होली से चंद दिन पहले खबरें सुनने को मिलीं कि दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज की लड़कियों पर गुब्बारों में भर कर वीर्य फेंका जा रहा है. प्रथम वर्ष की एक छात्रा ने अपने साथ हुई इस घटना के बारे में इंस्टाग्राम पर लिखा और पोस्ट वायरल हो गई. कॉलेज की स्टूडेंट यूनियन ने घटना की जानकारी मिलने पर पुलिस को सूचित किया और छात्राओं की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किये जाने की मांग की. मांग के मुताबिक कॉलेज के आस-पास पुलिस की निगरानी बढ़ा दी गई.

लेकिन छात्राओं की मुश्किल इतनी भर नहीं है. नॉर्थ कैंपस की छात्राओं की शिकायत है कि होली से हफ्ते-दस दिन पहले से ही हर साल लड़कियों पर गुब्बारे फेंके जाने लगते हैं, फिर चाहे वे कॉलेज के लिए निकली हों या बाज़ार के लिए. एलएसआर की छात्राओं के साथ हुई कथित घटना के बाद होली से दो दिन पहले, 28 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के अलग-अलग महाविद्यालयों की लड़कियों ने ‘मैं बुरा क्यों न मानूं’ जुलूस निकाला. उत्तरी दिल्ली के विजयनगर इलाके के डबलस्टोरी से ये जुलूस शाम पांच बजे शुरू होना था.

चलिए इसे हम थोड़े सिनेमाई ढंग से दिखाते हैं.

कट टू :

एक्स्ट (यानी आउटडोर सीन है). डबलस्टोरी टी पॉइन्ट - ईवनिंग

जुलूस के लिए छात्राओं के जुटने से पहले ही मीडिया वहां पहुंच चुका है. कुछ मीडियाकर्मी फोन कर इन छात्राओं को पूछ रहे हैं कि कार्यक्रम में कितनी देर है. कुछ देर में 5-6 छात्राएं आती हैं जिनमें से दो डबलस्टोरी के सामने की भीड़ भरी सड़क पर डफली बजाते हुए ऐलान करने निकल पड़ती हैं कि यहां एक रैली होने जा रही है जिसमें वे होली के नाम पर छात्राओं से होने वाले दुर्व्यवहार के खिलाफ अपना विरोध जताएंगी. बाकी छात्राएं साथ लाए प्लैकार्ड और पोस्टर करीब आते छात्र-छात्राओं को थमा देती हैं. कुछ देर बाद करीब 15-20 छात्र-छात्राएं और उनसे कुछ ही कम मीडिया कर्मियों का समूह डबलस्टोरी के दूसरे गेट से अंदर घुसता है. लेकिन उससे पहले फंकी कपड़े पहने और मोटा काजल लगाए एक-दो छात्राएं माइक पर बताती हैं कि कैसे दिल्ली यूनिवर्सिटी के आसपास के इलाकों में होली के नाम पर छात्राओं के विशेष अंगों को गुब्बारों से निशाना लगाया जाता है. कहती हैं कि ऐसा करना महिलाओं के प्रति हिंसा है. वे एलएसआर की घटना के बारे में भी बताती हैं. और यह भी बताती हैं कि हम यहां गुलाल भी लेकर आ सकते थे पर इसलिए नहीं लाए हैं क्योंकि होली और दीपावली जैसे त्योहार महिलाओं के प्रति हिंसा को बढ़ावा देते हैं. क्योंकि होली में होलिका को जलाया गया था और दीपावली की कहानी में राम ने शूर्पनखा की नाक काटी थी और सीता को अग्नि परीक्षा देने के लिए मजबूर किया था. नारा लगाया जाता है ‘होलिका दहन नहीं सहेंगे, तुम्हारी होलिका नहीं बनेंगे’ और फिर इसके बाद ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता के खिलाफ नारे लगाए जाते हैं. छात्राओं के लहज़े में जोश है, ग़ुस्सा है.

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एक्स्ट. डबलस्टोरी के एक घर के बाहर - ईवनिंग

तीन औरतें बैठकर हाल में गुज़रे लड़कियों के जुलूस के बारे में बात कर रही हैं. इलाके में लड़कियों की सुरक्षा की स्थिति के बारे में पूछने पर वे अपनी शिकायतों का पिटारा खोल देती हैं. वहीं रहने वाली बेला भाटिया बताती हैं, ‘होली पर ये लड़कियां भांग के पकोड़े और दारू और न जाने क्या-क्या खाकर सड़कों पर हुड़दंग करती हैं. ग्रीस और रंग न जाने क्य-क्या लगा के निक्के–निक्के कपड़े पा के रातों को बीयर की बोतलें हाथ में लेके लड़कों के साथ घूमती हैं, किस-विस कर लेती हैं. इन्होंने माहौल खराब कर दिया है पंजाबियों का.’ साथ ही बैठीं विनीता भी कुछ ऐसी ही बातें बताती हैं. पर जोड़ती हैं कि ऐसे किसी पर बलून मारना ग़लत है पर लड़कियों को अपना ध्यान रखना चाहिए. वे अभी-अभी गुज़रे जुलूस की लड़कियों के कपड़ों से भी नाराज़ दिखती हैं.

