भाषा में सच बोला जा सकता है, वह हमें सचाई से जोड़ती है पर भाषा में झूठ भी बोला जाता है और उसमें छल-कपट भी आम है. इन दिनों, चुनावी माहौल में, भाषा लगातार सार्वजनिक झूठ और छल का माध्यम हो रही है. किसी भी तरह का संस्कार या संयम राजनैतिक भाषा से निकाल दिये गये हैं. इसकी प्रतियोगिता सी हो रही है कि कौन कितनी अभद्रता से कितनी नाटकीयता से झूठ बोल सकता है. इस प्रतियोगिता में देश-प्रदेश के उच्च पदों पर आसीन राजनेता शामिल हो रहे हैं.

विज्ञापन और झूठ का संबंध भी पुराना है. जो नया है वह यह कि झूठ को सीधे-सीधे, बिना किसी संकोच और पूरी बेशर्मी से, विज्ञप्त किया जा रहा है. राजनीति और बाज़ार इस होड़ में बहुत उत्साह से शामिल हैं. कई बार यह सोचकर दहशत होती है कि पूरी दुनिया में भाषा सच से दूर ढकेली जा रही है और झूठ उसका लगभग स्वभाव बन रहा है. ऐसे झूठ का पर्दाफ़ाश करने के अवसर और मंच, हिम्मत और प्रश्नांकन की जगहें घट रही हैं. संकट भाषा की किसी शुद्धता या पवित्रता बचाने का नहीं है - भाषा की सहज मानवीयता, उसका सत्यशील बचाने का है.

जिस भारत में संसार की संभवतः प्राचीनतम परंपरा भाषा-चिंतन की रही है, जो अपनी सूक्ष्मता और परिष्कार के लिए विख्यात थी, उसी देश में भाषा के समकालीन अवमूल्यन पर गहराई से विचार और विश्लेषण का कोई गंभीर प्रयत्न नज़र नहीं आता. भाषा के प्रति एक क़िस्म के कामचलाऊपन का भाव भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं रहा है. अगर एक तरह की आधुनिकता ने, जिसका दुर्भाग्य से, वर्चस्व बढ़ता ही गया है, भाषा को निरा उपकरण मानने की वृत्ति को प्रोत्साहित किया तो उसी आधुनिकता ने जिस प्रश्न पूछने और विचारने की वृत्ति को भी पोसा वह इस मामले में इतनी मंद क्यों है?

आज राजनीति, बाज़ार, धर्म आदि शक्तियां एक अघोषित पर स्पष्ट गठजोड़ में भाषा का लगातार अवमूल्यन कर रही हैं और हम बौद्धिक और सृजनधर्मा लोग चुपचाप ऐसा होते देख रहे हैं. यह अंततः भाषा, बुद्धि, सृजन और चिंतन सभी का स्थगन है - उनके साथ विश्वासघात है.

इतना काफ़ी होना चाहिये पर है नहीं कि हम अपने कर्म में भाषा की मानवीयता और सत्यशील बचाये रखें. यह ऐसा समय है कि जब भाषा के लिए हमें एकजुट होकर बार-बार बुलंद आवाज़ उठाना चाहिये. क्योंकि भाषा का बचना मानवीयता, संग-साथ, सचाई, सामुदायिकता आदि का बचना भी है. सही है कि कुछ मायनों में भाषा हमेशा किसी न किसी संकट में रहती है और उसका जीवट उसे बचाता या संकट से उबारता रहता है. पर आज जो संकट है वह सार्वजनिक जीवन में उसके विराट् अवमूल्यन का है और उसे मानवीय संजीवनी की ज़रूरत है.