साल 2012 में मैं स्क्रीनराइटिंग की एक वर्कशॉप कर रही थी. इसी दौरान एक दिन लंच के बीच होती गपबाज़ी के सिलसिलों के बीच हमारे मेन्टॉर ने हमें एक क़िस्सा सुनाया. यह क़िस्सा श्रीदेवी से जुड़ा था, और उनके साथ-साथ राम गोपाल वर्मा (रामू) से भी. किसी फ़िल्म की स्क्रिप्ट लेकर हमारे मेंटॉर-राइटर, रामगोपाल वर्मा के साथ श्रीदेवी से मिलने उनके घर पहुंचे थे. लेकिन डिस्कशन के लिए श्री नहीं, बल्कि उनके पति बोनी कपूर ड्रॉइंग रूम में आए. इस मुलाकात के दौरान बहुत देर से इधर-उधर की बातें चल ही रही थीं कि अचानक बोनी कपूर ज़ोर से चिल्लाए. वे अपनी बीवी पर चिल्ला रहे थे कि आख़िर श्रीदेवी वहां पर खड़ी होकर क्या कर रही हैं? श्री ने जवाब में धीरे से कहा, ‘आप लोग चाय लेंगे या कॉफ़ी.’ फिर वे भीतर रसोई में चली गईं.

कुछ देर बाद रामू वापस अपने डेरे पर लौट आए. लेकिन हमें यह क़िस्सा सुनाने वाले राइटर के मुताबिक कई घंटों तक रामू दुखी और परेशान रहे. ‘वो श्रीदेवी है, श्रीदेवी! कोई श्रीदेवी पर कैसे चिल्ला सकता है!’ रामू दीवानों की तरह बार-बार यह बात दुहरा रहे थे.

कुछ समय पहले श्रीदेवी के गुज़रने की ख़बर के साथ-साथ राम गोपाल वर्मा के लगातार आते और ट्रेंड होते हुए ट्वीट और फ़ेसबुक पोस्ट पर नज़र पड़ी तो वह क़िस्सा बार-बार याद आ रहा था. जाहिर है यह क़िस्सा सिर्फ़ एक बना-बनाया, सुना-सुनाया क़िस्सा नहीं है. राम गोपाल वर्मा ने अपनी आत्मकथा ‘गन्स एंड थाइज़’ में ठीक-ठीक इस क़िस्से का तो नहीं, लेकिन बोनी की रसोई में श्रीदेवी के चाय बनाने का ज़िक्र ज़रूर किया है. इसमें उन्होंने यह भी लिखा है कि एक फ़रिश्ते को आसमान से रसोई में उतार लाने के लिए वे बोनी कपूर को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे. अपनी पत्नी के लिए रामू की इस जगजाहिर दीवानगी के लिए बोनी कपूर ने भी उन्हें कभी माफ़ नहीं किया.

लेकिन एक रामू ही नहीं थे जिन्होंने ज़माने भर की रुसवाइयों के बावजूद श्रीदेवी को शिद्दत से चाहा, और अपनी उस चाहत को लेकर कभी शर्मिंदा नहीं हुए. अस्सी और नब्बे के दशक में जवान हो रही हिंदुस्तानी पीढ़ी दो खेमों में बंटी हुई थी - श्रीदेवी फ़ैन क्लब और माधुरी दीक्षित फ़ैन क्लब. जया प्रदा, जूही चावला, दिव्या भारती या मीनाक्षी शेषाद्रि के नाम का तीसरा-चौथा-पांचवां कोई क्लब रहा भी होगा तो बेरसूख ही रहा होगा. हाल यह था कि इन दोनों के नाम पर एक ही आंगन के दो भाइयों के बीच अदृश्य दीवारें चिन जाया करती थीं. मैं भी ऐसे भाइयों की कई जोड़ियों को जानती हूं जो अख़बारों और पत्रिकाओं से माधुरी और श्री की तस्वीरें काट-काटकर मोटे एलबम बनाते थे. फिर उसे एक-दूसरे से छुपाकर रखते क्योंकि किसी भी छोटे-बड़े कलह के हालात का शिकार ये एलबम ही बना करते थे.

लड़कियों के लिए भी श्रीदेवी किसी एक हीरोइन का नाम भर नहीं था, एक कॉम्पलीमेंट था. मुझे याद है कि तीसरी क्लास में जब मुझे पहली बार एक शादी में अनब्याही बुआओं ने नाचने के लिए उकसाया था तो कहा था, ‘तनी सिरी देबी खानी नाचके दिखा द.’ उसी शादी से मेरे दिमाग़ के एलबम में चाचाओं-काकाओं की धुंधली याद की एक तस्वीर भी है, जिसमें वे जनवासे में ‘सिरी देवी’ जैसी दिखने वाली एक नचनिया के ठुमकों पर पैसे लुटाते नजर आते हैं.

