फ्रांस ने भारत को 36 और राफेल विमान बेचने की इच्छा जताई है. खबरों के मुताबिक फ्रांस की रक्षा मंत्री फ्लोरेंस पार्ली ने 26 फरवरी को अपनी भारतीय समकक्ष निर्मला सीतारमन को एक चिटठी भेजी थी. इसमें उन्होंने लिखा था कि अगर फ्रांस के राष्‍ट्रपति की यात्रा के दौरान इस बारे में कोई संदेश दिया जा सके तो यह विशेष रूप से सराहनीय होगा.

लेकिन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दिल्ली में हुई मुलाकात के बाद इस तरह की कोई घोषणा नहीं हुई. सूत्रों के मुताबिक भारत ने भविष्‍य में राफेल विमानों के खरीदे जाने से इनकार नहीं किया है, लेकिन यह कब होगा अभी यह तय नहीं है. फिलहाल पुराने ऑर्डर के राफेल विमानों की पहली खेप 2019 में आनी शुरू होगी. फ्रांस की डसाॅल्ट कंपनी से 36 राफेल विमानों का यह सौदा 2016 में हुआ था. इस सौदे को लेकर विवाद जारी है. विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार ने इस डील में गड़बड़ की है. उधर, सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर अपना बचाव कर रही है. इस विवाद को सरल भाषा में समझने की कोशिश करते हैंः

रफैल विवाद की पृष्ठभूमि क्या है?

2007 में भारत के रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायु सेना के लिए लड़ाकू विमानों की खरीद की प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत की. इसके बाद 2011 तक भारतीय वायु सेना ने विभिन्न कंपनियों के विमान का फील्ड ट्रायल किया. फील्ड ट्रायल के बाद दो कंपनियों डसाॅल्ट और यूरोफाइटर को शाॅर्टलिस्ट किया गया. दोनों ने अपना प्रस्ताव भारत सरकार के पास रखा और इसके बाद यह तय हुआ कि डसाॅल्ट से राफेल विमान खरीदने हैं, क्योंकि उसने कम कीमत पर विमान देने की पेशकश की थी.

इस सौदे के तहत 126 विमान खरीदे जाने थे. इनमें से 18 कंपनी देने वाली थी और 108 हिंदुस्तान एयरोनाॅटिक्स लिमिटेड में असेंबल होने थे. इसका मतलब यह हुआ कि सौदे के तहत तकनीक का हस्तांतरण यानी टेक्नॉलाॅजी ट्रांसफर भी होना था. इस बीच केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आ गई. प्रधानमंत्री अप्रैल 2015 में फ्रांस गए और वहां से घोषणा की कि भारत सरकार डसाॅल्ट से 36 राफेल विमान खरीदेगी. इसके कुछ दिन बाद तत्कालनी रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा कि 126 विमानों की खरीद का सौदा खत्म हो गया है और अब भारत सिर्फ 36 विमान खरीदेगा.

इस सौदे में विवाद किन बातों को लेकर है और विपक्ष के क्या आरोप हैं?

विवाद तीन बातों को लेकर है. पहला यह कि मोदी सरकार गोपनीयता बनाए रखने वाले 2008 के एक समझौते का हवाला देकर विमानों की कीमत सार्वजनिक करने को तैयार नहीं है. विवाद की दूसरी वजह मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का यह आरोप है कि उसके कार्यकाल में जो सौदा हो रहा था उसमें प्रति विमान भारत को तकरीबन 450 करोड़ रुपये खर्च करने थे और अभी तकरीबन 1600 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. विवाद की तीसरी वजह यह है कि पुराने सौदे के तहत टेक्नाॅलॉजी ट्रांसफर होना था लेकिन इस सौदे में टेक्नाॅलॉजी ट्रांसफर को लेकर स्पष्टता नहीं है. विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार तकरीबन चार गुना कीमत पर ये विमान खरीद रही है. साथ ही सरकार ने टेक्नाॅलॉजी ट्रांसफर की बात भी नहीं की है.

रक्षा सौदों में आॅफसेट प्रावधान क्या होता है और इसे लेकर विपक्ष का क्या आरोप है?

