27 साल पहले की बात है. 23-24 फरवरी 1991 की रात चौथी राजपूताना राइफल्स और अड़सठवीं माउंटेन ब्रिगेड ने कश्मीर घाटी के कुपवाड़ा जिले में पड़ने वाले कुनन और पोशपोरा नाम के दो नज़दीकी गांवों में सर्च एंड कॉर्डन ऑपरेशन शुरू किया. सर्च एंड कॉर्डन को ऐसे समझा जा सकता है कि सुरक्षा बलों की एक टुकड़ी गांव को घेर लेती है और घोषणा करती है कि गांव के सारे पुरुष एक मैदान में इकट्ठा हो जाएं. इस मैदान में इन पुरुषों को सेना की गाड़ी में चेहरा छुपाए बैठे एक ‘कैट’ या मुखबिर की नज़रों के सामने से गुज़रना होता है. यह मुखबिर हर आदमी को गौर से देखता है और शिनाख्त करता है कि वह उग्रवादियों से मिला हुआ है या नहीं. अगर उसे किसी पर शक होता है तो वह गाड़ी का हॉर्न बजा देता है. इस दौरान घरों की तलाशी भी ली जाती है. 90 के दशक में इन अभियानों के दौरान कई बार यातना और बलात्कार की खबरें भी आती रही थीं.

23-24 फरवरी 1991 की रात कुनन और पोशपोरा गांव में क्या हुआ, इस पर तमाम बातें हुईं. जांच कमेटियां बैठाई गईं. केस हुआ, उसे बेबुनियाद मानकर बंद कर दिया गया. दिल्ली के निर्भया के बलात्कार के विरोध में हुए प्रदर्शनों के बाद 2013 में, कश्मीरी महिलाओं की मांग पर इसे एक बार फिर से खोला गया.

उस रात कुनन और पोशपोरा में क्या हुआ था इसे लेकर सबके अलग-अलग संस्करण हैं. आइए पढ़ते हैं एक ऐसी महिला का बयान जो कथित तौर पर उस हादसे का शिकार हुई थी जिसे कुनन पोशपोरा सामूहिक बलात्कार के नाम से जाना जाता है. इस बयान को ‘डू यू रिमेंबर कुनन पोशपोरा’ नाम की एक किताब में दर्ज़ किया गया है. इस किताब को पांच कश्मीरी लड़कियों, एसार बतूल, इफरा बट, समरीना मुश्ताक, मुंज़ा राशिद और नताशा रातहर ने लिखने का फैसला किया जब वे जम्मू-कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसाइटीज़ के लिए जम्मू कश्मीर में यौन हिंंसा और इम्प्युनिटी पर काम कर रही थीं. कुनन पोशपोरा हादसे के बारे में जानने के बाद इन लड़कियों ने दोनों गांवों की महिलाओं से मिलकर उनकी पीड़ा और संघर्ष को किताब की शक्ल में लिखा. इस किताब को लाड़ली पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है.

‘डू यू रिमेंबर कुनन पोशपोरा’ में इस लड़की का नाम बदलकर दुर्री रख दिया गया है. किताब में दुर्री बताती है कि वह कुनन गांव में अपने दादा, पिता, मां, बहन फातिमा और भाई हुसैन के साथ रहती थी. दुर्री के मुताबिक उसके चाचा मुहम्मद इकबाल को छोड़कर उसके परिवार में सभी लोग शांति में विश्वास रखने वालों में से थे. चाचा के श्रीनगर में हुई एक मुठभेड़ में मारे जाने के बाद से उसके परिवार की जिंदगी बदल गई. इसके बाद से जब भी उसके इलाके में सुरक्षा बलों का कोई अभियान चलता तो उसके ‘परिवार के साथ उन परिवारों से ज़्यादा खौफ़नाक तरीके से पेश आया जाता था, जिनका रज़िस्टेंस से कोई लेना देना नहीं था.’