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एक्स्ट. डबल स्टोरी की गली - ईवनिंग

जुलूस डबल स्टोरी में कहीं रुका हुआ है. लड़कियां फिर से वही सब बातें समझा रही हैं जो पहले बता चुकी हैं. वे कन्सेंट यानी सहमति से होली खेलने की बात करती हैं. ऊपर बालकनियों से झांकती कुछ लड़कियां नारेबाज़ी के समय इनके सुर से सुर मिला रही हैं. कुछ हंस रही हैं. कुछ दूसरी बालकनियों में खड़े लड़के जुलूस लेकर निकली लड़कियों का मज़ाक बनाने के अंदाज़ में हंस रहे हैं. तभी दो-तीन गुब्बारे आकर जुलूस पर गिरते हैं. सड़क पर गुब्बारे लेकर गुज़रता सात-आठ साल का बच्चा हंसते हुए कहता है कि अब से दीदी से पूछ कर गुब्बारे मारेंगे.

कुछ लोग हंसते हैं. कुछ चौंक जाते हैं. मीडिया वाले अपने कैमरे लड़कियों से हटाकर बालकनी में गुब्बारे लिए खड़े बच्चों पर फोकस करते हैं. लड़कियां गुस्से को काबू कर फिर से अपनी बात कहने लगती हैं. समझाती हैं कि बच्चों को ये समझाना कि होली है तो किसी भी लड़की पर गुब्बारा मारो, ये ग़ल़त है. वे उन बच्चों की परवरिश पर सवाल करती हैं और फिर से बात त्योहारों के महिला हिंसा के बढ़ावा देने पर पहुंच जाती है. जुलूस को देखने के लिए इकट्ठी भीड़ में से वहीं किसी दुकान में काम करने वाला 20-22 साल का एक लड़का दांत निपोरते हुए अपने साथी से कहता है, ‘सुंण रा है? अब से होली बंद.’

इस सब से बेखबर लड़कियां फिर से पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद को चुनौती देने वाले नारे लगाती हैं. और बालकनी में खड़े लोग वापस साथ देने, मज़ाक उड़ाने और हंसने में मसरूफ हो जाते हैं.

फेड आउट

तो पिक्चर को यहीं बंद कर अगर इस पूरे क़िस्से को समझा जाय तो दो नतीज़े निकाले जा सकते हैं. पहला कि होली के नाम पर लड़कियों के खिलाफ छेड़छाड़ और कई बार हिंसा होती है. और इसका विरोध ज़रूरी है. लेकिन विरोध तब तक अपना काम नहीं कर सकता जब तक वह अपनी बात विरोधी खेमे तक न पहुंचा सके. इस बात को दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा दीपिका समझाने की कोशिश करती हैं. वे कहती हैं, ‘मैं जब दस साल पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी में थी तब भी यही हाल था. इन गुब्बारों की वजह से हम तंग आ जाया करते थे. इसके खिलाफ आवाज़ उठाना ज़रूरी है. लेकिन जिस तरह इसे उठाया जा रहा है उसके फायदे कम, नुकसान ज़्यादा हैं. आप कह रहे हैं कि आपको सीसीटीवी कैमरा और पुलिस की ज़रूरत नहीं. आप समाज बदलना चाहते हैं. लेकिन जिस समाज में बदलाव लाने की आप बात कर रहे हैं, उसे समझे बिना, उससे बातचीत करने का बीच का रास्ता निकाले बिना आप सीधे उसे नकार दे रहे हैं तो फिर ये सिर्फ प्रोवोकेटिव होगा, और उतना ही सतही भी होगा.’

यह कहते वक्त दीपिका होली-दीवाली की उस व्याख्या की ओर इशारा करती हैं जो जुलूस निकालने वाली छात्राएं देती हैं. दीपिका कहती हैं, ‘ये अतिवादी व्याख्या है. हम होली को हमेशा रंगों से जोड़ कर देखते आए हैं. और होलिका सिर्फ बुराई का प्रतीक है न कि औरत का. वो एक मिथिकल कहानी का हिस्सा है. अगर हम पूरी तरह अपने त्योहारों और अपनी संस्कृति को नकारेंगे तो हम अलग-थलग ही पड़ जाएंगे. तब हम अपनी बात बाकी समाज को, जिसमें हम बदलाव चाहते हैं, कभी नहीं समझा पाएंगे. ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता से आज़ादी इन गलियों में नारे लगाने से तो नहीं ही मिलेगी.’

और दूसरे नतीज़े को दिल्ली विश्वविद्यालय की एक और पूर्व छात्रा अंकिता कुछ इस तरह समझाती हैं - ‘आपने देखा कि कैसे लड़कियों पर फेंके जाने वाले गुब्बारों के खिलाफ प्रदर्शन के जवाब में डबलस्टोरी की उम्रदराज़ महिलाओं ने तुरंत कॉलेज जाने वाली लड़कियों को छोटे कपड़े और शराब-सिगरेट तक सीमित कर दिया. ऐसा नहीं है कि लड़कियों को अपना जीवन इन सभी की सहमति लेकर जीना है. लेकिन अपने समाज को समझते हुए, कम से कम अपने सार्वजनिक जीवन और व्यवहार को सभ्य रखना बहुत ज़रूरी है. हम दिल्ली में रहकर पेरिस में होने जैसा बर्ताव नहीं कर सकते. यही वजह है कि एक खास तरह के मेकअप और कपड़ों में निकली इन लड़कियों की कई बातें सही होने पर भी बहुत सी दूसरी लड़कियां इस जुलूस में शामिल नहीं होंगी, क्योंकि वे समाज की बुराइयों के खिलाफ खड़े होने की अपनी इच्छा और इस तरह के विरोध की अतिवादिता के बीच फंस कर खामोश रह जाएंगी. इन फेमिनिस्ट्स को समझाया जाना ज़रूरी है कि हमें होली के नाम पर होने वाली ज़्यादतियों को नकारने की ज़रूरत है, होलिका दहन को नहीं.’