सीरिया में चल रहे गृहयुद्ध में सात वर्षो से नाहक खून बह रहा है. पर उसकी भयंकरता विश्व के लिए जितनी ख़तरनाक इस समय हो गयी है, उतनी पहले कभी नहीं थी. अबू बक़र अल बगदादी के इस्लामी स्टेट (आईएस) की धज्जियां उड़ जाने के बाद वहां जिस शांति की संभावना बनती दिख रही थी, उसे तुर्की ने उत्तरी सीरिया के कुर्दों के खिलाफ 20 जनवरी को अपना सैन्य अभियान छेड़ कर पलीता लगा दिया है. रूस और अमेरिका सहित कम से कम सात ऐसे पक्षों के बीच आपस में ही भिड़ जाने की स्थिति बनती दिख रही है जो कुछ ही महीने पहले तक आईएस की कमर तोड़ने में लगे थे.

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने 20 जनवरी की पौ फटने से पहले ही अपने सैनिकों को तुर्की से सटी उत्तरी सीरिया की प्रशासनिक इकाई अफ़रीन की तरफ़ कूच करने और वहां के सीरियाई कुर्दों की वाईपीजी मिलिशिया (नागरिक सेना) का सफ़ाया कर देने का आदेश दिया. तुर्की के सैनिकों ने अकेले ही नहीं, बल्कि खुद को फ्री सीरियन आर्मी (एफ़एसए) कहने वाले अरब-इस्लामी जिहादियों-विद्रोहियों को साथ ले कर अफ़रीन पर चढ़ाई शुरू की.

अपनी ही सेना पर भरोसा नहीं

अपने आप को आतंकवाद का शत्रु कहने वाले एर्दोआन ने अपनी सेना को कूच करने का आदेश तो दे दिया, पर उस पर इतना भी भरोसा नहीं जता सके कि उसे – आतंकवाद के लिए बदनाम – अरब-इस्लामी जिहादियों और विद्रोहियों को साथ लिये बिना अकेले ही उत्तरी सीरिया के कुर्दों से लड़ने के लिए कह पाते. विद्रोहियों के भेस में वास्तव में अल बगदादी वाले आईएस, अल नुसरा फ्रंट और अल कायदा के बाकी बचे जिहादी, तुर्क सेना की अगुआई में कुर्दों से मिली अपनी पिछली हार का बदला ले रहे हैं. अफ़रीन, तुर्की से सटे उत्तरी सीरिया के रोजावा नाम के उस कुर्द-स्वायत्तशासी प्रदेश की एक इकाई है, जिसमें अल-जज़ीरा और कोबाने नाम की दो और क्षेत्रीय इकाइयां हैं.

तुर्की, कैसे भी करके पूरे रोजावा को अपने और सीरिया के बीच एक ‘बफ़र-ज़ोन’ में बदल देना चाहता है. माना जा रहा है कि दिखाने के लिए वह पहले तो वह वहां सीरियाई गृहयुद्ध और अल बगदादी के अत्याचारों से भाग कर आये अरब शरणार्थियों को टिकाएगा, पर आखिरकार उसे अपना हिस्सा बना लेगा. तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन का मानना है कि ऐसे सभी कुर्द - चाहे वे तुर्की के निवासी हैं या कहीं और के - आतंकवादी हैं, जो उनकी जयजयकार के बदले एक अलग कुर्दिस्तान चाहते हैं. एर्दोआन को यह डर भी सताता है कि यदि सीरिया या इराक़ में कोई स्वतंत्र कुर्दिस्तान बन गया, तो तुर्की के कुर्द उससे प्रेरणा लेकर और अधिक ज़ोर-शोर से अपनी आज़ादी की मांग करेंगे.

