महात्मा गांधी की हत्या के संदर्भ में विनायक दामोदर सावरकर की अप्रत्यक्ष भूमिका कुछ हद तक साबित होने की छाया हम सबके मन पर बहुत गहरी है. इतनी गहरी कि गांधी और सावरकर-बंधुओं के बीच के लंबे संबंधों के दूसरे आयामों को देखने-समझने की कोशिश कम ही होती है. जबकि एक सच्चाई यह भी है कि महात्मा गांधी और सावरकर-बंधुओं का परिचय बहुत पुराना था. सावरकर-बंधुओं के व्यक्तित्व के कई पहलुओं से प्रभावित होने वालों और उन्हें ‘वीर’ कहने और मानने वालों में गांधी भी थे.

महात्मा गांधी और विनायकराव सावरकर के बड़े भाई नारायणराव सावरकर की शुरुआती मुलाकात लंदन में 24 अक्टूबर 1909 को हुई थी. उस दिन विजयादशमी थी. तब लंदन में रहने वाले भारतीय पारसी, मुसलमान और हिंदू अपने-अपने त्यौहारों के अवसर पर कार्यक्रमों का आयोजन करते थे. वे दूसरे धर्मों के लोगों को भी अतिथि के रूप में बुलाते थे. उस साल कुछ उत्साही हिंदुओं ने वहां विजयादशमी के दिन एक भोज का आयोजन किया था. कार्यक्रम में शामिल होने के लिए टिकट रखी गई थी और टिकट की कीमत थी चार शिलिंग. मोहनदास गांधी ने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की थी. स्वयं महात्मा गांधी के शब्दों में ‘इस कार्यक्रम में नारायणराव सावरकर ने रामायण की महत्ता पर बहुत ही जोशीला भाषण दिया था.’ इस कार्यक्रम में हुसैन दाउद और हाजी हबीब नाम के दो मुस्लिम भाई भी अतिथि के रूप में शामिल हुए थे.

इसके बाद गांधी और नारायणराव सावरकर की मुलाकात लंदन में होती रही थी और चर्चा प्रायः रामायण, महाभारत और गीता के वास्तविक निहितार्थों पर होती थी. गीता में वर्णित युद्ध और हिंसा संबंधी प्रश्न पर सावरकर और गांधी के गहरे मतभेद थे. सावरकर इसे सचमुच के युद्ध के रूप में देखते थे, जबकि गांधी इसे केवल एक रूपक या दृष्टान्त के अर्थ में लेते थे. वे मानते थे कि यह मनुष्य के भीतर चल रही दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियों के युद्ध का चित्रणमात्र है.

1926 में जब गांधी गीता पर अपना भाष्य लिख रहे थे, तो चार मार्च, 1926 को उन्होंने लिखा- ‘मैं लंदन में अनेक क्रांतिवादियों से विचार-विनिमय करता था. श्यामजी कृष्ण वर्मा और सावरकर आदि मुझसे कहा करते थे कि आपका कथन गीता और रामायण के कथन के विरुद्ध ही है. उस समय मुझे ऐसा लगता था कि यदि व्यास मुनि ने ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने के लिए ऐसे युद्ध के दृष्टान्त की योजना न की होती तो कितना अच्छा होता! क्योंकि जब अच्छे-अच्छे विद्वान और गहराई से विचार करने वाले व्यक्ति ही भग्वद्गीता का ऐसा अर्थ निकालते हैं, तो साधारण आदमी के विषय में क्या कहा जा सकता है.’

