रदर्शन को देखें तो भारतीय टीम के एक-दो बल्लेबाजों को छोड़कर गेंदबाज ही जीत में अहम भूमिका निभाते नजर आए हैं. टेस्ट सीरीज की बात करें तो अफ्रीका में पहली बार भारतीय गेंदबाजों ने सीरीज के तीन मैचों की सभी छह पारियों में अफ़्रीकी टीम को ऑल आउट किया जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. टेस्ट सीरीज के खत्म होते होते यह भी साफ़ हो चुका था कि इस बार भारतीय टीम अफ्रीका में गेंदबाजी नहीं बल्कि बल्लेबाजी की वजह से हारी.

टेस्ट के बाद वनडे सीरीज शुरू हुई जिसमें दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भारतीय टीम के हालात टेस्ट से ज्यादा चुनौतीपूर्ण बताए जा रहे थे. इसके वाजिब कारण भी थे. पहला कारण दक्षिण अफ्रीकी टीम ही थी जो पिछले करीब पांच सालों में अपनी सरजमीं पर कोई वनडे सीरीज नहीं हारी. घर के बाहर भी पिछले चार सालों में इस टीम ने पांच या उससे ज्यादा मैचों की कोई द्विपक्षीय सीरीज नहीं गंवाई. इसमें 2015 की वह द्विपक्षीय सीरीज भी शामिल है जिसमें उसने भारत को उसके घर में 3-2 से शिकस्त दी थी. वनडे सीरीज में भारत का मुकाबला एक ऐसी दक्षिण अफ्रीकी टीम से था जो दुनिया की नंबर एक टीम थी और जिसके चार बल्लेबाज दुनिया के शीर्ष दस बल्लेबाजों में शामिल थे.

दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ वनडे सीरीज में कुलदीप और चहल ने मिलकर कुल 33 खिलाड़ियों को आउट किया | फोटो : बीसीसीआई / स्पोर्टसपिक्स
दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ वनडे सीरीज में कुलदीप और चहल ने मिलकर कुल 33 खिलाड़ियों को आउट किया | फोटो : बीसीसीआई / स्पोर्टसपिक्स

वनडे सीरीज में भारत को इसलिए भी कम आंका जा रहा था कि अफ़्रीकी परिस्थितियां भी उसके विपरीत ही थीं. पिछले साल अगस्त से देखें तो युजवेंद्र चहल और कुलदीप यादव ने वनडे प्रारूप में मिली जीतों में अहम भूमिका निभाई. लेकिन, बाउंस और पेस को सपोर्ट करने वाली अफ्रीका की पिचों पर इनके कामयाब होने की उम्मीद न के बराबर ही थी. पिछले रिकार्डस पर नजर डालें तो स्पिनर यहां कमजोर ही साबित हुए हैं. यही वजह थी कि जब विराट कोहली ने पहले मैच में चहल और कुलदीप दोनों को ही अंतिम ग्यारह में चुन लिया तो कई लोग हैरान थे.

लेकिन, वनडे सीरीज के पहले मैच से ही चहल और कुलदीप ने जिस तरह की गेंदबाजी की उसने सभी को हैरान कर दिया. विपरीत परिस्थितयों को भी दोनों ने ऐसा बना दिया कि मानो वे एशिया की पिचों पर ही गेंदबाजी कर रहे हों. छह मैचों में दोनों ने कुल 33 विकेट झटके जिनमें कुलदीप ने 17 और चहल ने 16 खिलाड़ियों को आउट किया. आंकड़ों को देखें तो बीते 25 साल में अफ्रीका की धरती पर कोई भी स्पिन गेंदबाज इतना कामयाब नहीं हुआ. पूर्व भारतीय कप्तान सुनील गावस्कर एक टीवी कार्यक्रम में कहते हैं, ‘तेज गेंदबाजों की मुफीद पिचों पर स्पिनरों का सबसे ज्यादा विकेट लेना बताता है कि वे किस स्तर की गेंदबाजी कर रहे हैं...मुझे लगता है कि इन दोनों में दुनिया की किसी भी पिच पर विकेट निकालने की क्षमता है, फिर चाहें वह पिच स्पिन गेंदबाजी को सपोर्ट करे या न करे.’

भारतीय स्पिनरों की काबिलियत का पता इससे भी चलता है कि जहां ये इस टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बने वहीं, दक्षिण अफ़्रीका के अनुभवी स्पिन गेंदबाज इमरान ताहिर चार मैचों में महज एक विकेट ही निकाल पाए.

क्रिकेट विश्लेषक हर्षा भोगले एक और महत्वपूर्ण बात भी बताते हैं. वे कहते हैं, ‘भारत की हमेशा से एक बड़ी परेशानी यह रहती थी कि गेंदबाज 25 से लेकर 40 ओवरों के बीच में विकेट नहीं निकाल पाते थे. इससे विपक्षी बल्लेबाजों को सेट होने का मौका मिल जाता था. लेकिन, आप युजवेंद्र चहल और कुलदीप यादव के आने के बाद देखें तो भारत की यह परेशानी दूर हो गई है. ये दोनों ही बीच के ओवरों में कप्तान को विकेट निकालकर दे रहे हैं. यहां तक कि विपक्षी बल्लेबाजों को बीच के ओवर खेलने में ही सबसे ज्यादा दिक्कत आ रही है.’ विश्लेषकों की मानें तो बीते जून में इंग्लैंड में हुई चैम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल मुकाबले में और 2015 विश्वकप के सेमीफाइनल में भारत की हार के पीछे का सबसे बड़ा कारण यही रहा था.