श्रीदेवी वह डोर भी थी जिसने दक्षिण को उत्तर से जोड़ दिया था. ‘चांदनी’ जैसी बहू सिर्फ़ अपर-मिडिल क्लास पंजाबी परिवारों की ख़्वाहिश ही नहीं रह गई थी बल्कि छोटे शहरों के मिडिल क्लास घरों में भी उस दौर में जन्मी लड़कियों का नाम धड़ल्ले से चांदनी रखा जाने लगा था. हालांकि ये लड़कियां यह बात भी अच्छी तरह जानती और समझती थीं कि श्रीदेवी जैसी बेपनाह ख़ूबसूरती के ख़तरे भी बेहिसाब हैं.

अपने किरदारों के ज़रिए श्री ने भी कम ख़तरे मोल नहीं लिए. ‘सदमा’ की श्रीदेवी सोमू को भुला बैठती है. ‘हिम्मतवाला’ की श्रीदेवी ‘लड़की नहीं लकड़ी का खंभा’ कहकर चिढ़ाई जाती है तो वह भी मुंहतोड़ जवाब देती है कि ‘बक बक मत कर, नाक तेरा लंबा है’. ‘तोहफ़ा’ की श्रीदेवी प्यार करने, अपनी बहन के लिए उस प्यार की क़ुर्बानी देने, और फिर उस प्यार की निशानी को पैदा करके उसे अकेले अपने बूते पर पालने का दुस्साहस करती है. ‘नगीना’ की श्रीदेवी अपने प्यार का बदला लेने, और फिर उसको बचाने के लिए डसने तक को तैयार है. ‘घर संसार’ की श्रीदेवी पिता से नाराज़ होकर घर छोड़ देती है और किसी और के यहां की नौकरानी बन जाती है. फिर अपने मालिक के बेटे से प्यार करने की हिम्मत भी करती है. ‘मिस्टर इंडिया’ की श्रीदेवी नए शहर में अपने अकेलेपन से डरती नहीं, और तो और एक अदृश्य इंसान से प्यार करने, और उससे अपने जिस्मानी प्यार का इज़हार करने की हिम्मत भी रखती है.

‘चालबाज़’ की श्रीदेवी प्रेमकली है तो तांडव भी कर सकती है. ‘ख़ुदा गवाह’ की श्रीदेवी अपने वालिद के क़त्ल का बदला लेने के लिए अपने आशिक़ को सरहद पार भेजती है, और फिर उसी आशिक़ की बेटी बनकर अपने वालिद की तलाश में ख़ुद भी सरहदें पार कर सकती है. ‘गुमराह’ की श्रीदेवी ख़ुद को बेगुनाह साबित करने के लिए जान ले भी सकती है, और देने का हौसला भी रखती है. ‘चांदनी’ की श्रीदेवी अपने हाथों में नौ-नौ चूड़ियां खनका भी सकती है, तो उन्हीं हाथों की चूड़ियां उतारकर अपने आत्मसम्मान की तलाश में नई मंज़िलों तक पहुंचने का माद्दा भी रखती है. ‘लम्हे’ की श्रीदेवी को अपनी मां के दीवाने से प्यार हो जाता है, और उस प्यार को हासिल करने को वह अपनी नौजवान जिंदगी का इकलौता मक़सद बना लेती है. ‘लाड़ला’ की श्रीदेवी के लिए उसकी महत्वाकांक्षा ही उसकी खुद्दारी है. ‘जुदाई’ की श्रीदेवी जो चाहती है उसे पाने के लिए अपने पति का सौदा करने के लिए भी तैयार हो जाती है. ‘इंग्लिश विंग्लिश’ की श्रीदेवी ज़रा से प्यार और सम्मान की उम्मीद में अपने परिवार के लिए तिल-तिल जीती पत्नी और मां है. ‘मॉम’ की श्रीदेवी अपनी बेटी के बलात्कारियों का बदला लेने के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार है.

