मौजूदा वित्त वर्ष (2017-18) की तीसरी तिमाही की विकास दर के आंकड़े बुधवार को घोषित कर दिए गए. केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) द्वारा जारी इन आंकड़ों में बताया गया है कि अक्टूबर से दिसंबर के दौरान देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7.2 फीसदी की वृद्धि हुई है. मोदी सरकार के लिए यह राहत की खबर है क्योंकि विकास दर का आंकड़ा पिछली पांच तिमाहियों में सबसे ज्यादा हो गया है. यही नहीं तीन महीने बाद देश की विकास दर एक बार फिर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ज्यादा हो गई है. बीती तिमाही में चीन दूसरे नंबर पर रहा है जिसकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर केवल 6.8 फीसदी रही है.

जानकारों की राय में ये आंकड़े केंद्र सरकार को इसलिए भी राहत देंगे क्योंकि अब तीसरी तिमाही के बाद विकास दर 6.47 फीसदी तक पहुंच चुकी है. इससे पहले मौजूदा वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों में अर्थव्यवस्था ने क्रमश: 5.7 और 6.3 फीसदी की दर से वृद्धि दर्ज की थी. उधर सीएसओ ने गुरुवार को जारी दूसरे अग्रिम अनुमान में वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान जीडीपी विकास दर का अपना अनुमान भी बढ़ा दिया है. उसने कहा है कि इस साल विकास दर 6.5 के बजाय 6.6 फीसदी रहने का अनुमान है.

वहीं कई एजेंसियों का मानना है कि इस साल अर्थव्यवस्था 6.7 फीसदी से आगे बढ़ सकती है. वैसे वित्त वर्ष 2017-18 की आर्थिक समीक्षा में सरकार भी इसके 6.75 फीसदी तक जाने का अनुमान व्यक्त कर चुकी है. लेकिन यह तभी हो सकता है जब चौथी और ​आखिरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 7.6 फीसदी रहे. कई जानकार अब अर्थव्यवस्था के ताजा रुझान देखते हुए इस संभावना को मुमकिन भी मानने लगे हैं. इनके अनुसार आने वाली तिमाहियों में विकास दर के धीरे-धीरे ही सही लेकिन लगातार गति पकड़ने की संभावना है.

यह इसलिए भी संभव है कि तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है. सीएसओ के अनुसार वित्त वर्ष 2017-18 की तीसरी तिमाही में खरीफ फसलों का उत्पादन अनुमान से बेहतर रहने के चलते कृषि क्षेत्र में चार फीसदी से ज्यादा विकास हुआ है. दूसरी तिमाही में यह केवल 2.7 फीसदी की दर से आगे बढ़ा था. अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण घटक माना जाने वाला विनिर्माण क्षेत्र भी 6.9 के मुकाबले 8.9 फीसदी की दर से आगे बढ़ा है. वहीं रियल एस्टेट गतिविधियों में तेजी आने से तीसरी तिमाही में निर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 6.8 फीसदी रही है जो दूसरी तिमाही में केवल 2.8 फीसदी थी. उधर सेवा क्षेत्र में भी पहले से ज्यादा वृ​द्धि दर्ज की गई है.

केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का मानना है कि सभी क्षेत्रों में हुई वृद्धि बताती है कि अर्थव्यवस्था की बुनियादी दशा अब सुधरने लगी है. एक साक्षात्कार में उनका कहना था, ‘तीसरी तिमाही के आंकड़े इसलिए उत्साह जगाते हैं क्योंकि जीएसटी लागू होने के तीन महीने बाद ही इसका सकारात्मक असर दिखना शुरू हो गया है. उत्पादन स्तर अब फिर से जीएसटी के पहले के स्तर पर पहुंच चुका है. ऐसे में अब सतत वृद्धि को लेकर आश्वस्त हुआ जा सकता है.’ हालांकि उनका मानना है कि आने वाले वक्त में वृद्धि इस बात पर निर्भर करेगी कि उस दौरान मांग कैसी रहती है.

डीबीएस बैंक की अर्थशास्त्री राधिका राव के अनुसार भी ताजा आंकड़े इसलिए खास हैं कि अर्थव्यवस्था के सभी संकेतकों में सुधार देखा गया है. उनके अनुसार पिछली तिमाही के दौरान उत्पादन के साथ-साथ मांग और निवेश में भी खासा सुधार हुआ है. वहीं एक अन्य जानकार की राय में 2017-18 में निजी खपत और आय की वृद्धि दर ने बढ़कर लगभग 2016-17 के स्तर को छू लिया है. इसलिए माना जा रहा है कि नोटबंदी और जीएसटी के चलते पैदा हुई उथल-पुथल अब लगभग खत्म हो गई है.

