12 साल से ज़्यादा हो गए, लेकिन गुजरात के चर्चित सोहराबुद्दीन फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले का विवादों से नाता खत्म होता नहीं दिख रहा. बीते शनिवार यानी 24 फरवरी को बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले से जुड़ी पांच याचिकाओं की सुनवाई कर रहीं जज को इस काम से हटा कर उन्हें नई जिम्मेदारी दे दी. इन याचिकाअों में गुजरात पुलिस के कुछ वरिष्ठ अफ़सरों को आरोपमुक्त किए जाने के फ़ैसले को चुनौती दी गई है. ये अधिकारी सोहराबुद्दीन फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में आरोपित थे.

बदली गई जज जस्टिस रेवती मोहिते डेरे हैं जिन्होंने बीती 24 जनवरी को सोहराबुद्दीन केस की अदालती सुनवाई की मीडिया कवरेज़ से प्रतिबंध हटा दिया था. यही नहीं, जस्टिस रेवती लगातार इस केस में केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई की खिंचाई कर रही थीं. उनका कहना था कि बतौर अभियोजन पक्ष सीबीआई जो केस अदालत में पेश कर रही है उसमें उन्हें स्पष्टता की कमी नज़र आ रही है. उनका यह भी मानना था कि सीबीआई गवाहों को सुरक्षा नहीं दे पा रही. जस्टिस रेवती ने इस बात के लिए भी सीबीआई को फटकार लगाई थी कि उसने निचले स्तर के पुलिसकर्मियों को बरी किए जाने का तो विरोध किया, लेकिन जब बड़े पुलिस अधिकारियों को आरोपमुक्त किया गया तो जांच एजेंसी ने चुप्पी साध ली.

जिन पांच याचिकाओं का जिक्र ऊपर हुआ उनमें तीन सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन ने दायर की हैं. इनमें निचली अदालत द्वारा गुजरात पुलिस के पूर्व महानिरीक्षक (आईजी) डीजी वंजारा, राजस्थान पुलिस के अधिकारी आईपीएस दिनेश एमएन और पूर्व पुलिस अधीक्षक राजकुमार पांडियन को आरोपमुक्त किए जाने को चुनौती दी गई है. दो याचिकाएं सीबीआई ने दायर की हैं. इनमें गुजरात पुलिस के एक अधिकारी एनके अमीन और राजस्थान पुलिस के हवलदार दलपत सिंह राठौड़ को बरी किए जाने के अदालती फ़ैसले को चुनौती दी गई है. जस्टिस रेवती मोहिते डेरे ने तीन महीने पहले इन पर सुनवाई शुरू की थी. तीन सप्ताह पहले ही उन्होंने इस मामले की हर रोज सुनवाई का सिलसिला शुरू किया था.

ये पांचों पुलिस अधिकारी मामले के उन 15 आरोपितों में शामिल हैं जिन्हें सीबीआई की विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में सुनवाई शुरू होने से पहले ही बरी कर दिया था. वैसे मामले में कुल 38 आरोपित हैं. बहरहाल अब जबकि जस्टिस रेवती का तबादला हो चुका है उनके पास विचाराधीन पांचों याचिकाओं की सुनवाई जस्टिस एनडब्ल्यू सांबरे करेंगे. वहीं जस्टिस रेवती अग्रिम जमानत से संबंधित मामलों की सुनवाई करेंगी.