भारतीय तेज गेंदबाजों ने भी अफ्रीका दौरे पर खासा प्रभावित किया है, विशेषकर भुवनेश्वर कुमार और जसप्रीत बुमराह ने. भुवनेश्वर कुमार पावरप्ले और डेथ ओवरों में बेहद असरदार साबित हुए हैं. पिछले करीब एक साल से भुवी ने अपनी गेंदबाजी को एक अलग स्तर पर पहुंचाया है. नई गेंद से बिना एक्शन में बदलाव किए दोनों ओर स्विंग कराने की योग्यता और क्षमता ने उन्हें एक खतरनाक तेज गेंदबाज बना दिया है. गेंदबाजी के दौरान बीच-बीच में उनके द्वारा किया जाने वाला मिश्रण बल्लेबाजों के लिए चुनौतियां बढ़ा देता है.

वनडे प्रारूप में लगातार बेहतरीन गेंदबाजी के चलते जसप्रीत बुमराह हाल ही में दुनिया के नंबर एक गेंदबाज बन गए हैं | फोटो : बीसीसीआई / स्पोर्टसपिक्स
वनडे प्रारूप में लगातार बेहतरीन गेंदबाजी के चलते जसप्रीत बुमराह हाल ही में दुनिया के नंबर एक गेंदबाज बन गए हैं | फोटो : बीसीसीआई / स्पोर्टसपिक्स

दक्षिण अफ्रीका में वनडे सीरीज के दौरान स्पिनरों के बाद सबसे बेहतर गेंदबाजी जसप्रीत बुमराह ने की है. हालांकि, इस सीरीज में वे केवल 8 विकेट ही ले पाए लेकिन, उनकी किफायती गेंदबाजी काफी चर्चा में रही. डेथओवरों के विशेषज्ञ कहे जाने वाले बुमराह ने अफ्रीका में भी अपनी इस खूबी को बरकरार रखा. इस वनडे सीरीज में उनका इकनॉमी चार से भी कम का रहा है जो अपने आप में उनकी काबिलियत को दर्शाता है. भुवी और बुमराह दोनों की खासियत यह भी है कि वे मुकाबले के दौरान अलग-अलग चरणों में विकेट लेने की क्षमता भी रखते हैं.

बुमराह वनडे में अपने लगातार बेहतर प्रदर्शन के चलते आज दुनिया के नंबर एक गेंदबाज बन गए हैं. यह उपलब्धि कितनी बड़ी है इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि 29 साल बाद कोई भारतीय तेज गेंदबाज वनडे में नंबर एक गेंदबाज बना है. इससे पहले तेज गेंदबाजों में कपिल देव मार्च 1989 को दुनिया के नंबर एक गेंदबाज बने थे. इसके बाद सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग पाने वाले तेज गेंदबाज इरफ़ान पठान थे जिन्होंने अप्रैल 2006 में गेंदबाजों की सूची में दूसरा स्थान हासिल किया था.

हालांकि, कुछ लोग दक्षिण अफ्रीका में भारतीय गेंदबाजों के लाजवाब प्रदर्शन के पीछे तेज गेंदबाजी के लिए मुफीद वहां की परिस्थितयों को भी श्रेय देंगे. लेकिन, फिर सवाल उठता है कि अफ्रीकी गेंदबाज इतने कामयाब क्यों नहीं हुए, जबकि वे तो अपने घरेलू मैदानों पर ही खेल रहे थे.

भारतीय गेंदबाजों ने वनडे सीरीज के दौरान अफ्रीका में एक और कारनामा किया जो दशकों से भारतीय गेंदबाज अफ्रीका जैसी किसी मजबूत टीम के खिलाफ नहीं कर पाए. भारतीय गेंदबाजों ने छह वनडे मैचों में से चार में अफ़्रीकी टीम को ऑल आउट किया है. इससे पहले भारतीय टीम ने 2015 विश्व कप के दौरान ऐसा ही कारनामा किया था. तब सेमीफाइनल में उसने ऑस्ट्रेलिया से हारने से पहले अपने सभी छह मैचों में विपक्षी टीम को ऑल आउट किया था. लेकिन, इन सभी मैचों में उसका सामना दक्षिण अफ्रीका जैसी मजबूत टीम से नहीं हुआ था और उससे हारने वाली टीमों में यूएई, जिम्बाब्वे और आयरलैंड की टीमें भी शामिल थीं.

बहरहाल, दक्षिण अफ्रीका में भारतीय गेंदबाजों के लिए इतिहास बदलने और टीम को जीत दिलाने से बड़ा हासिल वह भरोसा कायम करना है जिसके बाद कहा जा सकता है कि अब वे किसी भी देश में किसी भी परिस्थिति में कामयाब हो सकते हैं. जहां हमारे तेज गेंदबाज पिचों की बाउंस और पेस का लाभ उठाना जान गए हैं वहीं स्पिनर उन्हीं पिचों पर गेंद को टर्न कराने का माद्दा रखते हैं.