तुर्क सेना का गिरा हुआ मनोबल

एर्दोआन ने तुर्की में 15 जुलाई 2016 को सेना द्वारा तख्तापलट के कथित प्रयास के बहाने से हज़ारों सैनिकों और बड़े-बड़े जनरलों सहित सैकड़ों अफ़सरों को जिस तरह जेल में डाल कर सेना का अपमान किया है, उससे सेना का मनोबल पहले ही बहुत गिरा हुआ है. अब वे उसी अपमानित सेना से सीरियाई कुर्दों की उस मिलिशिया को खदेड़ देने के लिए कह रहे हैं, जो अल बगदादी की ख़लीफ़त को ख़देड़ देने के अमेरिकी सैन्य अभियान की रीढ़ रही है. अमेरिका ने ही उसे शिक्षित-प्रशिक्षित और हथियारबंद किया है.

पूरे एक महीने की लड़ाई के बाद भी तुर्क सेना अफ़रीन में कोई ख़ास गुल नहीं खिला पायी. इसलिए 20 फ़रवरी को एर्दोआन को कहना पड़ा कि अब अफ़रीन को बाहर से घेर कर उस पर बमबारी की जायेगी, ताकि उसे कोई बाहरी सहायता न मिल सके. दूसरी ओर अफ़रीन में लड़ रही कुर्द मिलिशिया वाईपीजी के अनुरोध पर सीरिया ने अपनी नियमित सेना के एक सहयोगी दस्ते राष्ट्रीय सुरक्षा बल (एनडीएफ़) के लड़ाकों को अफ़रीन की दिशा में रवाना कर दिया. इस तरह पहली बार सीरिया और तुर्की के सैनिकों की बीच सीधे टकराव की नौबत आगयी है.

सहायता की क़ीमत होगी स्वायत्तता में कटौती

वाईपीजी सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद की विरोधी रही है. तब भी, उनकी सरकार उसकी तरफ़ सहायता का हाथ बढ़ा रही है, तो शायद यही सोच कर कि इसकी क़ीमत बाद में सीरियाई कुर्दों की स्वायत्तता में कटौती करके वसूली जा सकती है. अमेरिका यह सोच कर अफ़रीन के कुर्दों की सहायता इस समय नहीं कर रहा है कि उसे अपने नेतृत्व वाले नाटो सैन्य संगठन की दूसरी सबसे बड़ी सेना के मालिक तुर्की के खिलाफ हथियार उठाना पड़ जायेगा. सीरिया में सात वर्षों से चल रही मारकाट को लेकर अमेरिका की नीति, अपने सैनिकों का ख़ून बहाने के बदले, दूसरों के कंधों पर रख कर बंदूक चलाने और उन्हें आपस में लड़ाने की रही है.

अफ़रीन से लगभग 100 किलोमीटर पूर्व में स्थित मनबीज में अमेरिका के 1000 सैनिकों का एक विशेष बल तैनात है, मनबीज की रक्षा ही इस समय अमेरिकी सर्वोच्च प्राथमिकता है. वहां तैनात उसके सैनिक ‘एसडीएफ’ (सीरियन डेमोक्रैटिक फ़ोर्सेस) और ‘वाईपीजी’ कुर्द मिलिशिया के लड़ाकों को शिक्षित-प्रशिक्षित और हथियारबंद करते हैं. उन्हीं के मार्गदर्शन में कुर्द लड़ाके अल बगदादी के जिहादियों को आईएस की राजधानी राक्का से खदेड़ पाये थे.

फ़रवरी के पहले हफ्ते में अमेरिकी नेत़ृत्व वाले आईएस विरोधी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के दो सबसे वरिष्ठ जनरलों ने मनबीज की यात्रा की. न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार उनमें से एक, जनरल पॉल फ़न्क ने तुर्की को चेतावनी देते हुए कहा, ‘यदि हमारे ऊपर हमला हुआ, तो हम भी करारा जवाब देंगे और अपना बचाव करेंगे.’ तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन अमेरिकी जनरल के इस कथन से तिलमिला गये. राजधानी अंकारा में एक भाषण देते हुए उन्होंने भी चेतावनी दे डाली. कहा, ‘तुर्की की सेना जिस किसी आतंकवादी को देखेगी, उसे मिटा देगी. उसके साथ जो भी खड़ा दिखेगा उसका भी यही हाल होगा.’