बाद में, नारायणराव सावरकर के दोनों छोटे भाई गणेश और विनायक सावरकर भी लंदन पहुंचे और उन पर भी गीता और महाभारत की उनकी ‘युद्धवादी’ समझ ही हावी रही. 1909 में ही जब मदनलाल ढींगरा ने लंदन में कर्नज वॉयली की सरेआम गोली मारकर हत्या की थी, तो इसके पीछे दोनों छोटे सावरकर-बंधुओं की प्रेरणा तय मानी जा रही थी. सावरकर ने इस हत्या के बाद भी ढींगरा के समर्थन में व्यापक राजनीतिक गोलबंदी भी की थी. जबकि गांधी ने उस समय कड़े शब्दों में लिखा था कि दंड ढींगरा को नहीं बल्कि उसे सिखानेवाले को दिया जाना चाहिए. गांधी के शब्द थे - ‘(हत्यारे) की सफाई निकम्मी है. यह काम हमारे विचार से कायरता का है. फिर भी उसके ऊपर तो दया ही आती है. उसने निकम्मा साहित्य ऊपर-ऊपर से पढ़कर यह काम किया है. उसने अपने बचाव का बयान भी रट रखा था, ऐसा जान पड़ता है. दंड तो उसको सिखाने वाले को देना चाहिए. मैं उसको निर्दोष मानता हूं. हत्या नशे में किया गया कार्य है. नशा केवल शराब या भांग का ही नहीं होता, किसी पागलपन भरे विचार का भी हो सकता है.’

अब यह स्पष्ट नहीं है कि गांधी ने ढींगरा को सिखानेवाले के रूप में सावरकर-बंधुओं की पहचान की थी या नहीं. क्योंकि उस घटना के बाद भी गांधी न सिर्फ नारायण सावरकर की प्रतिभा से प्रभावित रहे, बल्कि दोनों गणेश और विनायक सावरकर को बचाने के प्रयास में भी लगे. गांधी के स्वभाव की एक अद्भुत खासियत थी कि तमाम मतभेदों के बावजूद वे अपने विरोधियों से भी संवाद में रहना चाहते थे. सावरकर-बंधुओं के साथ भी शुरू से उन्होंने वही रवैया अपना रखा था. वे चाहते थे कि सावरकर-बंधुओं की ऊर्जा को यदि अहिंसक प्रतिरोध की दिशा में मोड़ा जा सके, तो भारत के स्वतंत्रता-आंदोलन को अच्छे नेता मिल सकते हैं. प्रतिभाशाली और नेतृत्वशाली व्यक्तियों की पहचान कर उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल करने की भावना उनमें हमेशा से रही थी और सावरकर-बंधुओं के प्रति भी वे ऐसा ही दृष्टिकोण रखते थे.

इसलिए जब गणेश और विनायक सावरकर-बंधुओं की गिरफ़्तारी हुई और आजीवन कालापानी की सजा हुई, तो उन्हें बचाने के लिए सबसे पहले आगे आने वालों में महात्मा गांधी ही थे. 1920 में जब गांधी पूरे भारत में असहयोग आंदोलन की लहर पैदा कर चुके थे और ब्रिटिश सरकार उनकी बात को गंभीरता से लेने लगी थी. उसी दौरान गणेश और विनायक सावरकर के बड़े भाई नारायणराव सावरकर को अपने पुराने परिचित महात्मा गांधी से उम्मीद हो चली कि यदि गांधी कोशिश करें तो सावरकर-बंधुओं की सजा में रियायत हो सकती है. अहिंसा के व्रती होने के बावजूद गांधी सार्वजनिक रूप से यह चाहने लगे थे कि क्रांतिकारियों के साथ भी यथासंभव राजनीतिक कैदी की तरह ही व्यवहार हो. उस दौरान ऐसे कुछ पुराने क्रांतिवादियों की रिहाई भी हो रही थी.

18 जनवरी, 1920 को डॉ नारायणराव सावरकर ने महात्मा गांधी को पत्र में लिखा- ‘...कल मुझे भारत सरकार द्वारा सूचित किया गया कि (कालापानी से) रिहा किए जाने वाले लोगों में सावरकर बंधु शामिल नहीं हैं. ...कृपया मुझे बताएं कि इस मामले में क्या करना चाहिए. मेरे दोनों भाई अंडमान में दस वर्ष से ऊपर कठिन सजा भोग चुके हैं, और उनका स्वास्थ्य बिल्कुल चौपट हो चुका है. उनका वजन 118 पौंड से घटकर 95-100 पौंड रह गया है. ...यदि भारत की किसी अच्छी आबोहवा वाली जेल में भी उनका तबादला कर दिया जाए तो गनीमत हो. मुझे आशा है कि आप सूचित करेंगे कि आप इस मामले में क्या करने जा रहे हैं.’