बॉम्बे हाई कोर्ट वरिष्ठ अधिवक्ताओं की मानें तो जजों की ज़िम्मेदारियों में तब्दीली यूं तो आम बात है. लेकिन उनके मुताबिक जब इस तथ्य पर नज़र पड़ती है कि जस्टिस रेवती ने सोहराबुद्दीन मामले में लगभग सभी पक्षों के दलीलों पर सुनवाई पूरी कर ली थी तो यह तब्दीली दुर्भाग्यपूर्ण लगने लगती है. वरिष्ठ अधिवक्ता युग चौधरी कहते हैं, ‘जजों की ज़िम्मेदारियों में नियमित तौर बदलाव होता रहता है. इस समय भी संभावना जताई जा रही थी कि ऐसी कोई तब्दीली जल्द ही होगी. लेकिन (सोहराबुद्दीन) मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए, और इसके मद्देनज़र कि अदालत का काफ़ी वक़्त इस पर खर्च हो चुका है, मुख्य न्यायाधीश यह कर सकते थे कि यह मामला उन्हीं (जस्टिस रेवती) के पास रहे.’

सामाजिक कार्यकर्ता और कई जनहित याचिकाएं दायर करने के लिए ख्यात वकील प्रशांत भूषण हालांकि इस तब्दीली को सहज और स्वाभाविक नहीं मानते. उनका कहना है, ‘अगर कोई न्यायाधीश किसी मामले की कई दिनों तक सुनवाई कर चुका है तो वह केस (ज़िम्मेदारियों में किसी तब्दीली होने की स्थिति में भी) उसी के पास भेजा जाता है और उसे लंबित मामला माना जाता है. इसीलिए अगर यह मामला जस्टिस रेवती के पास नहीं रहता है तो उनके तबादले को असामान्य माना जाएगा. साथ में यह भी कि इस बदलाव के पीछे इरादा सही नहीं था. इस धारणा का एक आधार यह भी हो सकता है कि जस्टिस रेवती सीबीआई के आचरण पर लगातार गंभीर टिप्पणियां कर रही थीं.’

सीबीआई पर तीखी टिप्पणियां

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस रेवती ने साफ़ लहज़े में सीबीआई को एक नहीं अनेक बार फटकार लगाई. ख़ास तौर पर गवाहों के मुकरने का मामला तो उन्होंने काफ़ी गंभीरता से लिया. यहां बताते चलें कि अब तक मामले के 42 में 34 गवाह अदालत में अपने पिछले बयान से पलटी मार चुके हैं. इसे लेकर जस्टिस रेवती ने 12 फरवरी को कहा था, ‘सीबीआई क्या ऐसी गंभीरता से मामले को लेकर चल रही है? आप (सीबीआई) गवाहों को किस तरह की सुरक्षा मुहैया करा रहे हैं? आपका कर्तव्य है कि आप गवाहों को सुरक्षा दें ताकि वे निडर होकर अदालत में अपनी बात कह सकें. आप ऐसा नहीं कर सकते कि एक तरफ आरोपपत्र दायर करें और दूसरी तरफ अपने गवाहों को सुरक्षा न दें?’

अदालत के सवालों पर जब सीबीआई ने और समय मांगा तो जस्टिस रेवती ने फिर उसकी खिंचाई की और कहा, ‘आप मूक दर्शन नहीं बने रह सकते. मुझे सीबीआई से जिस तरह का सहयोग मिलना चाहिए था वैसा मिल नहीं रहा है. अगर आपका यही रवैया है तो फिर केस चला ही क्यों रहे हैं?’

ऐसे ही पिछले महीने जब उन्होंने सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई की मीडिया कवरेज पर लगा प्रतिबंध हटाया तो भी उनकी टिप्पणी सुर्खियों में रही. उन्होंने उस वक़्त कहा था, ‘समाज के हितों की अवहेलना नहीं की जा सकती. किसी आपराधिक मामले पर अदालत में हो रही सुनवाई के बारे में जानने का आम जनता को पूरा हक़ है.’