तुर्की अमेरिका को ‘उस्मानी’ थप्पड़ लगायेगा

तुर्की के बड़बोले राष्ट्रपति का एक और बयान अगले दिन वहां के अख़बारों का शीर्षक बनाः ‘(लगता है) आपके गालों पर अभी तक कोई उस्मानी (तुर्की) थप्पड़ नहीं पड़ा है!’ यानी, तुर्की उसी अमेरिका को अब थप्पड़ मारेगा जिसने 1952 में उसे नाटो में भर्ती किया! अरबों डॉलर दे कर उसकी भारी-भरकम सेना को खड़ा किया. आधुनिक हथियारों से लैस किया. उसे नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना बनने दिया.

लगभग आठ करोड़ जनसंख्या वाले तुर्की के पास 9,20,400 सक्रिय और 4,29,000 रिज़र्व सैनिक, यानी कुल मिलाकर लगभग साढ़े 13 लाख. तुर्की से चार गुना अधिक जनसंख्या वाले अमेरिका के सभी सैनिकों की संख्या करीब साढ़े 24 लाख है. तुर्की से 16 गुना अधिक जनसंख्या वाले भारत के पास भी तुर्की से कुछ ही अधिक सैनिक हैं, जबकि भारत के सामने पाकिस्तान और चीन की हमेशा दोहरी चुनौती रहती है.

इसी गहमागहमी में अमेरिकी विदेशमंत्री रेक्स टिलर्सन ने फ़रवरी के मध्य में तुर्की की दो दिनों की यात्रा की. तुर्की के प्रधानमंत्री बिनाली यिल्दीरिम बर्लिन पहुंचे. पर, राष्ट्रपति एर्दोआन का पारा नीचे आता नहीं दिखा. अमेरिका के रक्षा मंत्रालय ने 12 फ़रवरी को बताया कि 2018 के उसके बजट में सीरियाई कुर्दों की सैन्य-सहायता के लिए 55 करोड़ डॉलर की व्यवस्था की गयी है.

ईरान के बिना असद की लुटिया डूब जाती

जानकारों का कहना है कि सीरिया ने अपने जिस कथित ‘राष्ट्रीय सुरक्षा बल’ (एनडीएफ़) के सैनिकों को कुर्द मिलिशिया की सहायता के लिए अफ़रीन भेजा है, वह वास्तव में ईरान की बासिज मिलिशिया की ही एक ऐसी शाखा है जिसे सीरियाई परिस्थितियों में लड़ने-भिड़ने के अनुकूल ढाला गया है. सीरिया में उथल-पुथल की शुरुआत से ईरान ही राष्ट्रपति बशर अल असद का प्रमुख सहारा रहा है. ईरानी धन, साधन और सैन्य सहायता के बिना राष्ट्रपति असद की लुटिया बहुत पहले ही डूब चुकी होती! 2014 से ईरान ने ही सीरिया में ‘लीवा फ़ातेमियौं’ नाम की एक ऐसी सेना गठित कर रखी है जिसमें अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और इराक़ के 12,000 हज़ार से अधिक शिया लड़ाके भाड़े के सैनिक हैं. उन्हें 500 से 800 डॉलर मासिक वेतन मिलता है. बताया जाता है कि अब तक क़रीब 2,000 ईरानी भाड़े के सैनिक मारे भी गये हैं.

तुर्की ने दावा किया है कि उसके सैनिकों ने अफ़रीन की वाईपीजी मिलिशिया की सहायता के लिये आये सीरिया के एनडीएफ़ लड़ाकों को पीछे धकेल दिया है. लेकिन 26 फ़रवरी तक उसने ऐसे कोई प्रमाण नहीं दिये थे. ईरान ने सीरियाई कुर्दों को आतंकवादी बताकर उनसे लड़ने के बहाने से सीरियाई भूमि पर तुर्की के अतिक्रमण की ज़ोरदार निंदा की है और उसे अपना हमला बंद करने के लिए कहा है. स्वाभाविक है कि सीरिया की सहायता कर रहे ईरान की सीरिया में जो पैठ बन गयी है, उसका वह विस्तार करना चाहेगा, न कि अपना बनता खेल बिगाड़ने का तुर्की को कोई मौका देगा. प्रेक्षकों का कहना है कि ईरान ने रूस की सहमति से अपने लड़ाके अफ़रीन की तरफ़ भेजे हैं. तुर्की के हमले से पहले रूस के भी कुछ सैनिक वहां थे, जिन्हें रूस नें समय रहते हटा लिया.