इस पत्र के जवाब में 25 जनवरी, 1920 को लाहौर से लिखे अपने पत्र में गांधी कहते हैं - ‘प्रिय डॉ सावरकर, आपको परामर्श देना कठिन कार्य है. तथापि मेरा सुझाव है कि आप एक संक्षिप्त याचिका तैयार करें ताकि यह बिल्कुल स्पष्ट रूप से उभर आए कि आपके भाईसाहब ने जो अपराध किया था, उसका स्वरूप बिल्कुल राजनीतिक था. मैं यह सुझाव इसलिए दे रहा हूं कि तब जनता का ध्यान उस ओर केन्द्रित करना संभव हो जाएगा. इस बीच, जैसा कि मैं अपने एक पहले पत्र में कह चुका हूं, मैं अपने ढंग से इस मामले में कदम उठा रहा हूं.’

गांधीजी द्वारा डॉ सावरकर को लिखा गया पहला पत्र उपलब्ध नहीं है. लेकिन आगामी घटनाओं से यह स्पष्ट हो गया कि गांधी सावरकर बंधुओं की रिहाई को लेकर गंभीर थे और खुलकर प्रयासरत थे. 18 मई, 1921 को ‘यंग इंडिया’ में गांधी लिखते हैं- ‘...सावरकर बंधुओं के बारे में लिखने का मेरा उद्देश्य सरकारी फैसले को प्रभावित करना नहीं, बल्कि जनता को असहयोग के लिए उत्साहित करना ही हो सकता है.

...सावरकर-बंधुओं की प्रतिभा का उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए. अगर भारत इसी तरह सोया पड़ा रहा, तो मुझे डर है कि उसके ये दो निष्ठावान पुत्र सदा के लिए हाथ से चले जाएंगे. एक सावरकर भाई को मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूं. मुझे लंदन में उनसे भेंट का सौभाग्य मिला है. वे बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं. वे क्रांतिकारी हैं और इसे छिपाते नहीं हैं. मौजूदा शासन-प्रणाली की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने बहुत पहले, मुझसे भी काफी पहले देख लिया था. आज भारत को, अपने देश को दिलोजान से प्यार करने के अपराध में वे कालापानी भोग रहे हैं. अगर सच्ची और न्यायी सरकार होती तो वे किसी ऊंचे शासकीय पद को सुशोभित कर रहे होते. मुझे उनके और उनके भाई के लिए बड़ा दुःख है. ...सावरकर बंधुओं की और जेल की सजा भोग रहे दूसरे लोगों की रिहाई में जिनकी दिलचस्पी है, ...उन सभी को स्वराज्य का दिन नजदीक लाने के लिए असहयोग कार्यक्रम को जल्दी से जल्दी पूरा करने में जुट जाना चाहिए.’

1921 में ‘कैपिटल’ नाम के अखबार के डिचर नाम के पत्रकार ने आरोप लगाया कि सावरकर बंधुओं ने जेल में वायरलेस का उपयोग करके षड्यंत्र रचा है. महात्मा गांधी ने इस बात के लिए अखबार की आलोचना करते हुए 29 जून, 1921 को ‘यंग इंडिया’ लिखा था - ‘उसने सारी बात का ऐसे विस्तार के साथ वर्णन किया है मानो अधिकारियों ने उसे उसे अंश को लिखने के लिए विशेष रूप से प्रेरित किया हो. ...वह जिस रूप में पेश किया गया है उससे जान पड़ता है मानो आरोप सच्चा है और इससे अवश्य ही जनता की निगाह में दोनों बंधुओं की प्रतिष्ठा की हानि हुई होगी. ...उनका (सावरकर बंधुओं का) दावा है कि वे बिल्कुल निर्दोष हैं तथा उनके पास संबंधित समाचार-पत्र के विरुद्ध कार्रवाई करने का स्पष्ट आधार भी है.’