इस मामले में जस्टिस रेवती पहली जज नहीं हैं जिनके साथ ऐसा हुआ है

सोहराबुद्दीन मामले में जस्टिस रेवती पहली ऐसी जज नहीं हैं जिन्हें सुनवाई बीच में ही छोड़नी पड़ी हो. हालांकि उन जजों के बारे में जानने से पहले थोड़ा मामले की पृष्ठभूमि को याद कर लेना ठीक रहेगा. तो यह सिलसिला नवंबर-2005 से शुरू होता है. यानी वह वक़्त जब सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसरबी को गुजरात पुलिस ने अहमदाबाद के पास मुठभेड़ में मार गिराया था. पुलिस ने उस वक़्त दावा किया कि दोनों लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी थे. इसके क़रीब एक साल बाद यानी दिसंबर-2006 में एक और मुठभेड़ हुई. बाद में खबरें आईं कि इसमें गुजरात पुलिस की टीम ने तुलसीराम प्रजापति को मार गिराया जो सोहराबुद्दीन और कौसरबी की हत्या का गवाह था.

इसके बाद इन घटनाओं की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एक विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाया गया. उसकी जांच रिपोर्ट में साफ़ कहा गया कि सोहराबुद्दीन और कौसरबी आतंकी नहीं थे और उन्हें जबरन मुठभेड़ में मारा गया था.

इस केस में मुख्य अभियुक्तों में एक नाम अमित शाह का भी था जो इस वक़्त भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. सोहराबुद्दीन मुठभेड़ प्रकरण के वक़्त वे गुजरात के गृह राज्य मंत्री हुआ करते थे. दिसंबर-2010 में गुजरात के अपराध अन्वेषण विभाग यानी सीआईडी ने अपनी एक जांच रिपोर्ट में कहा था कि सोहराबुद्दीन मुठभेड़ प्रकरण के वक्त इस मुठभेड़ में शामिल टीम के सदस्य डीजी वंजारा और राजकुमार पांडियन के साथ अमित शाह के फोन कॉल्स संदिग्ध रूप से बढ़ गए थे.

यहां यह भी याद करना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को लेकर गुजरात की जांच एजेंसी पर सवाल उठा चुका है. शीर्ष अदालत का कहना था कि वह अदालतों को गुमराह करने की कोशिश कर रही है. यही वजह है कि 2010 में उसने यह केस सीबीआई को सौंप दिया था. यही नहीं 2012 में अदालत ने इसकी सुनवाई गुजरात से बाहर मुंबई स्थित एक अदालत में करने का निर्देश दिया. शीर्ष अदालत में साथ में यह निर्देश भी दिया कि मामले को शुरू से आखिर तक एक ही जज के द्वारा सुना जाए.

इसी दौरान मई-2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनी. एक महीने बाद ही यानी जून-2014 में मामले की सुनवाई कर रही मुंबई की विशेष अदालत के जज जस्टिस जेटी उत्पत का तबादला हो गया. जेटी उत्पत अमित शाह को अदालत में पेश होने के लिए समन जारी कर चुके थे. अमित शाह ने हाजिर होने से छूट मांगी थी लेकिन जज उत्पत ने इसकी इजाजत नहीं दी थी. .

अगले जज थे बृजगोपाल लोया. अमित शाह जज उनकी अदालत में भी पेश नहीं हुए. करीब छह महीने बाद दिसंबर 2014 को नागपुर में बृजगोपाल लोया की मौत हो गई. उनकी जगह नए जज के तौर पर एमबी गोसावी आए. दो हफ़्ते की सुनवाई में ही उन्होंने अमित शाह को सभी आरोपों से बरी कर दिया. सीबीआई ने इसका मजबूती से विरोध भी नहीं किया.

सिर्फ़ इतना ही नहीं. इसके बाद मामले के 14 अन्य आरोपितों को सुनवाई शुरू होने से पहले ही सबूतों का अभाव बताकर छोड़ दिया गया. फिर सुनवाई आगे बढ़ते-बढ़ते 34 गवाह अपने पिछले बयानों से मुकर गए. अब जब सुनवाई लगभग पूरी हो गई है तो जस्टिस रेवती से यह जिम्मेदारी ले ली गई है. सवाल उठने लाजमी है.