जब रूस सीरियाई गृहयुद्ध में कूद पड़ा

रूस सितंबर 2015 में यह कहते हुए सीरियाई गृहयुद्ध में कूद पड़ा था कि उसे राष्ट्रपति असद की सत्ताधारी क़ानूनी सरकार ने बुलाया है. किसी अमेरिकी सैन्य-हस्तक्षेप के लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, उस समय, सीरिया में ऐसी कोई लाल रेखा (रेड लाइन) ढूंढ रहे थे जो हस्तक्षेप का औचित्य सिद्ध कर सकती. ओबामा को कोई लाल रेखा दिखती, इससे पहले ही रूसी विमानों ने सीरियाई राष्ट्रपति के विरोधियों और अल बगदादी की ख़लीफ़त वाले इस्लामी जिहादियों पर बम बरसाने शुरू कर दिये. ईरान के अपने और भाड़े के पैदल सैनिक ज़मीनी लड़ाई के लिए साल भर पहले ही पहुंच चुके थे.

समय के साथ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का मुख्य लक्ष्य अमेरिका को सीरिया से परे रखना और पश्चिम एशिया की चौकीदारी खुद करना बन गया. इसके लिए जरूरत के अनुसार वे ईरान, तुर्की या सीरियाई कुर्दों से भी हाथ मिलाने लगे. सीरियाई कुर्दों के गढ़ अफ़रीन पर तुर्की के हमले से पहले, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच टेलीफ़ोन पर बात हुई थी. इस बातचीत के बाद रूस ने कुर्दों की वाईपीजी मिलिशिया को अल्टिमेटम दिया कि वह अफ़रीन में सीरिया की सरकारी सेना की मौजूदगी स्वीकार करे और स्थानीय प्रशासन का सारा काम सीरिया की सरकार को सौंप दे.

कुर्द मिलिशिया को अल्टीमेटम

यह बात समझ से परे है कि रूसी राष्ट्रपति ने तुर्की को उत्तरी सीरिया में किसी हस्तक्षेप से रोकने के बदले वहां की कुर्द मिलिशिया को अल्टीमेटम क्यों दिया? वाईपीजी ने शायद यह सोचते हुए रूसी अल्टीमेटम का पालन नहीं किया कि रूस की बात मानने से तो कुर्दों की अब तक सारी स्वायत्तता ही छिन जायेगी. रूस ने अपने अल्टीमेटम की अवज्ञा के जवाब में अफ़रीन से अपने सैनिक हटा लिये और तुर्की को हमला शुरू करने की हरी झंडी दिखा दी.

रूस ने जैतून की टहनी नाम वाले तुर्की के अभियान के लिए हरी झंडी दिखा तो दी, पर अफ़रीन के ऊपर के हवाई क्षेत्र को इस तरह प्रतिबंधित भी कर दिया कि तुर्की के युद्धक विमान वहां बमबारी न कर सकें. हवाई बमबारी के बिना तुर्क सेना की प्रगति लगभग ठप पड़ गयी. प्रेक्षक मानते हैं कि सीरिया के एनडीएफ़ लड़ाकों के पहुंचते ही रूस अफरीन के हवाई क्षेत्र को तुर्की की वायुसेना के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित घोषित कर देगा.

एर्दोआन का ‘एडवेंचर’ पंचर हुआ तो?

रूस के ऐसे किसी कदम से तुर्की तो क्षुब्ध होगा, पर सीरिया की सरकार को दोहरा लाभ पहुंचेगाः अफ़रीन के कुर्दों की वर्तमान स्वायत्तता छिन जाएगी और तुर्की की सेना एक लंबी ज़मीनी लड़ाई में फंस जायेगी. यानी, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन की सारी शेखी धरी रह जायेगी. तुर्की का निरंकुश शासक बनने के लिए उन्होंने जो नया संविधान बनाया है, उसके अनुसार 2019 में उन्हें चुनाव करवा कर नया जनादेश पाना है. सीरियाई ‘एडवेंचर’ यदि पंचर हुआ तो तुर्की का नया सुल्तान बनने का एर्दोआन का सपना चकनाचूर हो जायेगा.