गांधीजी ने आगे लिखा- ‘बहरहाल जो भी हो, डॉ सावरकर (नारायणराव) ने मुझे सूचित किया है कि ऐसी सजाओं में आम तौर से जितने दिनों की माफी दी जाती है, अगर उन्हें भी गिना जाए, तो उन दोनों भाइयों में से श्री गणेश सावरकर तो 14 साल दो मास की सजा भुगत चुके हैं, अतः कानूनन उन्हें रिहाई का अधिकार प्राप्त है. ...चूंकि दोनों भाई अंडमान से हटा दिए गए हैं, अतः भारतीय दंड संहिता की धारा 55 उनके पक्ष में लागू की जानी चाहिए और उन्हें चौदह साल से अधिक समय तक बंदी नहीं रखा जाना चाहिए.’

हालांकि इसके बाद कैपिटल अखबार के संपादक ने इसके लिए माफी मांग ली थी और गांधीजी ने 28 जुलाई, 1921 को ‘यंग इंडिया’ में लिखा था- ‘इस मामले में इन हानिकर आरोपों के शिकार संयोग से दो सभ्य और वीर भारतीय हैं, और आरोपकर्ता एक यूरोपीय पत्रकार है. ...श्री गणेश सावरकर ने अपने सम्मान पर लगाए गए इन दूषित आरोपों पर (पत्रकार और संपादक द्वारा) क्षमा-याचना कर लेने मात्र से संतोष कर लिया है और मुकदमा चलाने का अपना अधिकार उदारतापूर्वक छोड़ दिया है. ऐसा करके वे देश के लोगों की दृष्टि में और भी ऊंचे उठ गए हैं.’

गांधी और विनायक सावरकर के संबंधों में एक मार्च, 1927 का दिन बहुत महत्वपूर्ण माना जा सकता है. तब रत्नागिरी में अपने भाषण के दौरान उन्होंने सावरकर के बारे में बहुत ही मार्मिक शब्द कहे थे क्योंकि उस समय सावरकर को इस शर्त पर रिहा गया था कि वे 1924 से 1929 के बीच पांच वर्षों तक रत्नागिरी जिले से बाहर नहीं जाएंगे और न ही किसी राजनीतिक क्रियाकलाप में भाग लेंगे. उस दिन महात्मा गांधी पैदल चलकर सावरकर के आवास पर उनसे मिलने गए थे. सावरकर उस दिन बीमार थे. उन्होंने गांधीजी से अपना अस्पृश्यता और शुद्धि (यह आज के ‘घर-वापसी’ जैसा ही अभियान था) संबंधी रुख स्पष्ट करने को कहा. गांधीजी ने इन प्रश्नों पर कुछ भ्रामक बातों का स्पष्टीकरण किया और कहा-

‘हम आज लंबी बातचीत नहीं कर सकते, परंतु आप जानते ही हैं कि सत्यप्रेमी तथा सत्य के लिए प्राण तक न्यौछावर कर सकने वाले व्यक्ति के रूप में आपके लिए मेरे मन में कितना आदर है. इसके अलावा हम दोनों का ध्येय भी एक है और मैं चाहूंगा कि उन सभी बातों के संबंध में आप मुझसे पत्र व्यवहार करें जिनमें आपका मुझसे मतभेद है. और दूसरी बातों के बारे में भी लिखें. मैं जानता हूं कि आप रत्नागिरी से बाहर नहीं जा सकते, इसलिए यदि जरूरी हो तो इन बातों पर जी भरकर बातचीत करने के लिए मुझे दो-तीन दिन का समय निकालकर आपके पास आकर रहना भी नहीं अखरेगा.’