इसका एक संकेत यह भी है कि कैलेंडर वर्ष 2017 की आखिरी तिमाही में शुरुआती तीन तिमाहियों की औसत वृद्धि दर से 1.1 फीसदी ज्यादा विकास हुआ है. इससे पहले 2017 की पहली तीन तिमाहियों की विकास दर क्रमश: 6.1, 5.7 और 6.5 फीसदी रही थी. इन ताजा आंकड़ों को रोजगार वृद्धि के लिहाज से भी काफी अच्छा माना जा रहा है. जानकारों को उम्मीद है कि नोटबंदी और जीएसटी के चलते रोजगार को पहुंचे नुकसान की भरपाई अगली कुछ तिमाहियों में हो सकती है.

माना जा रहा है कि इन तथ्यों को देखकर भारतीय रिजर्व बैंक की चिंता भी कुछ कम हुई होगी, क्योंकि सुस्त अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए उस पर ब्याज दरें घटाने का लगातार दबाव बना हुआ था. दूसरी ओर खुदरा महंगाई के बढ़ते रहने से उस पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव भी बनने लगा है. यह स्थिति आरबीआई के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है. हालांकि जीडीपी के ताजा आंकड़ों ने उसके लिए केवल महंगाई पर नजर बनाए रखना आसान कर दिया है.

संभावनाओं के साथ चुनौतियां भी

1. सबसे पहले तो तीसरी तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र के शानदार प्रदर्शन के बावजूद वित्त वर्ष 2017-18 के नौ महीने का प्रदर्शन साल भर पहले की तुलना में काफी कमतर है. इस साल की तीन तिमाहियों में इस सेक्टर में केवल 5.1 फीसदी का विकास हुआ है लेकिन वित्त वर्ष 2016-17 में इसमें 7.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी. वह भी तब जबकि उसके आखिरी पांच महीनों में नोटबंदी का व्यापक असर हुआ था. इस क्षेत्र में असतत वृद्धि की जानकारों की आशंका इसलिए भी मायने रखती है कि बुधवार को ही जारी हुआ विनिर्माण क्षेत्र का पीएमआई इंडेक्स फरवरी में चार महीनों में सबसे कम हो गया है.

2. दूसरी बड़ी चुनौती कारोबारियों में अर्थव्यवस्था को लेकर विश्वास को फिर से पहले के स्तर पर लाना है. क्योंकि जीएसटी और नोटबंदी के बेतरतीब तरीके से लागू करने से वे सरकारी नीति पर पहले जैसा भरोसा नहीं कर पा रहे हैं. इसके अलावा राजस्व बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार पर आरोप लग रहा है कि वह ‘टैक्स टेररिज्म’ फैला रही है. जानकारों के अनुसार विश्वास बहाली और तार्किक कर नियमों के बिना अर्थव्यवस्था को रफ्तार देना असंभव है.

3. इसके अलावा सुस्त पड़े निर्माण क्षेत्र को फिर से संजीवनी देने की जरूरत है. कारोबारियों के अनुसार नोटबंदी और जीएसटी के अलावा नए रेरा कानून ने रियल एस्टेट सेक्टर की गति को थाम दिया है. हालांकि नवंबर से जनवरी के दौरान सीमेंट सेक्टर में आई तेजी कुछ उम्मीदें जगाती हैं. कारोबारी सरकार से इस सेक्टर पर फोकस और निवेश बढ़ाने की आशा कर रहे हैं. लेकिन अभी तक ऐसा होने के संकेत न मिलना इस सेक्टर को परेशान कर रहा है.

4. राजकोषीय घाटे को 3.5 फीसदी की सीमा में रखने के लिए केंद्र सरकार चालू तिमाही में सरकारी खर्च में और कटौती कर सकती है. इस साल के बजट में केंद्र सरकार ने बताया है कि वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान पिछले साल की बजटीय घोषणा से 30 हजार करोड़ रुपये कम पूंजीगत खर्च किया जाएगा. अर्थशास्त्रियों के अनुसार अभी विकास का मुख्य इंजन सरकारी क्षेत्र के होने के चलते इस फैसले से अगली तिमाही में विकास गति पर असर पड़ सकता है.