रूस और तुर्की के बीच हालांकि कुछ समय से नजदीकी आती दिख रही थी. लेकिन सीरिया का पुराना मित्र होने और वहां अपने सैन्य अड्डों को देखते हुए रूस नहीं चाहेगा कि तुर्की, कुर्दों की प्रधानता वाले उत्तरी सीरिया में अपने पैर पसार ले. दूसरी ओर, यदि कुर्दों की वाईपीजी मिलिशिया अफ़रीन वाले मोर्चे पर सीरियाई सरकार द्वारा भेजे गये एनडीएफ़ लड़ाकों के साथ – जिन्हें ईरान ने सिखाया-पढ़ाया और हथियारबंद किया है – सहयोग करने लगती है तो यह बात वाईपीजी को प्रशिक्षण और हथियार देने वाले अमेरिका को कतई रास नहीं आयेगी. ईरान को कोसने-धिक्कारने वाले अमेरिका ने यदि वाईपीजी को धन और युद्ध-साधन देना बंद कर दिया, तो उसका भी जीना दूभर हो जायेगा.

मानवाधिकारों का सबसे बड़ा हनन

तुर्की और सीरिया की सरकारें पश्चिम एशिया में इस समय मानवाधिकारों की सबसे बड़ी हननकर्ता हैं. पर दोनों एक-दूसरे पर साधारण जनता का नाहक ख़ून बहाने के प्रचारात्मक आरोप लगाने में व्यस्त हैं. रूस, अमेरिका और ईरान भी इस प्रचार-युद्ध की आग में घी डाल रहे हैं. तुर्की और पूरा पश्चिमी जगत गुहार लगा रहा है कि रूस और सीरिया ने मिल कर सीरिया की राजधानी दमिश्क के उपनगर पूर्वी-ग़ोउता को, अपनी बमबारी से नरक बना दिया है. ईरान चीख रहा है कि तुर्की की सेना अफ़रीन में ज़हरीली गैस का उपयोग कर रही है. पूर्वी-ग़ोउता के जिन इस्लामी-जिहादी गुटों ने दमिश्क पर रॉकेट और गोले दाग कर रूसी-सीरियाई बमबारी को उकसाया है, उनमें से कुछ को तुर्की से अस्त्र-शस्त्र मिलते हैं.

जर्मनी के म्युनिख में 16 से 18 फ़रवरी तक चले अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सम्मेलन के गलियारों में एक ऐसी घटना सुनने में आई, जिस पर सभी पक्षों ने चुप्पी साध रखी है. इस ग़ैर सरकारी सम्मेलन को ब्रिटेन, तुर्की और इसराइल के प्रधानमंत्री, ईरान और रूस के विदेशमंत्री और अमेरिका और जर्मनी के रक्षामंत्री ने भी संबोधित किया. सम्मेलन के दौरान कानाफूसी हो रही थी कि सात और आठ फ़रवरी को सीरिया में रूसी और अमेरिकी ‘सैनिकों’ के बीच ऐसी मुठभेड़ें हुई हैं, जो – एक पूर्व रूसी राजनय और विदेशनीति विशेषज्ञ व्लादिमीर फ्रोलोव के शब्दों में – ‘वियतनाम युद्ध के बाद से कभी नहीं हुई थीं.’

रूसी भाड़े के सैनिक

पूरी जानकारी किसी को नहीं है ओर न शायद कभी हो पायेगी. अब तक जो कुछ पता चल सका है, उसके अनुसार सीरिया के राष्ट्रपति के प्रति निष्ठावान दो उद्योगपति वहां के ‘दइर अल-सोर’ नाम के तेल-स्रोतों को अपने क़ब्ज़े में लेना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने ‘आइएस हंटर’ नाम की एक स्थानीय मिलिशिया और भाड़े के सैनिकों वाली ‘वागनर’ नाम की एक रूसी कंपनी के लड़ाके किराये पर लिये. सीरिया में रूसी सेना की उच्च कमान को इसका पता था, पर उसने रोका नहीं.