सावरकर ने इसके लिए धन्यवाद देते हुए कहा- ‘आप स्वतंत्र हैं और मैं बंधन में हूं. मैं आपको भी अपनी जैसी हालत में नहीं डालना चाहता. फिर भी मैं आपसे पत्र-व्यवहार अवश्य करूंगा.’ गांधी और सावरकर के बीच की यह बातचीत 17 मार्च, 1927 के ‘यंग इंडिया’ में छपी थी.

1933 में जब सावरकर ने रत्नागिरी में मंदिर प्रवेश आंदोलन किया और हरिजनों के लिए दो मंदिर खोलने का कार्यक्रम रखा तो उसी दौरान रत्नागिरी में अपने एक सहयोगी श्री जयकर को 25 फरवरी, 1933 को एक पत्र में गांधी लिखते हैं- ‘पता नहीं, उद्घाटन समारोह के बारे में लिखा मेरा पत्र आप विनायकराव तक पहुंचा सके थे या नहीं. उसने निश्चय ही रत्नागिरी में बहुत अच्छा सामाजिक कार्य किया है और आप उद्घाटन समारोह में जाने से असमर्थ रहे, इससे श्रीयुत किर को अवश्य ही बहुत गहरी निराशा हुई होगी.’

1937 में हिंदू महासभा के एक नेता नरसिंह चिंतामणि केलकर ने पूना की एक सभा में महात्मा गांधी पर आरोप लगाया कि सावरकर की रिहाई के लिए तैयार किए गए प्रार्थना-पत्र पर महात्मा गांधी ने हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था. गांधीजी के एक सहयोगी शंकर राव देव ने इस बात की जानकारी और इस समाचार की अखबारी कतरन गांधीजी को भेजी. 20 जुलाई, 1937 को गांधीजी ने शंकरराव को जवाबी चिट्ठी में लिखा -

‘श्री सावरकर की रिहाई के बारे में जो स्मारक-पत्र तैयार किया गया था, तो मैंने उस दस्तखत करने से मना कर दिया था, क्योंकि जो लोग उसे लेकर मेरे पास आए थे, मैंने उन्हें बताया था कि यह सर्वथा अनावश्यक है, क्योंकि नए कानून के अमल में आने के बाद श्री सावरकर की रिहाई तो हो ही जाएगी चाहे मंत्री कोई भी हो. और वही हुआ है. सावरकर-बंधु कम से कम यह तो जानते ही हैं कि हममें चाहे कुछ सिद्धातों को लेकर जो भी मतभेद रहे हों, लेकिन मेरी कभी भी यह इच्छा नहीं हो सकती थी कि वे जेल में ही पड़े रहें. जब मैं यह कहूंगा कि मेरी ताकत में जो कुछ भी था, वह सब मैंने उनकी रिहाई के लिए अपने ढंग से किया तो शायद डॉ सावरकर भी मेरी बात का अनुमोदन करेंगे. और बैरिस्टर (चिंतामणि केलकर) को शायद याद होगा कि जब पहली बार हम लंदन में मिले थे तब हमारे संबंध कितने मधुर थे. और कैसे जब कोई आगे नहीं आ रहा था, तब मैंने उस सभा की अध्यक्षता की थी जो उनके सम्मान में लंदन में हुई थी.’

1937 में सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष बन चुके थे और 1943 तक वे हिंदू महासभा का नेतृत्व करते रहे. आज हमें जानकर आश्चर्य हो, लेकिन 1939 में सावरकर और उनके सहयोगियों ने डॉ भीमराव अंबेडकर के साथ मिलकर एक सामूहिक वक्तव्य निकाला था कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग भारत की समस्त या अधिकांश जनता का भी प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, और सरकार तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच होनेवाले किसी भी संवैधानिक या प्रशासनिक समझौते को मानने के लिए भारतीय जनता बाध्य नहीं है.