54 बरस की उम्र के तकरीबन पचास साल श्रीदेवी ने अभिनय करते हुए जिए. अपनी तीन सौवीं फ़िल्म तक आते-आते वे ‘हीरोइन’ के रूप में अपना 40 साला करियर जी चुकी थीं. नन्हे कान्हा से लेकर एक बाग़ी टीनेजर, बेपरवाह नवयुवती, ज़िद्दी प्रेमिका, अड़ियल पत्नी, प्रतिशोधी औरत और संवेदनशील मां के सैकड़ों किरदार निभा चुकी थीं. ऐसा करते हुए वे अभिनय के स्पेक्ट्रम के हर उस बिंदु को छू चुकी थीं जो किसी एक अभिनेत्री के हिस्से में आ सकता है. शायद इसी के चलते अस्सी और नब्बे के दशक में एक दौर वह भी आया जब श्रीदेवी बॉलीवुड में सबसे ज़्यादा फ़ीस हासिल करनेवाली हीरोइन थीं.

अगर शोहरत, सफलता और करियर ही किसी इंसान को ख़ुशी दे पाता तो फ़र्स्ट वर्ल्ड देशों का हैपिनेस कोशंट उनकी जीडीपी के समानुपाती होता. आख़िर में हम सब एक ही चीज़ चाहते हैं - वैलिडेशन. इस बात का लगातार भरोसा कि हमारी ज़रूरत है, हम रेलेवेंट हैं और हमारे चाहने वालों का प्यार हमारे लिए ताजिंदगी बना रहेगा. इस बाहरी प्रमाणीकरण यानी एक्सटर्नल वैलिडेशन की चाहत में हम (खासकर महिलाएं) ख़ुद को थोड़ा-थोड़ा तोड़ते, फोड़ते, मरोड़ते, बदलते, बिगाड़ते चले जाते हैं.

श्रीदेवी ने भी यही किया. करोड़ों-करोड़ फ़ैन्स की जो मोहब्बत पर्दे पर नजर आने वाली श्रीदेवी को मिलती रही, उसने पर्दे के पीछे वाली श्रीदेवी को शायद और तन्हा, और कमज़ोर, और इन्सिक्योर ही किया. वे पूरी जिंदगी दूसरों के लिए और दूसरों के हिसाब से जीती रहीं. दूसरों की भौंहों के चढ़ते-उतरते कमान पर अपनी जिंदगी का तीर डालती रहीं, उसी हिसाब से अपने लिए लक्ष्य चुनती रहीं. श्री दूसरों की नज़रों से अपने चेहरे, अपने शरीर, अपनी ख़ूबसूरती और अपने अभिनय को देखती रहीं और दूसरों की ज़रूरत के हिसाब से लगातार ख़ुद को बदलती रहीं. उनके कपड़े, उनका शरीर, उनका चेहरा, यहां तक कि उनकी नाक का नुकीलापन और उनके होठों की जुंबिश भी शायद उनका अपना फ़ैसला नहीं थे.

हिंदी सहित पांच सिनेमा उद्योगों में इतना बड़ा कद रखने के बावजूद उन पर अब तक एक किताब भी नहीं लिखा जाना यह साबित करता है कि पूरी दुनिया को अभी श्रीदेवी से बहुत कुछ कर गुज़रने की उम्मीद थी. यही वजह है कि उनके अचानक गुज़र जाने के बाद श्रीदेवी के हिस्से इतना सम्मान, इतने अफ़सोस, इतनी संवेदना और इतना प्यार आया. लेकिन पूरी जिंदगी श्रीदेवी के हिस्से में अगर कुछ आया तो दूसरों की उम्मीदों और अपेक्षाओं का बोझ ही आया.

24 फरवरी 2018 को मुंबई के एफ़एम चैनल नॉन-स्टॉप श्रीदेवी के गीत बजा रहे थे. अंधेरी में लोखंडवाला के सेलिब्रेशन स्पोर्ट्स क्लब से लेकर उनके घर तक कोई ऐसी गली नहीं थी जहां गाड़ियों और ओबी वैनों का तांता नहीं लगा हो. चारों ओर श्री के नाम लिखे विदाई संदेशों के होर्डिंग और बैनर लगे थे.

और तब मुझे पहली बार ईश्वर के प्रति, श्रीदेवी के प्रति, इस चकाचौंध भरी बेरहम दुनिया के प्रति, राम गोपाल वर्मा का ग़ुस्सा जायज़ लगा था. अगर कोई ऊपर कहीं सातवें आसमान के परे हमारी जिंदगियों का हिसाब-किताब लिख रहा है तो वाकई उसके कैलकुलेशन में बहुत खोट है. अगर श्रीदेवी ने वाकई एक्सटर्नल वैलिडेशन के चक्कर में अपनी जिंदगी के साथ इतना बड़ा ख़तरा मोल लिया तो अपने साथ सही नहीं किया.

आई ऑल्सो हेट गॉड फॉर किलिंग श्रीदेवी, एंड आई ऑल्सो हेट श्रीदेवी फॉर डाइंग.