भाड़े के इन सैनिकों ने जिस जगह हमला किया, वह जगह उसी ‘सीरियन डेमोक्रैटिक फ़ोर्स’ (एसडीएफ़) के नियंत्रण में है, जिसकी सहायता से अमेरिका अल बगदादी के आईएस को मिटाने में लगा है. वहां अमेरिकी सैनिक भी हैं. इसलिए एसडीएफ़ के लड़ाकों ने वहां के अमेरिकी सैनिकों से सहायता मांगी. अमेरिकी सैनिकों ने विमानों ओर तोपों के साथ हमले का जवाब दिया और सीरिया में रूसी सेना के अधिकारियों को भी सूचित किया.

रूसी और अमेरिकी टक्कर

बाद के दिनों में और भी बड़ी लड़ाइयों की ख़बरें आयीं. ब्रिटिश समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने 300 से अधिक हताहतों का समाचार दिया. रूसी दैनिक ‘नवाया गज़ेता’ ने लिखा कि 13 रूसियों की मृत्यु हुई और अनेक घायल हुये. मॉस्को के दैनिक ‘मस्कोव्स्की कम्सोमोलेज़’ ने ‘वागनर’ के पांच लड़ाकों के नाम और फ़ोटो भी छापे. अमेरिका की ओर से कहा गया कि उसके सैनिकों को पता नहीं था कि ‘दइर अल-सोर’ के हमलावरों में रूसी भी हैं.

रूस की सरकार भी बात का बतंगड़ नहीं बनने देना चाहती थी. रूसी रक्षा मंत्रालय ने मामले की पुष्टि की, पर कहा कि उसके पीछे सीरिया-समर्थक लोग थे. सीरिया में रूसी उच्च कमान का उससे कुछ लेना-देना नहीं था. रूसी विदेश मंत्रालय ने भी माना कि संभवतः पांच रूसी नागरिक मारे गये हैं, पर वे रूसी सेना के सदस्य नहीं हैं. अमेरिकी रक्षामंत्री जेम्स मैटिस ने म्युनिख के सुरक्षा सम्मेलन से स्वदेश लौटते समय साथ के पत्रकारों से कहा कि उन्हें भी नहीं मालूम है कि ‘दइर अल-सोर’ मे हुआ हमला किसके आदेश पर हुआ था.

अफ़वाहों का बाजा़र गर्म

अफ़वाहों का बाजा़र गर्म है कि अमरिकी सैनिकों और उनकी संरक्षित एसडीएफ़ मिलिशिया पर जिन सैनिकों ने हमला किया, उन्हें या तो सीरिया की सरकार ने भाड़े पर लिया था या फिर रूसी रक्षा मंत्रालय ने. अपने कारनामों को छिपाने के लिए भाड़े के सैनिकों का इस्तेमाल कोई नयी बात नहीं है. अमेरिकी सेना भी भाड़े के सैनिक देने वाली ब्लैकवॉटर कंपनी की सेवाएं लेने के लिए जानी जाती है. अमेरिका की ओर से ब्लैकवॉटर सैनिक आजकल यूक्रेन के सरकारी सैनिकों को पूर्वी यूक्रेन के रूसी विद्रोहियों से लड़ने का प्रशिक्षण दे रहे हैं.

डर यह है कि सीरिया में तुर्की के भी भाड़े के सैनिक हैं. अमेरिका तुर्की से नाराज़ है. उत्तरी सीरिया में तुर्की के सैन्य अभियान से रूस भी खुश नहीं है. तुर्की इन दोनों देशों से लड़ नहीं पायेगा, इसलिए वह अपने इस्लामी-जिहादी भाड़े के सैनिकों की मदद से रूस और अमेरिका को लड़ा देने का कोई षड़यंत्र रच सकता है. रूस और अमेरिका के बीच ऐसी किसी टक्कर के भयावह परिणामों की कल्पना तक करने से ही डर लगने लगता है.