इसी प्रसंग में 12 अक्तूबर, 1939 को हरिभाऊ फाटक को गांधी एक पत्र में लिखते हैं - ‘तात्या जी (सावरकर और केलकर दोनों को तात्या भी कहा जाता था) ने तुमसे जो कुछ कहा वह तो उनकी पुरानी शिकायत है. मुझमें घमंड नहीं है. इस विषय में मैं अपने को दोषी नहीं मानता. ...उनका तथा उनके दोस्तों का मन जीतने की मैंने बहुत कोशिश भी की है. सावरकर के घर मैं पैदल चल कर गया. उनका मन जीतने का मैंने विशेष रूप से प्रयास किया, किंतु असफल रहा. अब चूंकि तुमने मेरी बात सुन ली है, अब तुम्हीं मुझे बताओ कि उन लोगों को जीतने का मुझे कौन सा जतन करना चाहिए.’

महात्मा गांधी की स्थिति अजीब थी. वे एक बहुलतावादी भारत को बनाए रखना चाहते थे. जबकि सावरकर और जिन्ना अपनी-अपनी सांप्रदायिक सोच के साथ आगे बढ़ रहे थे. गांधी किसी भी तरह इन दोनों को मनाना चाहते थे. एक समय तो ऐसा भी आ गया था जब जस्टिस पार्टी, डॉ भीमराव अंबेडकर, मोहम्मद अली जिन्ना और विनायक दामोदर सावरकर ने एक साथ गठजोड़ कर एक कांग्रेस-विरोधी मोर्चा बनाने की पूरी तैयारी कर ली थी. 20 जनवरी, 1940 के ‘हरिजन’ में गांधीजी ने इस पर एकविनोदपूर्ण आलेख भी लिखा था.

1941 में बंगाल के मुस्लिम लीग मंत्रिमंडल द्वारा पेश किए गए दो विधेयकों के विरोध में हिन्दू महासभा ने कलकत्ता में सत्याग्रह करने का फैसला किया. कलकत्ता के हिंदू महासभा के एक नेता मनोरंजन चौधरी (जो पूर्व में कांग्रेस में थे) ने गांधीजी को सलाह दी कि वे हिंदू महासभा द्वारा प्रस्तावित इस सत्याग्रह को अपना नेतृत्व दें. एक फरवरी, 1941 को बहुत ही विनम्र भाषा में गांधी उन्हें चिट्ठी में लिखते हैं- ‘सत्याग्रह की अपनी मर्यादाएं हैं. और फिर हिंदू महासभा के बहुत ही कम सदस्य अहिंसा में आस्था रखते हैं. न तो श्री सावरकर न ही डॉ मुंजे और न ही भाई परमानंद अहिंसा में विश्वास करते हैं. इसमें उनका कोई दोष नहीं है. वे अपने स्वतंत्र विचार रखने के हकदार हैं. किन्तु वे सत्याग्रह आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर सकते. मेरे विचार में इतना तो वे स्वयं भी स्वीकार कर लेंगे.’

लेकिन उसी साल दिसंबर में जब बिहार सरकार ने हिंदू महासभा की सभा पर रोक लगा दी, तो गांधी ने इसे उनके लोकतांत्रिक अधिकार पर हमला करार देते हुए बिहार सरकार की कड़ी आलोचना की थी. 27 दिसंबर, 1941 को सावरकर के समर्थन में गांधीजी लिखते हैं- ‘समझौते की सारी कोशिशों के बेकार हो जाने के बाद दमन की शिकार हिन्दू महासभा के लिए सत्याग्रह ही एकमात्र रास्ता रह गया था. और मुझे स्वीकार करना चाहिए कि वीर सावरकर, डॉ मुंजे तथा अन्य नेताओं को गिरफ्तार होते देखकर मेरा मन खुशी से भर उठा है, क्योंकि उन्हें सिर्फ इसलिए गिरफ्तार किया गया है कि उन्होंने सार्वजनिक शांति को सुरक्षित रखने के लिए पूरी एहतियात बरतते हुए एक व्यवस्थित सभा करने के बहुत ही प्राथमिक और बुनियादी अधिकार पर आग्रह करने का प्रयत्न किया. ...बिहार सरकार की इस सर्वथा मनमानी कार्रवाई का शिष्ट और शांतिपूर्ण विरोध करने के लिए मैं सभा के नेताओं को बधाई देता हूं.’