किताब के मुताबिक 23-24 फरवरी 1991 की रात को सुरक्षा बलों के जवान कई और घरों के के साथ-साथ दुर्री के घर पर भी गये थे. उस वक्त करीब 19 साल की रही दुर्री के घर पर उसके परिवार वालों के अलावा पोशपोरा गांव की रहने वाली उसकी सहेली अमीना भी थी. अपने दरवाजे पर उस रात होने वाली तेज दस्तक से आगे का किस्सा दुर्री कुछ इस तरह से सुनाती है:

‘मैंने और मेरी बहन ने कांगड़ी को और कसकर पकड़ लिया. हम दोनों उस दस्तक से डरे हुए थे. लग रहा था जैसे कोई हमारे घर का दरवाज़ा तोड़ डालना चाहता है. मेरे दादाजी ने जल्दी से उठकर दरवाज़ा खोला. मैंने कुछ लफ़्ज़ सुने, ‘कितने आदमी हो घर में?’ ‘कोई नहीं साहिब बस मैं हूं.’ मैंने खड़े होने की कोशिश की. मुझे अमीना ने रोक लिया. मैंने और ध्यान से सुनने की कोशिश की. अमीना और फातिमा भी वही कर रहे थे. इस सब के बीच मुझे एक औरत की आवाज़ सुनाई दी. मेरी मां किसी से मिन्नतें कर रही थी. तभीटोथ (दुर्री के दादाजी) चीखे, ‘हा खुदायो’.

पलक झपकते ही सेना का एक जवान हमारे सामने था. उससे बहुत बुरी बदबू आ रही थी. मैंने देखा उसके हाथ में शराब की बोतल थी. मेरा गला सूख गया, मैं चीख भी नहीं सकी, ना ही खड़ी हो सकी. ऐसा लग रहा था जैसे ज़मीन ने मुझे जकड़ लिया हो. फातिमा और अमीना ने मुझे दोनों तरफ से पकड़ रखा था. कुछ देर में वहां और जवान चले आए, वो एक से छह हो गए. मैं चिल्लाना चाहती थी. मुझे अब दादाजी की आवाज़ भी नहीं सुनाई दे रही थी. मुझे नहीं पता था कि वो मेरी मां को कहां ले गए. उनमें से एक ने मेरे बाल पकड़ लिए. मैंने उसके पांव पकड़ लिए. गिड़गिड़ाई, ‘खुदा के लिए हमें छोड़ दो. हमने कुछ नहीं किया.’ मैंने अपना सर उनके जूतों में झुका दिया. मेरी मां भी वहीं आ गई थी. मैं अपनी पूरी ताकत से चिल्लाई, ‘मौजी मे बचाय ती’ (मां मुझे बचा लो.) वो कैसे बचाती? मैं वो बताना भी नहीं चाहती जो मैंने उसके साथ होते हुए देखा. मेरा फिरन टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया, और उसके साथ मेरी सारी ज़िंदगी भी.

जब मैं होश में आई तो मेरा सिर एकदम खाली था और बदन सुन्न. मेरा चेहरा गीला था. मैंने महसूस किया कि मैं रो रही थी. सिर्फ मेरा बदन ही नहीं मेरी आत्मा भी नंगा महसूस कर रही थी. मां भी उसी कमरे में थी. वो बेहोश थी या बेहोश होने का नाटक कर रही थी. उसका चेहरा मेरी तरफ नहीं था. मैंने किसी को रोते हुए सुना. ये मेरा भाई था, उसने मुझे किसी चीज़ से ढक दिया. मुझे अब याद भी नहीं है कि वो क्या था. मैंने आज तक उससे पूछा भी नहीं है. हमने उस रात के बारे में कभी बात नहीं की. पर मुझे याद है कि मैं अपने शरीर के निचले हिस्से को महसूस नहीं कर पा रही थी.

अब वही एक रात मेरी ज़िंदगी बन गई है. कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या करती हूं, कहां जाती हूं, क्या सोचती हूं. वो रात मेरा पीछा नहीं छोड़ती. चाहे मैं नमाज़ पढ़ूं, खाना बनाऊं या खुद को साफ करूं, वो रात हमेशा मेरे साथ होती है. मैं हमेशा उन्हें कोसती रहती हूं, और ज़िंदगी भर कोसती रहूंगी. लोग मुझे सांत्वना देते हैं. कहते हैं कि तुम्हें इसे भूल कर आगे बढ़ जाना चाहिए. पर कहना आसान है, करना नहीं. ये ऐसा है जैसे आप अपनी आंखें खो दो और मान लो कि आंखें कभी थी ही नहीं.