जर्मनी की गंदी भूमिका

पश्चिम एशिया में युद्ध की गहमागहमी की इन्हीं ख़बरों के बीच पता चला है कि विश्व के पांचवें सबसे बड़े हथियार निर्यातक जर्मनी ने तुर्की द्वारा उत्तरी सीरिया के कुर्दों पर आक्रमण से ठीक पहले, 18 दिसंबर 2017 से 24 जनवरी 2018 के बीच, जर्मन कंपनियों को कुल 31 निर्यात मंजूरियां दी हैं. तुर्की ने अपना हमला 20 जनवरी की सुबह शुरू किया था. वैसे जर्मनी बड़े गर्व से दावा करता है कि उसके शस्त्र-निर्यात क़ानून बहुत कड़े हैं और वह तनावग्रस्त क्षेत्रों में हथियारों के निर्यात की अनुमति नहीं देता. पर, तुर्की के मामले में यह जानते हुए भी जर्मनी को कोई संकोच नहीं हुआ कि तुर्की, जर्मन हथियारों का उपयोग खुद अपने देश और पड़ोसी देशों के कुर्दों को मारने-कुचलने के लिए करता है.

जर्मन संसद में वाम पार्टी ‘दी लिंके’ की कुर्दवंशी सदस्य सेविम दादेलेन के एक प्रश्न के उत्तर में उद्योग मंत्रालय को बताना पड़ा कि जिन हथियारों के निर्यात की अनुमति दी गयी है, उनमें बम, टारपीडो, रॉकेट, उड़नशील वस्तुएं, आग्नेय अस्त्र और निगरानी प्रणालियां, सैनिक वाहन, जहाज़ और नौसैनिक उपकरण, वैमानिकी उपकरण और इलक्ट्रॉनिक वस्तुएं, विशेष प्रकार के टैंक और उनके हिस्से-पुर्जे शामिल हैं.

जर्मनी तुर्की की चापलूसी में लगा रहता है

तुर्की के पास पहले से ही कुल क़रीब एक हज़ार जर्मन टैंक हैं. काफ़ी समय से जर्मनी के साथ उसके संबंध अच्छे भी नहीं हैं. तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन जर्मन चांसलर मेर्कल को नाज़ी तक कह चुके हैं. तब भी जर्मनी तुर्की की चापलूसी में लगा रहता है. उत्तरी सीरिया के कुर्दों के विरुद्ध तुर्की के सैन्य अभियान के बारे में जानते हुए भी जर्मनी ने उसे इसलिए भी हथियार दे कर खुश करने की कोशिश की है, ताकि तुर्की द्वारा गिरफ्तार जर्मन पत्रकारों और अन्य नागरिकों को रिहाई मिल जाये.

समझा जाता है कि तुर्क मूल के जर्मन नागरिक और जर्मन दैनिक दी वेल्ट के तुर्की में संवाददाता डेनिस युजेल को, बिना किसी मुकदमे के एक वर्ष की गिरफ्तारी के बाद, 16 फ़रवरी के दिन इसी कारण तुर्की ने रिहा भी कर दिया. इससे कुछ ही दिन पहले तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने डंके की चोट कहा था, ‘जब तक मैं राष्ट्रपति हूं, युज़ेल को रिहाई नहीं मिल सकती!’ युजेल की आकस्मिक रिहाई के दिन जर्मन विदेशमंत्री ने दावा किया था कि उनकी रिहाई के बदले में तुर्की को हथियार देने का कोई सौदा नहीं हुआ है.

भारत की राजनीति में जो लोग नैतिकता की मांग करते हैं और पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों का उदाहरण देते हैं, वे नहीं जानते कि पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों की राजनीति में नैतिकता न कभी थी और न आज है. यदि उनमें कुछ भी नैतिकता होती, तो सीरिया में आज यह स्थिति नहीं होती कि पूरा देश खंडहर बन जाने के बाद भी कम से कम छह बाहरी देश वहां इस तरह छीना-झपटी कर रहे हैं जिस तरह किसी लाश के गिरते ही गिद्ध या चील-कौवे आपस में करने लगते हैं.