जाहिर है गांधी चाहते थे कि महासभा और सावरकर जैसे इसके नेता भी गांधीजी के अहिंसक साधनों को पूरी तरह धारण करने का सलीका सीख जाएं, तो इससे अच्छा कुछ नहीं होगा. यही भावना उनकी मुस्लिम लीग के प्रति भी रहती थी. 19 जुलाई, 1942 को हरिजन में एक आलेख में वे लिखते हैं- ‘वीर सावरकर और कायदे-आजम जिन्ना से उचित क्षमा-याचना करते हुए कहूंगा कि मैं उन करोड़ों हिन्दुओं, मुसलमानों और गैर-हिन्दुओं की संयुक्त भावना का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता हूं जो अपने को भारतमाता की संतान कहते हैं. मैं इस देश के एक-एक आदमी की स्वतंत्रता के लिए जी रहा हूं और आशा करता हूं कि उसके लिए मरने की शक्ति भी मुझे प्राप्त होगी.’

आठ अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव करनेवाले लंबे और ऐतिहासिक भाषण में गांधीजी का यह स्वर और भी कड़ा हो चुका था, जब उन्होंने कहा- ‘कांग्रेस ऐसी लड़ाई में शामिल नहीं हो सकती जिसमें भाई भाई को मारे. हो सकता है डॉ मुंजे और श्री सावरकर की तरह तलवार के सिद्धांत को माननेवाले हिन्दू मुसलमानों को अपने अधीन रखना चाहें. मैं उस वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करता. मैं कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करता हूं.’

जब गांधीजी को विनायक सावरकर के बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर (राष्ट्रीय स्यवंसेवक संघ के सह-संस्थापकों में से एक) की मृत्यु का समाचार मिला, तो उन्होंने तुरंत विनायक सावरकर को चिट्ठी लिखी. 22 मार्च, 1945 को सावरकर को इस चिट्ठी में गांधी लिखते हैं- ‘भाई सावरकर, आपके भाई के कैलासवास के समाचार देखकर यह लिख रहा हूं. उनकी रिहाई के बारे में मैंने कुछ किया था, तबसे उनके बारे में मैं रस लेता ही गया. मृत्यु का शोक तुम्हारे सामने क्या करना था? हम तो मृत्यु के मुख में पड़े हैं ना. आशा करता हूं उनका परिवार ठीक होगा.’ इस तरह गांधीजी ने आखिर तक विनायक सावरकर से संवाद का प्रयास छोड़ा नहीं था. जबकि विनायक सावरकर की ओर से उन्हें शायद ही कभी कोई थोड़ी भी व्यक्तिगत आत्मीयता से भरी चिट्ठी मिली हो. सावरकर खुलकर सार्वजनिक मंचों पर गांधी की कटु आलोचना जरूर करते रहे.

आगे के इतिहास से हम सभी कमोबेश परिचित ही हैं. शुरू से अंत तक गांधी और सावरकर के वैचारिक मतभिन्नताओं के दुःखद अंतसे हमें कम से कम दो सीख अवश्य लेनी चाहिए. पहली यह कि संसार के सभी धर्मशास्त्रों या आध्यात्मिक ग्रंथों की आधी-अधूरी, संकीर्ण या सांप्रदायिक समझ हमारी हिंसावृत्ति को इतना बढ़ा सकती है कि वह हमारे दूसरे गुणों पर भारी पड़ जाती है. यदि यह सच है कि गांधी जी की हत्या में विनायक सावरकर ही मुख्य प्रेरणा थे, तो क्या यह माना जा सकता है कि रामायण, महाभारत और गीता में वर्णित ‘युद्ध के बारे में सावरकर-बंधुओं की समझ ने विनायक को गांधी के प्रतिहिंसा के लिए भी इतना प्रेरित कर दिया होगा कि उन्होंने अवश्य ही स्वयं को कृष्ण और नाथूराम गोडसे को अर्जुन की भूमिका में देखा हो? बहुत पहले गांधी और सावरकर-बंधुओं के बीच गीता में वर्णित युद्ध और हिंसा पर शुरू हुई मतभिन्नता की इतनी अप्रिय परिणति की कल्पना किसने की होगी!