मैंने पुलिस को बयान नहीं दिया. मेरे परिवार को डर था कि कोई मुझसे शादी नहीं करेगा. मैंने कभी शादी नहीं की. ऐसा नहीं है कि मैं शादी नहीं करना चाहती थी. पर मेरी सेहत ने मुझे ऐसा नहीं करने दिया. मैं शादी के लायक नहीं हूं और मैं किसी की ज़िंदगी तबाह नहीं करना चाहती. और इसके अलावा जब मैंने देखा कि मेरे गांव की लड़कियों से उनके ससुराल वाले कैसे पेश आ रहे हैं तो मैंने शादी न करने का फैसला लिया. हमने अमीना से हुए रेप के बारे में किसी को नहीं बताया. उस रात के बाद जब हम मिले तो हम खूब रोए. हम आज भी दोस्त हैं, पर हमारे बीच एक अनकहा करार है कि उस रात के बारे में किसी से बात नहीं करनी. मैं कुनन और पोशपोरा की बलात्कार पीड़िता हूं. मैं सांस लेती हूं पर ज़िंदा नहीं हूं.’

ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के मुताबिक कुनन गांव के प्रधान और अन्य लोगों का कहना था कि उन्होंने 27 फरवरी 1991 को इन बलात्कारों के बारे में सेना को खबर दी थी. लेकिन अधिकारियों ने आरोप को नकार दिया और इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई. गांव पहुंचे एक स्थानीय न्यायाधीश ने कमिश्नर से जांच की दरख्वास्त की. लेकिन उन्हें भी यही बताया गया कि दिल्ली में बैठे अधिकारियों ने राज्य के अधिकारियों से कोई पूछताछ किए बिना ही आरोपों को नकार दिया है. इसके बाद एक पुलिस जांच का आदेश दिया गया जो इसलिए शुरू नहीं हो सकी कि जिस पुलिस ऑफिसर को यह जांच करनी थी वह पहले छुट्टी पर था और बाद में उसे ट्रांसफर कर दिया गया.

सरकारी जांच की आलोचना होने के बाद सेना के कहने पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस मामले की जांच की. काउंसिल की कमेटी घटना के तीन महीने से ज़्यादा समय बाद गांव पहुंची. कथित पीड़िताओं का इंटरव्यू करने के बाद कमेटी ने बलात्कार के आरोपों को निराधार बताया. कारण यह दिया गया कि पीड़ित महिलाओं की संख्या लगातार बदल रही थी. घटना के तीन हफ्ते बाद 32 महिलाओं पर किए मेडिकल टेस्ट में अविवाहित महिलाओं की हाइमन नष्ट होने की पुष्टि हुई थी, लेकिन कमेटी ने इसे सबूत मानने से इनकार कर दिया.

2013 में जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर मांग की गई कि इस मामले की दोबारा जांच की जाए और पीड़ितों को मुआवज़ा भी दिया जाये. इसके बाद हाई कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार को पीड़ितों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया. चार दिसंबर 2017 को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अपील की. सरकार के वकील शोएब आलम ने तर्क दिया कि पीड़िताओं को सीआरपीसी की धारा 545ए के तहत मुआवज़ा इसलिए नहीं दिया जा सकता क्योंकि इस धारा को इस मामले से बहुत बाद में जोड़ा गया था. इसके अलावा राज्य सरकार का यह भी तर्क है कि अारोप सेना के खिलाफ हैं तो राज्य सरकार को मुआवज़े का निर्देश देना सही नहीं है.

देश के न्यायालय द्वारा पीड़िताओं को मुआवज़ा देने का मतलब है कि उनके खिलाफ हुए अपराध को संज्ञान में लिया गया है. इसके बावजूद यह दुखद है कि एक भयावह घटना के 27 साल बाद भी उसके पीड़ितों को न्याय नहीं मिल सका है. 2013 में अपने कश्मीर दौरे के दौरान कुनन पोशपोरा मामले के बारे में पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा था, ‘मैं शर्मिंदा हूं कि मेरे देश में ऐसी घटना हुई है.’ लेकिन उसके बाद भी पांच साल और गुज़र चुके हैं, इस मामले कि छह कथित पीड़िताएं दुनिया से कूच कर चुकी हैं, अखबार उस काली रात की 27वीं बरसी मना रहे हैं, घाटी में फिर से बर्फ गिरने का अनुमान जारी किया जा चुका है और इंसाफ का मसला जहां था वहीं अटका पड़ा है.