रक्षा सौदों में आॅफसेट क्लॉज होता है. इसका मतलब यह है कि संबंधित सौदा हासिल करने वाली कंपनी को सौदे की कुल रकम का एक निश्चित हिस्सा भारत में निवेश करना होता है. इस सौदे में यह रकम 50 फीसदी है. इसका मतलब यह हुआ कि रफैल बनाने वाली कंपनी डसाॅल्ट को इस सौदे की आधी रकम भारत में निवेश करनी होगी. यह काम करने के लिए डसाॅल्ट ने अनिल अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस डिफेंस के साथ एक साझा उपक्रम बनाया है और इसी में इस सौदे के आॅफसेट का पैसा लगना है. विपक्ष का यह भी आरोप है कि मोदी सरकार ने रिलायंस को फायदा पहुंचाने के लिए यह सौदा इतने अधिक पैसे में किया ताकि डसाॅल्ट विमानों के बदले मिल रहे अतिरिक्त पैसे को अनिल अंबानी की कंपनी में लगाया जा सके.

विपक्ष के आरोपों में कितना दम है?

विपक्ष की यह बात तो सही है कि एक विमान की कीमत के लिहाज से मोदी सरकार द्वारा किया गया सौदा महंगा है. लेकिन इसके बचाव में सरकार यह कह रही है कि पहले जो विमान लिया जा रहा था और अब जो लिया जा रहा है, वह पहले से काफी अपग्रेडेड यानी आधुनिक है. अगर विमान आने के बाद इस बदलाव से जुड़ी जानकारियां रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों को मालूम चलती हैं तो वे ही बता पाएंगे कि कीमतों की बढ़ोतरी वाजिब है या नहीं. जानकारों के मुताबिक अगर सरकार कीमतों के मसले पर गोपनीयता रखे हुए है तो उसे कम से कम टेक्नॉलाॅजी ट्रांसफर के मसले पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. लेकिन यह भी नहीं हो रहा. इसका मतलब यह भी हुआ कि टेक्नाॅलोजी ट्रांसफर को लेकर विपक्ष का जो आरोप है, वह बिल्कुल निराधार नहीं है.

इन आरोपों पर मोदी सरकार क्या कहकर अपना बचाव कर रही है?

कीमतों को सार्वजनिक नहीं करने को लेकर सरकार कह रही है कि वह मनमोहन सिंह सरकार द्वारा 2008 में किए गए एक समझौते की शर्तों से बंधी हुई है. यह समझौता रक्षा क्षेत्र के सौदों से जुड़ी सूचनाओं की गोपनीयता बनाए रखने से संबंधित है. सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा का भी हवाला दे रही है. रक्षा विशेषज्ञों का भी कहना है कि रक्षा उपकरणों का बाजार पूरी दुनिया में एक ढंग से नहीं चलता. रक्षा उपकरण बेचने वाली कंपनियां खुद नहीं चाहतीं कि बिक्री मूल्य सार्वजनिक हो. क्योंकि ऐसा होने से वे दूसरी जगह वही उपकरण अधिक कीमत पर नहीं बेच पाती हैं. सरकार यह भी कह रही है कि उसे 126 विमानों की जरूरत ही नहीं थी और सिर्फ 36 खरीदकर उसने काफी पैसे बचाए हैं. इन बातों के आधार पर सरकार का यह कहना है कि उसकी नीयत पर सवाल उठाकर विपक्ष ठीक नहीं कर रहा है.

क्या राफेल भाजपा और नरेंद्र मोदी के लिए वैसा ही मुद्दा साबित हो सकता है जैसा बोफोर्स कांग्रेस और उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लिए हुआ था?

रक्षा सौदों में जब भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा है, भारत में वह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना है. बोफोर्स पर आरोपों की आंच सीधे उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक पहुंची थी. उन्हीं के सहयोगी रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स को बहुत बड़ा मुद्दा बना दिया और पूरे विपक्ष को अपने साथ गोलबंद कर लिया. इसका असर यह हुआ कि 1989 के चुनावों में राजीव गांधी की कांग्रेस हार गई और वीपी सिंह को इतने सांसद मिल गए कि वे प्रधानमंत्री बन गए.

राफेल विवाद राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा देगा, यह अभी से कहना मुश्किल है. लेकिन यह हमेशा से रहा है कि रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के आरोप लोगों को अपील करते हैं और उनका वोटिंग पैटर्न इन वजहों से बदलता भी है. इस मुद्दे को बोफोर्स जितना बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने में राहुल गांधी समेत विपक्ष के दूसरे नेता कितने कामयाब होते हैं, यह उनकी राजनीतिक क्षमताओं पर निर्भर करेगा. अगर उन्होंने मतदाताओं को ठीक से समझा दिया कि मोदी सरकार ने गलत किया है तो राफेल बोफोर्स बन जाएगा और अगर मोदी यह समझाने में कामयाब हो गए कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया तो फिर इस मुद्दे का कोई खास असर आम लोगों पर नहीं पड़ेगा और इस विवाद का राजनीतिक फायदा विपक्ष की बजाए सत्ता पक्ष को भी मिल सकता है.