मातृभाषा दिवस पर भाषाओं के ख़त्म होने पर फिर से चिंता जताई जा रही है. गणेश देवी जैसे विद्वान पिछले लंबे वक्त से भारत की बोलियों भाषाओं के ख़त्म होने पर बोलते लिखते रहे हैं. यह चिंता विश्वव्यापी है और इसी समस्या पर लोगों का ध्यान खींचने के लिए ही विश्व मातृभाषा दिवस का आयोजन करने का फ़ैसला किया गया.

लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी उठता है कि भाषाओं को बचाया क्यों जाए. मान लें कि बहुत सारी भाषाएं ख़त्म हो जाएं तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ेगा? लोग आख़िरकार कोई भाषा तो बोलेंगे ही, तो लोग कोई भी भाषा बोलें तो इसमें क्या नुक़सान है. क्या मातृभाषा के प्रति मोह सिर्फ भावुकता का सवाल है, या भाषाओं के ख़त्म होने से सचमुच कुछ नुक़सान है? हमें इन सवालों के जवाब भी देने होंगे.

काफी वक्त पहले मार्क्सवाद में भाषा को लेकर कोई बहुत चिंतन उपलब्ध नहीं था. तब आम तौर पर भाषा के सवाल पर जोसेफ़ स्टालिन की एक छोटा सी किताब ही संदर्भ के लिए इस्तेमाल होती थी. ‘भाषाओं के सवाल पर’ नाम की यह किताब प्रश्नोत्तर रूप में थी. दरअसल यह तत्कालीन सोवियत संघ में अनेक भाषाओं के होने से पैदा होने वाली समस्याओं पर स्टालिन से पूछे गए कुछ नौजवानों के प्रश्नों और उनके उत्तरों पर आधारित थी. संक्षेप में इस किताब में स्टालिन का तर्क यह था कि बहुत सारी भाषाओं की मौजूदगी समाज के अविकसित होने का लक्षण है, जैसे जैसे समाज विकास करेगा तो तमाम भाषाएं ख़त्म हो जाएंगी और सारे समाज में एक ही भाषा रहेगी.

सौभाग्य से स्टालिन की भविष्यवाणी सही नहीं साबित हुई, और बाद में मार्क्सवाद में भी भाषा के सवाल पर ज्यादा गंभीर और सार्थक चिंतन हुआ. लेकिन स्टालिन का विचार सिर्फ़ तत्कालीन मार्क्सवादी विचार नहीं, बल्कि तमाम एकाधिकारवादी विचारधाराओं का प्रतिनिधि माना जा सकता है. एकाधिकारवादी विचारधाराएं यह मानती हैं कि देश या दुनिया के विकास की एक ही सही धारा है,और समाज जैसे जैसे विकसित होगा तो बाक़ी सारी धाराओं को नष्ट हो जाना होगा. यह अर्थव्यवस्था के बारे में भी सही है, संस्कृति के बारे में भी, और भाषाओं के बारे में भी. इसी विचार की तार्किक परिणति यह है कि तमाम वैकल्पिक धाराएं समाज के सही विकास में बाधक हैं इसलिए उन्हें ख़त्म कर देना चाहिए. एकाधिकारवादी सत्ताएं या शासक अपनी समझ से इसलिए ही विरोधी विचारों और ताक़तों को कुचलने को समाज के प्रति उपकार मानते हैं.

अब इसी संदर्भ में एक दूसरा प्रसंग. बहुत साल पहले मैं एक नामी कृषि वैज्ञानिक से बात कर रहा था जो भारत में चावल की हज़ारों प्रजातियों की जगह दो तीन ज्यादा उपज देने वाली प्रजातियों के बोए जाने पर चिंता व्यक्त कर रहे थे. मैंने उनसे पूछा - लेकिन इससे क्या नुक़सान होगा. उन्होंने कहा - अकाल पड़ सकता है. मान लो कोई ऐसा वाइरस आता है जो एक दो प्रजातियों पर हमला करता है, तो देश की ज़्यादातर फ़सल चौपट हो जाएगी, लेकिन अगर हमारे पास बहुत सारी प्रजातियां होंगी तो कई सारी प्रजातियां बच जाएंगी.

दुनिया में जो प्रजातियों की बहुलता और विविधता है, वह प्रकृति की झख या फ़िज़ूलख़र्ची नहीं है, बल्कि वह जीवन के बने रहने की युक्ति है. जब बहुत सारी प्रजातियां होंगी तो उनके आपसी रिश्तों से नई प्रजातियां बनेंगी जो पिछली प्रजातियों के जीन्स में संचित अनुभवों के सहारे और ज्यादा बेहतर बनेंगी. अगर एक जैसी जेनेटिक संरचना के जीव मिलेंगे तो अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी की प्रतिलिपि होगी, उसमें कोई बेहतरी या नयापन नहीं होगा. अगर अलग अलग जेनेटिक संरचनाएं मिलेंगी तो वह नया सृजन होगा. प्रकृति में बने रहने की शर्त सृजन और रचनाशीलता है.

यानी विविधता का कम होना सृजन की संभावनाओं का कम होना और प्रकारांतर से जीवन की संभावनाओं का घट जाना है. दूसरे, जीवन के सारे रूप परस्पर जुड़े हुए हैं, इसलिए एक रूप का चले जाना दूसरे को भी नुक़सान पहुंचा सकता है. मसलन, हमारे अपने शरीर में हमारी अपनी कोशिकाओं से दस गुना ज्यादा सूक्ष्म जीव रहते हैं. अगर हमारे हमारे शरीर से सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाएं तो हमारे अपने अस्तित्व का सिर्फ़ दसवां हिस्सा बचेगा.

जो बात जीवशास्त्र में सच है वही समाज, संस्कृति और भाषाओं के बारे में भी सच है. दुनिया की सारी भाषाएं और संस्कृतियां एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और वे एक दूसरे से ही जीवनीशक्ति प्राप्त करती हैं. अगर इस जटिल सांस्कृतिक पर्यावरण के किसी भी हिस्से को नुक़सान पहुंचा तो उसका परिणाम समूचे पर्यावरण और मानवीय रचनाशीलता पर पड़ सकता है.

अक्सर बहुलता के इस महत्व को कई बहुत प्रतिभाशाली मस्तिष्क भी नहीं समझ पाए. महापंडित राहुल सांकृत्यायन अपनी किताब बाईसवीं सदी में एक ऐसे आदर्श समाज का चित्रण करते हैं जिसमें सारी दुनिया में एक जैसी संस्कृति होगी और एक ही भाषा बोली जाएगी. ऐसी स्थिति का भयावह रूप एल्डस हक्सले के उपन्यास ब्रेव न्यू वर्ल्ड और जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास 1984 में मिलता है. ऑरवेल के उपन्यास में ऐसा समाज है जिसमें एक ही भाषा न्यूस्पीक बोली जाती है जिसमें सीमित शब्द हैं और हर शब्द का एक ही अर्थ है जो शासक व्यवस्था ने तय कर रखा है. इस तरह शासक यह सुनिश्चित करते हैं कि लोग वही सोचें और समझें जो शासक चाहते हैं और कोई अलग, मौलिक या विद्रोही बात न सोच पाएं. हमारी भाषाएं हमारी मौलिकता, रचनात्मकता और स्वतंत्रता का आधार हैं, वे किसी वैचारिक और भावनात्मक अकाल की आशंका के ख़िलाफ़ हमारा बचाव हैं.