और दूसरी सीख यह कि जब आपका कोई सुपरिचित व्यक्ति अचानक आपसे हर तरह का संवाद बंद कर दे या आपके बार-बार संवाद के आत्मीय प्रयासों के बावजूद कोई लगातार कोई जवाब न दे, तो समझना चाहिए कि उसके मन में कोई ऐसी ग्रंथि या कुंठा पल रही है, जो कभी भी अप्रिय या खतरनाक रूप ले सकती है. वहां पर ज्यादा शर्तरहित प्रेम से उसका हृदय छूनेका प्रयास करना चाहिए. और जब सबकुछ निष्फल रहे, तो उनके प्रति तमाम शुभकामनाएं रखते हुए और भय के बजाय सतर्कता बरतते हुए अप्रत्यक्ष रूप से एकदम निर्वैयक्तिक, व्यापक, विनम्र प्रबोधनकारी विमर्श का सहारा लेना चाहिए.

ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के नाम पर दल, संघ और सेना बनाकर आपस में लड़ने, द्वेष पालने या संवादहीनता को जन्म देने के बजाय बेहतर यह हो सकता है कि हम मनोवैज्ञानिक नजरिए से उनके जीवन को संपूर्णता में देखना-समझना शुरू करें. गांधी और सावरकर का संबंध भी ऐसा ही एक दुःखद, लेकिन सीखने का प्रसंग हो सकता है. नई पीढ़ियों को सांप्रदायिक हिंसा और विभाजन से बचाने का मार्ग खोल सकता है. इसके लिए हमें हमारी मौजूदा मनोग्रंथियों और प्रचलित नैरेटिव से आगे बढ़ने की जरूरत होगी.

अन्यथा हम ही में से कुछ लोग केवल राजनीतिक इस्तेमाल के लिए गांधीजी को आगे करते रहेंगे और कुछ दूसरे लोग सावरकर और गोडसे की पूजा करते रहेंगे. किसी भी समुदाय को ‘अन्य’ या ‘अदर’ का दर्जा देकर उससे शत्रुभाव पालने की प्रवृत्ति ने सावरकर और गोडसे से ऐसा कार्य करवाया. अब उसकी प्रतिक्रिया में एक नए प्रकार का रिवर्स अदरिज़्म या ‘प्रतिक्रियात्मक अन्यवाद’ जन्म ले चुका है. यह प्रवृत्ति सामने वाले से किसी भी प्रकार का संवाद करने के बजाए उसे ‘अन्य’ या ‘शत्रु’ या मूर्ख ठहराकर उसका उपहास करती है और इसके जवाब में सामने वाला भी ऐसा ही करता है. और इस तरह यह प्रक्रिया नाभिकीय श्रृंखला-अभिक्रिया की तरह अंतहीन रूप से चलती रहती है और हिंसा का कारण बनती है.

अभी गोडसे या सावरकर की पूजा करनेवालों की तादाद जितनी तेजी से बढ़ रही है, उसमें हमारे बच्चे ही तो शामिल हैं. हमें उन सबसे संवाद करने की,उन्हें गले लगाकर समझाने की जरूरत होगी.अभी चूंकि चारों ओर केवल चिढ़ाने, दुत्कारने, कोसने और मजाक उड़ाने का वातावरण हावी हो गया है, इसलिए हम कुछ भी समझने को तैयार ही नहीं हैं. कोई बताए कि अपने ही युवाओं और किशोरों से हृदयगत बातचीत और प्रबोधनकारी संवाद के अलावा हमारे पास दूसरा कौन सा प्रभावी विकल्प मौजूद है.कोई यह भी बताए कि यदि गोडसे के उस जानलेवा आक्रमण में गांधी जीवित बच जाते, तो गोडसे या सावरकर के प्रति उनका खुद का रवैया कैसा होता?